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    सेब से लदे पेड़ फिर भी कंगाली का डर! कश्मीर के किसानों से हो गई भारी गलती, अब पूरे साल की कमाई पर फिर सकता पानी

    Updated: Fri, 07 Aug 2026 07:30 AM (IST)

    दक्षिण कश्मीर के सेब उत्पादक फलों की ठीक से छंटाई न होने के कारण छोटे आकार और खराब गुणवत्ता वाले सेब की समस्या से जूझ रहे हैं। इससे किसानों को बाज़ार ...और पढ़ें

    सेब की खराब गुणवत्ता से दक्षिण कश्मीर के उत्पादक चिंतित। (फाइल फोटो)

    सेब की खराब गुणवत्ता से दक्षिण कश्मीर के उत्पादक चिंतित(फाइल फोटो)

    HighLights

    1. सेब की ठीक से छंटाई न होने से गुणवत्ता प्रभावित।

    2. छोटे आकार के कारण किसानों को कम दाम मिल रहे।

    3. बागवानी विशेषज्ञों ने सही छंटाई को बताया महत्वपूर्ण।

    जागरण संवाददाता,श्रीनगर। दक्षिण कश्मीर में सेब उत्पादक चुनौती का सामना कर रहे हैं। अच्छी फसल की उम्मीद के बावजूद, बागों में फलों की छंटाई ठीक से न होने के कारण फलों का आकार छोटा रह गया है। इससे गुणवत्ता प्रभावित हुई है और बाज़ार से मिलने वाली कमाई भी कम हो गई है।

    यह समस्या खासकर ज़्यादा घने सेब के बागों में देखी जा रही है, जहां सही छंटाई के बिना बहुत ज़्यादा फल लगने से फलों के गुच्छे बहुत घने हो गए हैं, जिससे सेब बाज़ार की ज़रूरत के हिसाब से सही आकार और गुणवत्ता नहीं पा सके हैं।

    फलों का साइज छोटा क्यों?

    फ्रूट मंडी शोपियां के अध्यक्ष मोहम्मद अशरफ़ ने कहा, 'मंडियों में आ रहे फलों का आकार उम्मीद के मुताबिक नहीं है। इसकी मुख्य वजह यह है कि फलों की छंटाई ठीक से नहीं की गई। जब फल गुच्छों में उगते हैं, तो वे एक-दूसरे से मुकाबला करते हैं और पूरी तरह से विकसित नहीं हो पाते हैं। फलों के सही विकास के लिए शुरुआती दौर में ही छंटाई की जानी चाहिए।'

    अशरफ ने कहते हैं कि छोटे फलों की कीमत कम मिलती है, जिससे सीधे तौर पर किसानों की कमाई पर असर पड़ता है। अगर किसान बेहतर मुनाफा चाहते हैं, तो फलों की छंटाई सही तरीके से करना बहुत ज़रूरी है।

    शोपियां में 20,000 हेक्टेयर ज़मीन पर सेब की खेती

    जम्मू-कश्मीर के सबसे बड़े सेब उत्पादक ज़िलों में से एक शोपियां में 20,000 हेक्टेयर से ज़्यादा ज़मीन पर सेब की खेती होती है। यह क्षेत्र ज़िले की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और हज़ारों किसान परिवारों की आजीविका का साधन है। हालांकि, किसानों और बागवानी विशेषज्ञों का कहना है कि बाग के रखरखाव के कामों में फलों की छंटाई को अक्सर नज़रअंदाज़ किया जाता है।

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    अधिक बोझ से टहनियां टूटने का खतरा

    शोपियां के सेब उतपादक लतीफ अहमद ने कहा, 'जब पेड़ पर ज़रूरत से ज़्यादा फल रह जाते हैं, तो वे सीमित पोषक तत्वों, पानी और धूप के लिए आपस में होड़ करते हैं। इससे सेब छोटे रह जाते हैं, उनका रंग ठीक से नहीं आता, वे एक समान नहीं पकते, इन सभी वजहों से बाज़ार में फल की कीमत कम हो जाती है।

    अहमद ने यह भी कहा कि फलों का ज़्यादा बोझ पेड़ की टहनियों पर दबाव डालता है, जिससे फल लगने के मौसम में उनके टूटने का खतरा बढ़ जाता है। लंबे समय में, ठीक से छंटाई न करने से अल्टरनेट बेयरिंग की समस्या हो सकती है, जिसमें पेड़ एक साल तो बहुत ज़्यादा फल देते हैं, लेकिन अगले साल पैदावार बहुत कम होती है।

    क्या बोले एक्सपर्ट

    बागवानी विशेषज्ञों के अनुसार, आधुनिक घने बागों में छंटाई एक ज़रूरी काम है। इसमें आमतौर पर पेड़ के फैलाव को संतुलित रखने के लिए वैज्ञानिक तरीके से छंटाई करने के साथ-साथ अतिरिक्त फलों को हाथ से हटाया जाता है। इन तरीकों से धूप अच्छी तरह पहुँचती है, हवा का संचार बेहतर होता है और बचे हुए फलों का आकार, रंग और मिठास बेहतर होती है।

    हालांकि हाल के वर्षों में बागों के वैज्ञानिक प्रबंधन के बारे में जागरूकता बढ़ी है, लेकिन उत्पादकों का कहना है कि कई किसान ज़्यादा फल पाने की उम्मीद में छंटाई नहीं करते, जिससे अक्सर गुणवत्ता और मुनाफ़े पर असर पड़ता है।

    सेब उत्पादकों से अपील

    अहमद ने सेब उत्पादकों से अपील की कि वे सिर्फ़ पेड़ पर फलों की संख्या पर ध्यान देने के बजाय बागवानी के सुझाए गए तरीकों को अपनाएं। उन्होंने कहा, 'कम लेकिन अच्छी गुणवत्ता वाले सेब हमेशा छोटे आकार के ज़्यादा फलों की तुलना में ज़्यादा मुनाफ़ा देते हैं। बागवानी विभाग के अधिकारियों ने भी उत्पादकों को सलाह दी है कि वे नियमित रूप से फील्ड विशेषज्ञों से सलाह लें और सेब की किस्म, ऊंचाई और फसल की बढ़त के चरण के हिसाब से छंटा का शेड्यूल अपनाएं।