राजमा, पश्मीना से लेकर बसोहली पेंटिंग तक... जम्मू-कश्मीर की धरोहर बने ये आठ प्रोडक्ट्स; मिल चुका है GI Tag
जम्मू-कश्मीर के आठ अनूठे उत्पादों को जीआई टैग मिला है, जो क्षेत्र की समृद्ध संस्कृति और प्राकृतिक संसाधनों को दर्शाते हैं। इनमें बसोहली पेंटिंग, पश्मी ...और पढ़ें

जम्मू-कश्मीर के 8 जीआई टैग उत्पाद: जानें धरती के स्वर्ग की अनूठी पहचान।
HighLights
बसोहली पेंटिंग और पश्मीना को मिला जीआई टैग।
राजमा, बासमती चावल, शहद, कलाड़ी और अनारदाना भी शामिल।
ये उत्पाद जम्मू-कश्मीर की स्थानीय संस्कृति दर्शाते हैं।
डिजिटल डेस्क, जम्मू। आपने जम्मू-कश्मीर के मुगल गार्डन, माता वैष्णो देवी यात्रा, अमरनाथ यात्रा और डल झील के हाउसबोट के बारे में तो सुना होगा। अक्सर जब हम जम्मू-कश्मीर के बारे में सोचते हैं तो हमारे मन में ये सभी जगहें सबसे पहले आती हैं।
क्या आपको पता है कि धरती का स्वर्ग कहा जाने वाला यह क्षेत्र पिछले कुछ सालों से अपने कुछ यूनीक प्रोडक्टस के लिए चर्चा में है, जिन्हें जीआई टैग्स यानी जीओ ग्राफिकल इंडीकेटर मिल चुके हैं।
अब कुल मिलाकर जम्मू-कश्मीर के पास बसोहली पेंटिंग, बसोहली पश्मीना, चिकरी वुड क्राफ्ट, राजमा, बासमती चावल, रंबन का शहद, उधमपुर की कलाड़ी और रंबन अनारदाना को जीआई टैग मिला है। ये प्रोडक्टस स्थानीय संस्कृति, प्राकृतिक संसाधनों और सदियों पुरानी कारीगरी का जीता जागता उदाहरण है। आइए इन प्रोडक्ट्स के बारे में जानते हैं...
1. पेंटिंग
बसोहली की पेंटिंग: जम्मू-कश्मीर की सबसे खास पेंटिंग और पश्मीना कठुआ के बसोहली क्षेत्र में तैयार की जाती है। ऐसा कहा जाता है कि बसोहली पेंटिंग में सोने-चांदी के रंगों का इस्तेमाल किया जाता है। जिसमें सोने का इस्तेमाल आभूषणों की सजावट और चांदी का इस्तेमाल कपड़ों और खिड़कियों को रंगने के लिए किया जाता है।
इन पेंटिंगस में स्थानीय राजाओं की फोटो, देवी भद्रकाली, रामायण, भागवत पुराण, शिव-पार्वती, राम-सीता, राधा-कृष्णा और अन्य पौराणिक कथाओं को सुंदर तरीके से पेंट किया जाता है।
ऐसा माना जाता है कि इस पेंटिंग के प्रसिद्ध होने में बसोहली के पाल राजवंश ( Pal dynasty) की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। पेंटिंग के साथ-साथ बसोहली की चांगथांगी बकरियों से बनी बसोहली पश्मीना को भी जीआई टैग मिला है।
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2. पश्मीना
भारत में मुख्य रूप से दो तरह की पश्मीना बकरियां पाई जाती हैं। एक है चेगु और दूसरी है चांगथांगी। बसोहली पश्मीना को लद्दाख की चांगथांगी बकरी के महीन पश्मीना ऊन से तैयार किया जाता है। स्थानीय कारीगर इसे हाथ से काटकर और बुनकर शॉल व अन्य कपड़े बनाते हैं।
यह अपनी मुलायम क्वालिटी, हल्के वजन और गर्माहट के लिए प्रसिद्ध है। कुछ इतिहासकार बताते हैं कि बसोहली के रहने वाले कहन सिंह बिलोवारिया ने 18वीं सदी में बसोहली में पश्मीना बुनाई की शुरुआत की थी। बसोहली के कारीगरों की पारंपरिक बुनाई, कला और विशेष तकनीक के कारण इसे जीआई टैग मिला।
3. चिकरी
अगर आपको गिफ्टिंग का शौक है और आप कुछ अलग देना चाहते हैं तो आप हिमालयन बॉक्सवुड से बनी चिकरी वुड क्राफ्ट ट्राई कर सकते हैं। राजौरी चिकरी वुड क्राफ्ट जम्मू-कश्मीर के राजौरी जिले के थन्नामंडी क्षेत्र की प्रसिद्ध हैन्डीक्राफ्ट है।
इसमें चिकरी यानी हिमालयन बॉक्सवुड नाम की खास लकड़ी का इस्तेमाल होता है, जो केवल राजौरी और पुंछ की पहाड़ियों में ही पाई जाती है। यह हल्के शहद के रंग की, चिकनी, हल्की और मजबूत होती है, इसलिए इस पर सुंदर नक्काशी की जाती है।
इसके साथ ही इस लकड़ी से कंघे, डिब्बे, चम्मच, फ्रेम और गिफ्ट की चीजें बनाई जाती है जो टूरिस्ट बहुत खरीदते हैं। चिकरी से बने सामान जम्मू-कश्मीर के स्थानीय लोग खुद भी इस्तेमाल करते हैं।
जम्मू-कश्मीर के आठ जीआई टैग प्रोडक्टस में से पांच प्रोडक्टस खाने के हैं। ये खाने के प्रोडक्टस सालों से स्थानीय लोग खा रहे हैं लेकिन अब इन प्रोडक्टस को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिल रही है।

