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    दिन से ज्यादा गर्म हो रही हैं जम्मू-कश्मीर की रातें, IIT खड़गपुर की चेतावनी; सेब-ग्लेशियर और नदियों पर मंडराया खतरा

    Updated: Thu, 30 Jul 2026 05:05 PM (IST)

    आईआईटी खड़गपुर के शोध के अनुसार, जम्मू-कश्मीर के पहाड़ी इलाकों में 20 वर्षों में तापमान 1 डिग्री सेल्सियस बढ़ा है। यह वृद्धि ग्लेशियरों, नदियों और कृष ...और पढ़ें

    जम्मू-कश्मीर में गहराया जलवायु परिवर्तन का संकट, 20 साल में 1°C तक बढ़ा तापमान। एआई जेनरेटेड तस्वीर का इस्तेमाल किया गया है।

    जम्मू-कश्मीर में गहराया जलवायु परिवर्तन का संकट, 20 साल में 1°C तक बढ़ा तापमान। एआई जेनरेटेड तस्वीर का इस्तेमाल किया गया है।

    HighLights

    1. पिछले 20 वर्षों में तापमान 1 डिग्री सेल्सियस बढ़ा

    2. ग्लेशियर पिघलने से नदियों, कृषि पर गंभीर खतरा

    3. रात में और ऊंचाई पर तापमान तेजी से बढ़ रहा

    डिजिटल डेस्क, जम्मू। पहाड़ी इलाको में तापमान बढ़ना खतरे की बात मानी जाती है। क्योंकि तापमान बढ़ने से न केवल प्राकृतिक स्थिती खराब होती बल्कि किसानों को भी भारी नुकसान होता है। जम्मू-कश्मीर के पहाड़ी इलाकों में तापमान में बढ़ोतरी देखी गई है। जिससे आने वाले समय को लेकर लोगों की चिंता बढ़ने लगी है।

    IIT के वैज्ञानिकों ने जम्मू-कश्मीर के तापमान पर किया रिसर्च

    हाल ही में आईआईटी खड़गपुर के वैज्ञानिकों द्वारा जम्मू-कश्मीर के बदलते तापमान पर एक रिसर्च किया गया। इस रिसर्च में पता चला कि पिछले 20 वर्षों में तापमान लगभग एक डिग्री सेल्सियस तक बढ़ा है।

    यह अध्ययन भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) खड़गपुर के सेंटर फॉर ओसियन, रिवर, एटमॉस्फियर एंड लैंड साइंसेज (CORAL) के वैज्ञानिकों, प्रोफेसर जयनारायणन कुट्टिपुरथ, जी. एस. गोपीकृष्णन और वी. एम. प्रणव चंद्रन द्वारा किया गया। इस रिसर्च में कुछ अन्य महत्वपूर्ण बातें भी सामने आई।

    इस अध्ययन में भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के जम्मू, कटड़ा, बटोट, भद्रवाह, बनिहाल, काजीगुंड, श्रीनगर, पहलगाम, गुलमर्ग और कुपवाड़ा स्थित दस मौसम केंद्रों के तापमान आंकड़ों का विश्लेषण किया गया।

    कुछ महत्वपूर्ण बातें जो रिसर्च में मिली

    जम्मू-कश्मीर में तापमान में हो रही वृद्धि सभी क्षेत्रों में बराबर नहीं है। मध्य और अधिक ऊंचाई वाले पर्वतीय क्षेत्रों में तापमान मैदानी इलाकों की अपेक्षा अधिक तेजी से बढ़ रहा है। इस प्रक्रिया को एलिवेशन-डिपेंडेंट वार्मिंग कहा जाता है। इसका मतलब है कि जैसे-जैसे ऊंचाई बढ़ती है, जलवायु परिवर्तन का प्रभाव भी अधिक स्पष्ट दिखाई देता है।

    खबरें और भी

    तापमान दिन के मुकाबले रात में ज्यादा बढ़ रहा है। कई पर्वतीय मौसम केंद्रों पर न्यूनतम तापमान प्रति दशक 0.1 से 0.5 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि वातावरण में बढ़ती नमी रात के समय पृथ्वी से निकलने वाली ऊष्मा को रोक लेती है, जिससे रातें पहले की तुलना में अधिक गर्म हो रही हैं।

    ठंड के मौसम में तापमान वृद्धि सबसे अधिक देखी गई है। इसका मुख्य कारण बर्फ की मात्रा में कमी और पृथ्वी की सतह की रिफलेक्टेंस यानी परावर्तन क्षमता (अल्बीडो) में बदलाव माना गया है। जब बर्फ कम होती है तो गहरी सतह अधिक सौर्य ऊर्जा अवशोषित (ऑब्जर्व) करती है, जिससे तापमान और बढ़ जाता है।

    तापमान बढ़ने से होगा नुकसान

    जम्मू-कश्मीर के अधिकांश ग्लेशियर बर्फ के लगातार जमा होने और कम तापमान पर निर्भर करते हैं। अगर ग्लेशियरस तेजी से पिघलने लगे तो भविष्य में नेचुर्ल वॉटर की मात्रा कम हो जाएगी।

    जम्मू-कश्मीर की कई नदियां, जैसे झेलम, चिनाब और सिंध, ग्लेशियरों और बर्फ के पिघलने से मिलने वाले पानी पर निर्भर हैं। शुरुआत में अधिक पिघलाव से नदियों में पानी बढ़ सकता है, लेकिन जब ग्लेशियर छोटे होने लगेंगे, तो गर्मियों में नदियों में पानी कम हो सकता है। इससे आने वाले समय में शिचीईं और अन्य काम प्रभावित होंगे।

    अगर तापमान ऐसे ही बढ़ता रहा तो जम्मू-कश्मीर में उगने वाले पहाड़ी फलों का भी नुकसान होगा। सेब, अखरोट और चेरी जैसी फसलों को सर्दियों में निश्चित ठंड (chilling hours) की आवश्यकता होती है। तापमान बढ़ने पर इनकी गुणवत्ता और उत्पादन प्रभावित हो सकता है। कीट और बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। खेती के मौसम और फसल चक्र में बदलाव आ सकता है।

    इसके साथ ही पहलगाम और गुलमर्ग जैसे ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पिछले लगभग 20 वर्षों में तापमान लगभग एक डिग्री सेल्सियस तक बढ़ चुका है। यह पश्चिमी हिमालय में तेजी से हो रहे जलवायु परिवर्तन का संकेत है। वैज्ञानिकों ने बताया कि तीन हजार मीटर से अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में लॉन्ग टर्म डेटा सीमित है। इसका भविष्य में ज्यादा सही अध्ययन करने के लिए अधिक वेदर स्टेशन स्थापित करने की आवश्यकता है।