राजौरी वालों सुनो! अब एक ही छत के नीचे होंगे सारे सरकारी दफ्तर, 12 साल बाद बाढ़ ने खोला मिनी सचिवालय का रास्ता
राजौरी में 12 साल के इंतजार के बाद बहुप्रतीक्षित मिनी सचिवालय का निर्माण अब पुराने, बाढ़ग्रस्त सचिवालय स्थल पर होगा। ...और पढ़ें

राजौरी में 12 साल बाद मिनी सचिवालय का सपना साकार, बाढ़ ने खोला नया रास्ता।
HighLights
12 साल बाद राजौरी मिनी सचिवालय निर्माण का रास्ता साफ हुआ।
मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने पुराने स्थल पर बनाने की घोषणा की।
बाढ़ से क्षतिग्रस्त सचिवालय ने नए निर्माण का अवसर प्रदान किया।
जागरण संवाददाता, राजौरी। राजौरी जिले के लोगों के लिए एक ऐसी खबर आई है जिसका इंतजार पिछले 12 सालों से हो रहा था। वो इंतजार, जो फाइलों में उलझा था, जो जमीन के विवाद में फंसा था और जो एक अधूरे ढांचे के रूप में सरकारी सिस्टम की नाकामी की कहानी बयां कर रहा था। राजौरी का बहुप्रतीक्षित मिनी सचिवालय अब आखिरकार बनने जा रहा है।
मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने हाल ही में बाढ़ प्रभावित राजौरी के दौरे के दौरान जो ऐलान किया है, उसने न सिर्फ एक बड़े विवाद को हमेशा के लिए खत्म कर दिया है, बल्कि हजारों लोगों के दिल में एक नई उम्मीद भी जगा दी है। मुख्यमंत्री ने साफ शब्दों में कहा है कि बाढ़ में बुरी तरह से तबाह हो चुके मौजूदा जिला सचिवालय की जगह पर ही नया, अत्याधुनिक और आपदा-रोधी मिनी सचिवालय बनाया जाएगा।
क्यों खास है राजौरी के लिए मिनी सचिवालय?
राजौरी के आम आदमी के लिए मिनी सचिवालय सिर्फ ईंट-पत्थर की एक इमारत नहीं है। यह उसकी रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ी सबसे बड़ी सुविधा है।
आज की हकीकत यह है कि अगर थन्नामंडी, कोटरंका, नौशेरा, सुंदरबनी या मनजाकोट के किसी सुदूर पहाड़ी गांव से कोई बुजुर्ग, कोई किसान या कोई छात्र अपना एक छोटा सा काम कराने जिला मुख्यालय आता है, तो उसका पूरा दिन सिर्फ दफ्तरों के चक्कर काटने में निकल जाता है।
एक जाति प्रमाण पत्र के लिए एक जगह, राजस्व के रिकॉर्ड के लिए दूसरी जगह, समाज कल्याण की स्कीम के लिए तीसरी जगह और शिक्षा विभाग के काम के लिए चौथी जगह। ऑटो का खर्चा अलग, समय की बर्बादी अलग और ऊपर से हर दफ्तर में वही जवाब - "कल आइए"।
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मिनी सचिवालय का सपना इसी दर्द को खत्म करने के लिए देखा गया था। एक ही परिसर, एक ही बिल्डिंग और एक ही छत के नीचे जिले के सारे बड़े विभाग। राजस्व, विकास, पंचायत, शिक्षा, आपूर्ति, समाज कल्याण - सब कुछ एक जगह। ताकि आम आदमी को भटकना न पड़े और विभागों के बीच तालमेल भी बेहतर हो।
2013 में देखा गया था सपना, 2015 में फंस गया विवादों में
