कुलगाम आतंकी हमला: कृष्णा ढाबे से लेकर अनंतनाग तक... 5 साल में 9 हमले; कश्मीर में टारगेट किलिंग की इनसाइड स्टोरी
कुलगाम में आतंकियों ने छत्तीसगढ़ के दो श्रमिकों की धर्म पूछकर हत्या की, जो पहलगाम में पर्यटकों पर हुए हमले जैसी है। टीआरएफ ने जिम्मेदारी ली है। ...और पढ़ें
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कश्मीर में टारगेट किलिंग की इनसाइड स्टोरी। फाइल फोटो
HighLights
कुलगाम में आतंकियों ने धर्म पूछकर दो श्रमिकों की हत्या की।
टीआरएफ ने इन लक्षित हत्याओं की जिम्मेदारी ली है।
आतंकी भय, विभाजन और सांप्रदायिक तनाव फैला रहे हैं।
जागरण संवाददाता, कुलगाम। कश्मीर में निरीह लोगों और श्रमिकों को निशाना बनाकर दहशत फैलाने का यह षड्यंत्र नया नहीं है। कश्मीर में मारे-मारे छिप रहे आतंकी दहशत फैलाने के लिए श्रमिकों, कामगारों और व्यापारियों को निशाना बनाकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने का प्रयास करते हैं।
- फरवरी, 2021: श्रीनगर के मशहूर 'कृष्णा ढाबा' के मालिक के बेटे की हत्या। इसे कश्मीर में टारगेट किलिंग की शुरुआत माना जाता है।
- अक्टूबर, 2021: श्रीनगर में प्रसिद्ध दवा विक्रेता एम एल बिंद्रू, स्कूल प्रिंसिपल सुपिंदर कौर और शिक्षक दीपक चंद की कुछ ही दिनों में सिलसिलेवार हत्याएं।
- 26 फरवरी, 2023: पुलवामा में कश्मीरी हिंदू संजय शर्मा की आतंकियों ने गोली मारकर हत्या की।
- सात फरवरी, 2024 : श्रीनगर के हब्बा कदल में बढ़ई का काम करने वाले पंजाब के दो युवकों की हत्या की।
- आठ अगस्त, 2024: शोपियां के चोटीपोरा में आतंकियों ने एक गैर-स्थानीय मजदूर की गोली मारकर हत्या की।
- 18 अक्टूबर, 2024: शोपियां में बिहार के एक गैर-स्थानीय मक्का विक्रेता अशोक चौहान की हत्या।
- दो नवंबर, 2024: बड़गाम के मजहामा में दो गैर-स्थानीय मजदूरों की गोली मारकर हत्या।
- 22 अप्रैल 2025 : पहलगाम के बैसरन में आतंकी हमले में 25 पर्यटकों समेत 26 लोगों की हत्या।
- 22 जुलाई 2026: अनंतनाग में श्रीअमरनाथ ड्यूटी पर तैनात पुलिकर्मी की गोली मारकर हत्या
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आतंकी हमले के बाद तलाशी अभियान चलाते सुरक्षाकर्मी- फोटो जागरण
नाम पूछा और गोली मार दी
दक्षिण कश्मीर के कुलगाम में शुक्रवार रात आतंकियों ने छत्तीसगढ़ से रोजी-रोटी कमाने आए दो श्रमिकों को निशाना बनाया। करीब 15 माह पहले पहलगाम में भी आतंकियों ने पर्यटकों से नाम और धर्म पूछकर उन्हें मौत के घाट उतारा था।
दोनों घटनाओं की समानता यह बताती है कि आतंकी संगठन अब केवल हत्या नहीं कर रहे, बल्कि भय, विभाजन और सांप्रदायिक तनाव पैदा करने की सुनियोजित रणनीति पर काम कर रहे हैं। लश्कर-ए-तैयबा के हिट स्क्वाड के रूप में सक्रिय द रजिस्टेंस फ्रंट (टीआरएफ) ने इन हमलों की जिम्मेदारी लेकर संकेत दिया है कि घाटी में चुनिंदा हत्याओं के माध्यम से वह एक साथ कई संदेश देने का प्रयास कर रहा है।
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स्थानीय युवाओं का इस्तेमाल
विशेषज्ञों का मानना है कि बीते कुछ समय से दबाव में आए आतंकी संगठन अब बड़े हमलों के बजाय ऐसी लक्षित वारदातों को प्राथमिकता दे रहे हैं, जिनका मनोवैज्ञानिक प्रभाव व्यापक हो और जिन्हें मीडिया में अधिक स्थान मिले। इससे वे कम संसाधनों में अधिक भय पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं।
पहलगाम हमले और ऑपरेशन सिंदूर के बाद जम्मू-कश्मीर में सक्रिय आतंकी नेटवर्क और नियंत्रण रेखा के पार बैठे उनके हैंडलर दबाव में हैं। उन्हें यह भी पता है कि कोई बड़ी आतंकी वारदात भारत को कड़ी सैन्य प्रतिक्रिया का अवसर दे सकती है।
यही कारण है कि लंबे अंतराल के बाद आतंकी संगठनों ने सीधे बड़े हमलों की जगह ‘हमला करो और बच निकलो’ वाली रणनीति अपनाई है। इस रणनीति के तहत वे हाइब्रिड आतंकियों और नए भर्ती किए गए स्थानीय युवाओं का इस्तेमाल कर रहे हैं।
