नदी कभी नहीं भूलती अपना रास्ता! राजौरी में 32 साल बाद उसी मार्ग पर लौटी बाढ़, बुजुर्गों की आशंका सच; कई मकान ढहे
राजौरी की हालिया बाढ़ ने नदी के 30 साल पुराने प्राकृतिक मार्ग को फिर से उजागर किया है। इस मार्ग पर हुए अतिक्रमण और निर्माण के कारण भारी तबाही हुई, जिस ...और पढ़ें
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राजौरी बाढ़ ने लौटाई 30 साल पुरानी दरिया की राह।
HighLights
राजौरी बाढ़ ने 30 साल बाद नदी का पुराना मार्ग अपनाया
अतिक्रमित प्राकृतिक जलमार्गों पर निर्माण से हुआ भारी नुकसान
भविष्य में आपदा रोकने को जलमार्गों का संरक्षण जरूरी
गगन कोहली, राजौरी। राजौरी में आई विनाशकारी बाढ़ ने जहां भारी नुकसान पहुंचाया है, वहीं इसने करीब तीन दशक पुरानी घटनाओं की यादें भी ताजा कर दी हैं। स्थानीय लोगों और बुजुर्गों का कहना है कि इस बार जिस रास्ते से दरिया का तेज बहाव गुजरा, वह उसका पुराना प्राकृतिक मार्ग था। उनका दावा है कि वर्ष 1994 में आई भीषण बाढ़ के दौरान भी नदी इसी दिशा से बहकर तबाही मचा चुकी थी।
स्थानीय निवासियों के अनुसार समय के साथ नदी का बहाव बदल गया और पुराने मार्ग को सुरक्षित मानकर लोगों ने वहां मकान, दुकानें और अन्य भवनों का निर्माण शुरू कर दिया। हालांकि बुजुर्ग लगातार चेतावनी देते रहे कि नदी का स्वभाव स्थायी नहीं होता और वह कभी भी अपने पुराने रास्ते की ओर लौट सकती है। हालिया बाढ़ के बाद उनकी यह आशंका सच साबित होती नजर आई।
स्थानीय निवासी वेद प्रकाश, विजय शर्मा और बशीर अहमद ने बताया कि वर्ष 1994 में आई बाढ़ के दौरान भी दरिया इसी क्षेत्र से होकर बहा था। उस समय भारी तबाही के बाद नदी का प्रवाह धीरे-धीरे दूसरी दिशा में चला गया। इसके बाद लोगों ने पुराने बहाव क्षेत्र को सामान्य जमीन समझ लिया और वहां निर्माण गतिविधियां शुरू हो गईं।
धीरे-धीरे नदी के पुराने मार्ग में बहुमंजिला इमारतें, मकान और व्यावसायिक प्रतिष्ठान खड़े हो गए। स्थानीय लोगों का कहना है कि कई निर्माण इस बात को नजरअंदाज कर किए गए कि यह क्षेत्र कभी नदी का प्राकृतिक रास्ता हुआ करता था। कई बुजुर्गों ने समय-समय पर लोगों को आगाह किया कि अधिक बारिश की स्थिति में नदी दोबारा अपना पुराना मार्ग अपना सकती है।
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इस बार भारी बारिश के बाद नदी का जलस्तर तेजी से बढ़ा और पानी ने पुराने रास्ते की ओर रुख कर लिया। तेज बहाव अपने साथ मलबा, पत्थर और पेड़ बहाकर लाया, जिससे रास्ते में आने वाले निर्माण प्रभावित हुए। कई मकान क्षतिग्रस्त हो गए, कुछ पूरी तरह ढह गए, जबकि कई दुकानों और अन्य संपत्तियों को भी गंभीर नुकसान पहुंचा।
स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि नदी के प्राकृतिक बहाव क्षेत्र को संरक्षित रखा जाता और वहां अनियंत्रित निर्माण नहीं होने दिया जाता तो नुकसान का स्तर काफी कम हो सकता था। उनका कहना है कि प्राकृतिक जलमार्गों पर अतिक्रमण और बिना योजना के निर्माण ने आपदा के प्रभाव को बढ़ा दिया।
बुजुर्गों के अनुसार पहले नदी का विस्तार काफी अधिक था और बरसात के दौरान अतिरिक्त पानी उसी क्षेत्र में फैल जाता था। लेकिन समय के साथ किनारों पर निर्माण होने से नदी का प्राकृतिक क्षेत्र सीमित होता चला गया। इस कारण जब इस बार अत्यधिक पानी आया तो नदी ने अपने पुराने रास्ते को फिर तलाश लिया और जहां भी अवरोध मिले, वहां नुकसान हुआ।
शहर के लोगों का कहना है कि यह घटना भविष्य के लिए बड़ी सीख है। नदियों, नालों और प्राकृतिक जल निकासी मार्गों की वैज्ञानिक पहचान कर उन्हें सुरक्षित रखा जाना चाहिए। पर्यावरण और आपदा प्रबंधन से जुड़े विशेषज्ञ भी लंबे समय से चेतावनी देते रहे हैं कि बाढ़ क्षेत्र में निर्माण भविष्य में गंभीर खतरा पैदा कर सकते हैं।
बाढ़ प्रभावित परिवारों का कहना है कि उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि नदी इतने वर्षों बाद दोबारा उसी रास्ते से बह निकलेगी। कई परिवारों ने अपनी जीवनभर की जमा पूंजी से बनाए घर और दुकानें कुछ ही घंटों में खो दीं। अब वे राहत और पुनर्वास की उम्मीद लगाए हुए हैं।
स्थानीय नागरिकों ने प्रशासन से मांग की है कि बाढ़ से हुए नुकसान का विस्तृत सर्वे कराया जाए और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए नदी के पुराने प्रवाह क्षेत्रों का वैज्ञानिक अध्ययन कराया जाए। साथ ही पुराने जलमार्गों और नदी किनारे हुए अवैध निर्माण की पहचान कर उचित कार्रवाई की जाए।
राजौरी की यह बाढ़ एक बार फिर यह संदेश दे गई है कि प्राकृतिक जलधाराओं के रास्तों के साथ छेड़छाड़ लंबे समय में गंभीर परिणाम ला सकती है। विकास कार्यों में पर्यावरणीय संतुलन और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा को प्राथमिकता देना जरूरी है, ताकि भविष्य में ऐसी आपदाओं से होने वाले नुकसान को कम किया जा सके।