इस सपने की कहानी 2013 में शुरू हुई थी। जम्मू-कश्मीर सरकार ने राजौरी के लिए लगभग 37.69 करोड़ रुपये की लागत से एक भव्य मिनी सचिवालय बनाने की योजना को मंजूरी दी थी। उद्देश्य बड़ा और नेक था।
शुरुआत भी हुई। पहले चरण के लिए करीब 10 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए और लगभग 7.20 करोड़ रुपये जारी भी कर दिए गए। लेकिन अफसोस, जमीन पर काम 10 प्रतिशत भी नहीं हो पाया। सिर्फ 1.87 करोड़ रुपये ही खर्च हो सके और फिर पूरी परियोजना अधर में लटक गई।
कारण वही पुरानी कहानी - जमीन का विवाद।
जानकारी के अनुसार शुरुआत में इस प्रोजेक्ट के लिए जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (DIET) की जमीन को चुना गया था और वहां निर्माण कार्य शुरू भी कर दिया गया था। लेकिन जल्द ही लोकेशन को लेकर सवाल उठने लगे। कुछ लोगों ने जगह को लेकर आपत्ति जताई, तो प्रशासनिक स्तर पर भी खींचतान शुरू हो गई। फाइलें एक टेबल से दूसरी टेबल पर घूमती रहीं, पत्राचार पर पत्राचार होता रहा और इधर जो थोड़ा-बहुत ढांचा खड़ा हुआ था, वह खंडहर में तब्दील होने लगा।
पिछले 10 सालों से वह अधूरा ढांचा राजौरी में हर आने-जाने वाले को इस बात का एहसास दिलाता रहा कि कैसे एक अच्छी योजना विवादों और इच्छाशक्ति की कमी के कारण बर्बाद हो सकती है।
बाढ़ ने ढहाया सचिवालय, लेकिन दे गया नए निर्माण का मौका
फिर आई इस साल की भीषण बाढ़। इस बाढ़ ने राजौरी जिले में भारी तबाही मचाई। घर बहे, सड़कें टूटीं और सरकारी संपत्तियों को भी भारी नुकसान पहुंचा। इसी बाढ़ में दशकों पुराना जिला सचिवालय भवन भी बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गया।
तकनीकी विशेषज्ञों की टीम ने जब भवन की जांच की तो उसे रहने और काम करने लायक नहीं पाया। रिपोर्ट में साफ कहा गया कि इमारत संरचनात्मक रूप से असुरक्षित हो चुकी है। इसके बाद मजबूरी में प्रशासन को सभी विभागों को आनन-फानन में अलग-अलग जगहों पर शिफ्ट करना पड़ा।
इससे लोगों की परेशानी और बढ़ गई। किसी को पता ही नहीं चल रहा था कि DC ऑफिस कहां चला गया, तहसीलदार साहब कहां बैठ रहे हैं और समाज कल्याण विभाग किस इमारत में शिफ्ट हो गया है। लोग हाथों में फाइलें लिए एक बिल्डिंग से दूसरी बिल्डिंग तक भटकते रहे।
लेकिन कहते हैं न कि हर आपदा में एक अवसर छिपा होता है। इस बाढ़ और इस अफरा-तफरी ने ही सरकार को वह मौका दे दिया जिसकी जरूरत थी।
जब मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला बाढ़ के बाद हालात का जायजा लेने राजौरी पहुंचे और अधिकारियों के साथ समीक्षा बैठक की, तो उन्होंने इसी समस्या को सबसे बड़ी प्राथमिकता बनाया। उन्होंने अधिकारियों से दो टूक कहा कि अब फाइलों का खेल बंद होना चाहिए। क्षतिग्रस्त और असुरक्षित हो चुके पुराने सचिवालय को पूरी तरह से हटाकर वहीं पर नया मिनी सचिवालय बनाया जाएगा।
सीएम उमर के एलान से क्या बदलेगा?