4. राजमा
जम्मू का राजमा पूरे देश में प्रसिद्ध है, दूर-दूर से लोग यहां इसका स्वाद चखने पहुंचते हैं और खास बात यह है कि जम्मू के भद्रवाह राजमा और जम्मू बासमती चावल को भी जीआई टैग मिला है। भद्रवाह राजमा की बात करें तो इसे डोडा जिले की चिंता घाटी में उगाया जाता है और यह लाल राजमा की खास किस्म है।
आकार में छोटा लेकिन खाने में एकदम मुलायम और स्वाद हल्का मीठा। इसे मक्का के साथ पारंपरिक तरीके से उगाया जाता है। जम्मू-कश्मीर की ठंडी हवा, पानी और उपजाऊ मिट्टी इसे दूसरी जगहों के राजमा से अलग बनाती है।
वहीं, रणबीर सिंह पुरा, सुचेतगढ़, बिश्नाह, मरह, अखनूर और छम्ब में बासमती चावल की खेती होती है। बासमती चावल देश के बहुत से क्षेत्रों में उगाया जाता है, लेकिन जम्मू बासमती चावल की खुशबू सबसे अलग होती है। यह चावल अपनी अनोखी खुशबू, लंबे दाने और स्वाद के लिए जाना जाता है।

5. बासमती चावल
वैसे तो जम्मू में बासमती चावल की एक दर्जन से अधिक किस्में उगाई जाती हैं, लेकिन 370, 1121 और RH-30 सबसे प्रसिद्ध हैं। यहां की उपजाऊ मिट्टी और कम पेस्टिसाइडस के उपयोग से इसकी क्वालिटी और बेहतर होती है। इसके साथ ही यह जम्मू क्षेत्र की अर्थव्यवस्था और किसानों की आय का महत्वपूर्ण स्रोत है।

6. शहद
रंबन और डोडा जिलों के पहाड़ी क्षेत्रों में उगने वाले सुलाई पौधों के फूलों से तैयार रंबन सुलाई शहद अपने आयुर्वेदिक गुणों के लिए जाना जाता है। यहां की साफ हवा, प्राकृतिक जंगल और पारंपरिक मधुमक्खी पालन इसकी गुणवत्ता बढ़ाते हैं। इसी खास पहचान के कारण इसे जीआई टैग भी मिला है। इस शहद की खुशबू और स्वाद दूसरे शहद के मुकाबले अलग होता है।

7. कलाड़ी
कलाड़ी जम्मू-कश्मीर के उधमपुर जिले के रामनगर की प्रसिद्ध पारंपरिक चीज (पनीर) है। इसे जम्मू का मोजरेला चीज भी कहा जाता है। इसे ताजे फुल-फैट दूध से बनाया जाता है। दूध को मट्ठे की मदद से फाड़कर दही तैयार किया जाता है।
इसके बाद बचा हुआ पानी निकालकर उसे गोल टिकिया का आकार दिया जाता है। खाने से पहले कलाड़ी को तवे पर सेका जाता है, जिससे यह बाहर से कुरकुरी और अंदर से मुलायम व खिंचने वाली बन जाती है। इसे आमतौर पर बन के साथ परोसा जाता है।
8. रंबन अनारदाना
रंबन जिले के पहाड़ी और जंगल वाले क्षेत्रों में उगने वाले जंगली अनार के सूखे बीजों से बनाया जाता है। हम अनार को छील कर उसके दाने को सीधा खा लेते है पर यहां पर लोग इसका उपयोग मसाले, चटनी, सब्जियों और आयुर्वेदिक दवाओं में करते हैं।

क्या है जीआई टैग?
जीआई टैग यानी जीओ ग्राफिकल इंडीकेटर टैग किसी ऐसे उत्पाद को दिया जाता है, जो किसी खास जगह की पहचान होता है। उस उत्पाद की गुणवत्ता, स्वाद, डिजाइन या विशेषता उस क्षेत्र की जलवायु, मिट्टी, प्राकृतिक संसाधनों या पारंपरिक कारीगरी से जुड़ी होती है। जीआई टैग से उस उत्पाद को कानूनी पहचान मिलती है।