डल झील की खूबसूरती बेमिसाल, लेकिन सेफ्टी का जिम्मा आपका, क्योंकि 'डल में मदद की कोई गारंटी नहीं'
श्रीनगर की विश्व प्रसिद्ध डल झील में पर्यटकों की सुरक्षा एक बड़ी चिंता का विषय है, क्योंकि हजारों आगंतुकों के लिए बचाव दल के कर्मचारी बेहद कम हैं। हित ...और पढ़ें

एडीआरएफ टीम में 150-200 जवान होने चाहिए, हैं सिर्फ 18।
HighLights
डल झील में बचाव दल के कर्मचारी बहुत कम।
हजारों पर्यटकों के लिए सुरक्षा व्यवस्था अपर्याप्त।
हितधारकों ने सुविधाओं की कमी पर चिंता जताई।
रजिया नूर, श्रीनगर। श्रीनगर की विश्व प्रसिद्ध डल झील की सैर करने का इरादा हो तो जरूर करें लेकिन अपनी सेफ्टी का ख्याल आपको स्वयं ही रखना पड़ेगा। सेफ्टी जैकेट अपने साथ रखे बल्कि शिकारे में बैठने से पहले ही पहन लेें साथ ही मौसम संबंधित जानकारी अवश्य प्राप्त करें, क्योंकि झील में इन सुविधाओं की अव्यवस्था है।
वहीं यदि आपको आपातकालीन स्थिति का सामना करना पड़ा तो आप तक मदद समय पर पहुंचे, इसकी भी कोई गारंटी नहीं है। क्योंकि ऐसे हालातों के निपटारे के लिए डल व नगीन झील में गिनती के चंद बचाव कर्मचारी ही तैनात है।
बता देते हैं कि डल झील व नगीन झील में किसी भी आपातकालीन स्थिति के लिए प्रशासन ने SDRF के बचाव दलों को तैनात किया हैं लेकिन इनकी संख्या तकरीबन 18 है। जिनमें से 10-12 कर्मचारी डल झील जबकि 6 कर्मचारी नगीन झील में तैनात रहते हैं। इन बचाव दलों के पास तकरीबन 15 बोट हैं जिनका वह आपातकालीन स्थिति विशेषकर तेज हवाओं, तूफानी बारिश या झील में किसी के डूबने की घटना के समय इसतेमाल करते हैं। अलबत्ता इन झीलों विशेषकर डल झील में प्रतिदिन सैंकड़ों की संख्या में पर्यटक सैर करने के लिए आते हैं जबकि पीक टूरिजम सीजन के दौरान यह संख्या दुगनी हो जाती है।
1000 पर्यटकों पर सिर्फ 12 SDRF जवान
अलबत्ता इसके बावजूद भी बचाव दलों की संख्या वही रहती है। आपातकालीन स्थिति में झील की सैर करने वाले पर्यटक कितने सुुरक्षित होंगें,इसका अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि प्रतिदिन झील की सैर को आने वाले हजारों पर्यटकों के लिए इन मुट्ठी भर कर्मचारियों की सेवा ही उपलब्ध रखी गई है। हितधारकों का कहना है कि य एक बड़ा मुद्दा है जिस पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है। उनके अनुसार उन्होंने संबंधित विभाग का ध्यान इस मुद्दे की तरफ खैंचने की कोशिश की लेकिन बकौल उनके संबंधित विभाग ने इस तरफ कोई ध्यान नही दिया।
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निसार अहमद बतखू नामक एक हाउसबोट मालिक ने कहा,यह एक बड़ी समस्या है जिसकी तरफ ध्यान नही दिया जा रहा है। बतखू ने कहा, हम मानते हैं कि एसडीआरएफ की टीम हमारी इन झीलों के लिए तैनात हैं और यह दिन रात मदद के लिए तैयार रहती हैं। लेकिन जिस हिसाब से टूरिस्ट इन झीलों विशेषकर डल झील की सैर के लिए आते हैं,उस हिलाज से तो यह टीम बहुत ही छोटी है। बतखू ने कहा,एमर्जेंसी के दौरान एसडीआरएफ की बचाव टीम के घटनास्थल पर पहुंचने तक हम शिकारा वाले भी अपने स्तर पर बचाव कारर्वाई कर लोगों की जानें बचाने की कोशिश करते हैं।
बतखू ने कहा, बीते साल 2 मई को शिकारा उलट जाने से दो लोकल मछुआरे झील में डूब गए। घटना मेरी आखों के सामने घटी। जब तक एसडीआरएफ की मदद पहुंची मैं और मेरे साथ दो चार शिकारे वालों ने फौरन बचाव कारर्वाई कर झील में डूबे अब्दुल मजीद खोसा नामक एक मछुआरे को बचा लिया अलबत्ता उसके साथ डूबे दूसरे मछुआरे तौफीक अहमद डूब गया औ उसका शव एसडीआरएफ ने एक दिन बाद झील से बरामद किया।