मुख्यमंत्री के इस एक ऐलान से कई बड़े फायदे एक साथ हुए हैं। पहला, लोकेशन को लेकर पिछले 10 साल से चला आ रहा सारा विवाद हमेशा के लिए खत्म हो गया है। अब कोई यह नहीं कहेगा कि जगह सही नहीं है, क्योंकि यह वही जगह है जहां दशकों से जिला सचिवालय रहा है और जिसे हर कोई जानता है।
दूसरा, लोगों को नई जगह के बारे में सोचने की जरूरत नहीं है। पुराना सचिवालय शहर के बीचों-बीच, ऐसी जगह पर है जहां पहुंचना सभी के लिए आसान है।
तीसरा, सरकार को अब नई जमीन अधिग्रहण करने की लंबी और जटिल प्रक्रिया से नहीं गुजरना पड़ेगा, जिससे प्रोजेक्ट में और देरी होती। मुख्यमंत्री ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह कोई साधारण बिल्डिंग नहीं होगी। यह एक आधुनिक, फुली-फर्निश्ड और आपदा-रोधी प्रशासनिक परिसर होगा जो भविष्य में बाढ़ या भूकंप जैसी किसी भी प्राकृतिक आपदा का मजबूती से सामना कर सके।
लोगों की उम्मीदें और विशेषज्ञों की राय
अब जब लोकेशन फाइनल हो गई है, तो लोगों की उम्मीदें सातवें आसमान पर हैं। राजौरी के व्यापारियों, युवाओं, छात्रों और सामाजिक संगठनों ने इस फैसले का दिल खोलकर स्वागत किया है।
लोगों का कहना है कि अगर यह प्रोजेक्ट तय समय में पूरा हो गया तो यह राजौरी की तस्वीर बदल देगा।
आम लोगों की मांग है कि नए परिसर में ये सुविधाएं जरूर होनी चाहिए:
- सभी विभाग एक साथ: राजस्व से लेकर शिक्षा तक, एक ही फ्लोर पर या एक ही ब्लॉक में सभी जरूरी काउंटर हों।
- डिजिटल सुविधा: एक ही जगह पर जनसुविधा केंद्र, ई-गवर्नेंस कियोस्क, ऑनलाइन आवेदन और डिजिटल रिकॉर्ड की सुविधा हो ताकि पारदर्शिता बनी रहे।
- मूलभूत सुविधाएं: दूर से आने वाले लोगों के लिए बड़ा वेटिंग हॉल, साफ-सुथरे शौचालय, पीने के पानी की व्यवस्था और पर्याप्त पार्किंग की जगह हो।
- विशेष ध्यान: बुजुर्गों और दिव्यांगजनों के लिए लिफ्ट, रैंप और व्हीलचेयर की सुविधा अनिवार्य रूप से होनी चाहिए।
विशेषज्ञों का भी यही मानना है कि सरकार को इसे सिर्फ एक बिल्डिंग के तौर पर नहीं, बल्कि भविष्य के स्मार्ट गवर्नेंस हब के तौर पर देखना चाहिए। इसका डिजाइन ऐसा हो कि अगले 50 सालों तक जिले की जरूरतों को पूरा कर सके। इसमें सौर ऊर्जा, रेन वाटर हार्वेस्टिंग और मजबूत सुरक्षा व्यवस्था जैसी आधुनिक तकनीकों का भी इस्तेमाल होना चाहिए।
अब सबकी नजरें टाइमलाइन पर
मुख्यमंत्री की घोषणा ने नींव तो रख दी है, लेकिन अब असली परीक्षा शुरू होती है। राजौरी के लोगों के मन में अब दो ही सवाल हैं - इसकी विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) कब बनेगी और निर्माण कार्य कब शुरू होगा?
लोगों ने पिछले 12 सालों में कई घोषणाएं सुनी हैं और कई बार उम्मीदें टूटी हैं। इसलिए इस बार लोगों को सिर्फ घोषणा नहीं, बल्कि जमीन पर काम चाहिए। उन्हें एक तय समय-सीमा चाहिए।
अगर सरकार इस बार तेजी दिखाती है और तय समय में इस प्रोजेक्ट को पूरा करती है, तो यह सिर्फ एक सरकारी इमारत का निर्माण नहीं होगा। यह राजौरी के लोगों के उस भरोसे की जीत होगी जो उन्होंने पिछले 12 सालों से टूटने के बावजूद बनाए रखा है। यह एक ऐतिहासिक कदम होगा जो राजौरी के प्रशासन को तेज, पारदर्शी और लोगों के करीब ले आएगा।