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    Kargil War Hero: 5 जुलाई को घर आऊंगा... फिर तिरंगे में लौटे देवराज; पत्नी ने 27 साल से संभालकर रखा आखिरी खत

    By Daljeet Singh Edited By: Rahul Sharma
    Updated: Thu, 23 Jul 2026 03:09 PM (GMT+05:30)

    बलिदान नायक देवराज शर्मा का परिवार आज भी उनकी शहादत को गर्व से याद करता है, जिन्होंने 5 जुलाई 1999 को कारगिल युद्ध में देश के लिए प्राण न्योछावर कर दि ...और पढ़ें

    कारगिल बलिदान नायक देवराज शर्मा कारगिल युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए थे।

    कारगिल बलिदान नायक देवराज शर्मा कारगिल युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए थे


    HighLights

    1. नायक देवराज शर्मा 5 जुलाई 1999 को टाइगर हिल पर शहीद हुए।

    2. पत्नी निर्मला देवी ने संभालकर रखा है उनका आखिरी खत।

    3. परिवार आज भी गर्व से मनाता है कारगिल विजय दिवस।

    जागरण संवाददाता, आरएसपुरा: कारगिल युद्ध को 27 वर्ष बीत चुके हैं। समय ने बहुत कुछ बदल दिया है, लेकिन आरएसपुरा के सीमांत गांव बाजे चक में एक घर ऐसा भी है, जहां दीवारों पर टंगी तस्वीर, अलमारी में सुरक्षित अंतिम चिट्ठी और हर साल मनाया जाने वाला कारगिल विजय दिवस आज भी 5 जुलाई 1999 की यादों को जीवंत कर देता है। कारगिल बलिदान नायक देवराज शर्मा भले ही रणभूमि में वीरगति को प्राप्त हो गए, लेकिन उनका अदम्य साहस, राष्ट्रभक्ति और कर्तव्यनिष्ठा आज भी उनके परिवार की सबसे बड़ी ताकत है।

    शहादत के बाद संघर्षों से भरी जिंदगी जीने वाले इस परिवार ने आंसुओं को अपनी कमजोरी नहीं, बल्कि बलिदान की विरासत को संजोने का संकल्प बनाया है। कारगिल युद्ध के दौरान टाइगर हिल पर दुश्मनों से लोहा लेते हुए 5 जुलाई 1999 को बलिदान हुए नायक देवराज शर्मा की पत्नी निर्मला देवी आज भी वह अंतिम खत संभालकर रखे हुए हैं, जिसमें उन्होंने लिखा था कि वह पांच जुलाई को घर लौटेंगे। उन्होंने अपना वादा निभाया भी, लेकिन तिरंगे में लिपटकर

    घायल थे... फिर भी बोले- मुझे टाइगर हिल भेजो

    निर्मला देवी बताती हैं कि श्रीलंका में आतंकवाद विरोधी अभियान के दौरान उनके पति के पैर में गंभीर चोट लगी थी। दर्द बढ़ने के कारण उन्होंने छुट्टी लेकर घर आने का निर्णय लिया था, लेकिन कारगिल युद्ध शुरू होते ही उन्होंने अपना फैसला बदल दिया। घायल पैर होने के बावजूद उन्होंने स्वेच्छा से टाइगर हिल जाने की इच्छा जताई। मीडियम मशीनगन (एमएमजी) चलाने में दक्ष होने के कारण उन्होंने मोर्चा संभाला और देश की रक्षा करते हुए वीरगति प्राप्त की।

    निर्मला देवी कहती हैं कि पति के बलिदान के बाद जीवन एकदम बदल गया। तीन छोटे बच्चों की परवरिश, उनकी पढ़ाई और भविष्य की चिंता उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती थी। हालांकि समाज और सरकार का सहयोग मिला, लेकिन पिता का साया कोई नहीं भर सकता। उन्होंने हर कठिन परिस्थिति का सामना किया और बच्चों को इस तरह बड़ा किया कि आज सभी अपने पैरों पर खड़े हैं। एक बेटा और दो बेटियां अब अपने-अपने परिवारों के साथ खुशहाल जीवन जी रहे हैं।

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    संभालकर रखा अंतिम खत

    उनकी आंखें आज भी उस अंतिम खत का जिक्र करते हुए नम हो जाती हैं। वह कहती हैं, जब भी उनकी बहुत याद आती है तो मैं वह खत पढ़ती हूं। ऐसा लगता है जैसे आज भी वह मेरे पास बैठे हों। परिवार ने देवराज शर्मा की तस्वीर, पदक, सम्मान पत्र और उनसे जुड़ी हर वस्तु को धरोहर की तरह संभालकर रखा है। यही चीजें नई पीढ़ी को उनके बलिदान की कहानी सुनाती हैं।

    पिता की वीरता की कहानियां सुनते-सुनते बड़े हुए

    बलिदान के पुत्र अमित कुमार बताते हैं कि उस समय वह बहुत छोटे थे। पिता का स्नेह उन्हें अधिक समय तक नहीं मिला, लेकिन उनकी वीरता की कहानियां सुनते-सुनते बड़े हुए। सेना में भर्ती होने का सपना पूरा नहीं हो सका, लेकिन वह अपने पिता के आदर्शों को जीवन में उतारने का प्रयास कर रहे हैं। 

    अमित कहते हैं कि उनके पिता के कराण बाजे चक और आसपास के गांवों के कई युवाओं ने भारतीय सेना में भर्ती होकर देश सेवा का रास्ता चुना। उन्हें गर्व है कि आज भी लोग उनके पिता को सम्मान के साथ याद करते हैं और बलिदान के बेटे के रूप में उन्हें जो सम्मान मिलता है, वही उनके पिता की सबसे बड़ी विरासत है।

    परिवार के लिए कारगिल विजय दिवस केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि भावनाओं से जुड़ा दिन है। इस दिन पूरा परिवार देवराज शर्मा को श्रद्धांजलि अर्पित करता है, उनकी यादों को साझा करता है और बच्चों को बताता है कि देश की रक्षा के लिए किसी सैनिक का बलिदान केवल उसके परिवार का नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र का गौरव होता है।

    पति की कमी कभी पूरी नहीं हो सकती

    कारगिल युद्ध को 27 वर्ष बीत जाने के बाद भी समय बदल गया, बच्चे बड़े हो गए और परिवार आगे बढ़ गया, लेकिन एक कमी आज भी हर पल महसूस होती है। निर्मला देवी कहती हैं कि जीवन में अब किसी चीज की कमी नहीं है, लेकिन पति की कमी कभी पूरी नहीं हो सकती। उनका मानना है कि बलिदान कभी मरते नहीं, वे अपने विचारों, अपने साहस और अपने बलिदान के माध्यम से हमेशा जीवित रहते हैं।

    आज भी हर कारगिल विजय दिवस पर जब लोग नायक देवराज शर्मा को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं तो परिवार की आंखें नम जरूर होती हैं, लेकिन सिर गर्व से ऊंचा रहता है। 27 वर्षों बाद भी नायक देवराज शर्मा केवल अपने परिवार की यादों में नहीं, बल्कि पूरे आरएसपुरा क्षेत्र के सम्मान, प्रेरणा और राष्ट्रभक्ति के प्रतीक बनकर जीवित हैं।