हमेशा अलर्ट मोड में रहती हैं हमारी टीमें
बतखू ने कहा, इसमें शक नहीं कि हमारी यह एसडीआरएफ टीम बड़ी अलर्ट हैं और जिम्मेदारी से अपनी ड्यूटी अंजाम देते हैं। लेकिन इस टीम में कम से कम 150-200 कर्मचारी होने चाहिए और वह तमाम सुविधाओं से लैस होने चाहिए ताकि किसी भी एमर्जेंसी का सामना ठीक से किया जा सके। उन्होंने कहा,हमने कई बार यह बात टूरिजम डिपार्टमेंट की नोटिस में लाई लेकिन उन्होंने अभी तक इस समस्या का कोई हल नही निकाला।
डल झील में पर्यटकों को सैर करा अपनी आजीविका कमाने वाले शमीम अहमद डार नामक एक व्यक्ति ने कहा,आपदाओं के लिहाज से हमारी झीलें खासकर डल झील जो हमारे टूरिस्टों की पहली पसंद है,बड़ी संवेदनशील हैं। यहां मौसम हमेशा एक बड़ी चुनौती रहती है। अचानक मौसम के मिजाज बदले तो झील में हादसों(दुर्घटनाएं) का रिस्क बढञ जाता है। इतना ही नही शिकारा या बोट चलाने के दौरान कोई चूक हुई,शिकारा या बोट पानी में उलट गई तो बड़ा हादसा भी हो सकता है।
ऐसे में बचाव दलों की हर समय दरकार होती है। रियाज अहमद मला नामक एक डल वासी ने कहा,एसडीआरएफ की बचाव टीम बेशक चौबीसों घंटे अपनी ड्यूटी अंजाम देते हैं। लेकिन एक तो इनकी संख्या कम है,दूसरे इनके पास बोट व बाकी फेसिलिटीज की भी कम है जबिक इन की डेप्यूटेशन भी सही नही है।
मला ने कहा, गिनती के यह एसडीआरएफ कर्मचारी नेहरू पार्क में ही डेरा डाले रहते हैं। जबकि होना तो यह चाहिए कि इन में से एक एक,दो दो सदस्यों को झील के विभिन्न प्वाइटों पर रहना चाहिए ताकि किसी एमर्जेंसी के वक्त उन्हें घटनास्थल तक पहुंचने में ज्यादा देरी ना लगे। मला ने कहा,एमर्जेंसी के वक्त नेहरू पार्क से घटनास्थल तक पहुंचने में उन्हें देरी लगती है जिससे नुकसान की ज्यादा आशंका रहती है।
आवश्यक सुविधाओं से लैस है एसडीआरएफ टीमें
इधर इस असुविधा को स्वीकारते हुए एसडीआरएफ के फर्स्ट बटालियन कमांडेंट एसएसपी मसरूर अहमद मीर ने कहा, डल झील व नगीन के लिए हमारे 18 सदस्यों की एक बचाव टीम तैनात रहती है। उन्होंने कहा, हमारे इन बचाव दलों के पास 15 बोट जिनमें लाइफ सेविंग जैकेट्स, रस्सियां, ऑसीजन मास्क, फर्स्ट एड बाक्स व अन्य सुविधाओं से लैस हैं, हर समय तैयार रहती हैं और एमर्जेंसी के दौरान हमारा यह बचाव दल घटनास्थल पर पहुंच बचाव अभियान शुरू कर देते है।
उन्होंने कहा,नगीन झील की तुलना में डल झील में पर्यटकों की ज्यादा भीड़ उमड़ी रहती हैं, लिहाजा हमारी इस संक्षिप्त बचाव टीम के अधिकांश कर्मचारी डल झील की ही निगरानी करते हैं। उन्होंने कहा,हमारी टीम बेशक छोटी है और इ झीलों में पर्यटकों के रहने वाले फ्लो को देखते हुए टीम विशाल होनी चाहिए लेकिन फिर भी आपातकालीन सिथितियों से निपटने के लिए हमारी यह टीम कई समझौता नही करती और हमारी कोशिश रहती है कि नुकसान कम से कम हो।
इधर इस मुद्दे के संबंधि में जागरण ने पर्यटन विभाग से संपर्क साधने की कोशिश की। लेकिन निदेशक सहित कोई भी अधिकारी प्रतिक्रिया देने के लिए उपलब्ध नहीं था। सनद रहे कि श्रीनगर के डलगेट इलाके में जबरवन पहाडियों से घिरा विश्व प्रसिद्ध डल झील यहां घूमने आने वाले देशी विदेशी पर्यटकों की पहली पंसद है। सालभर यहां घूमने आने वाले अधिकांश पर्यटकों का तांता बंधा रहता है और झील में सिथत तैरते घरों(हाउसबोट) व शिकारों में बैठ झील की खूबसूरती को निहारते हैं।