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    कश्मीर पर मंडराया बड़ा खतरा! 60 सालों में गायब हुए 30% ग्लेशियर, वैज्ञानिकों ने दी भीषण जल संकट की चेतावनी

    Updated: Thu, 06 Aug 2026 04:20 PM (GMT+05:30)

    घाटी के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, पिछले 60 वर्षों में 30% से अधिक लुप्त हो चुके हैं, जिससे भविष्य में गंभीर पेयजल संकट का खतरा है। ...और पढ़ें

    तेजी से पिघल रहे घाटी के ग्लेश्यर, भवष्य में पैदा हो सकता है घौर जलसंकट: विशेषज्ञ

    तेजी से पिघल रहे घाटी के ग्लेश्यर, भवष्य में पैदा हो सकता है घौर जलसंकट: विशेषज्ञ

    HighLights

    1. घाटी के 30% से अधिक ग्लेशियर 60 वर्षों में लुप्त

    2. तेजी से पिघलते ग्लेशियरों से भविष्य में गंभीर पेयजल संकट

    3. ग्लोबल वार्मिंग से बर्फबारी पैटर्न और नदी प्रवाह प्रभावित

    जागरण संवाददाता, श्रीनगर। घाटी के ग्लेश्यर तेजी से पिघल रहे हैं और बीते 60 वर्षों के दौरान 30 प्रतिशत से अधिक ग्लेश्यर लुप्त हो चुके हैं। अगर ग्लेश्यरों के पिघलने व सुकड़ने का सिलसिला इसी तरह जारी रहा तो घाटी की अधिकांश आबादी पेयजल की सुविधा से वंचित हो जाएगी।

    यह जानकारी इस्लामिक यूनिवर्स्टी ऑफ साइंस एंड टेकनालोजी के कुलपति प्रोफेसर शकील अहमद रोमशू ने दी। वे हिमालय में जलवायु लचीलेपन के लिए प्रकृति-आधारित समाधानों पर चार दिन तक चलने वाली इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस के दूसरे दिन लोगों को संबोधित कर रहे थे। अपने संबोधन में उन्होंने बताया कि कोलाहाई समेत घाटी के ग्लेश्यरों का क्रायोस्फीयर (बर्फ वाला हिस्सा) सिकुड़ रहा है और हाइड्रोलॉजिकल सिस्टम (पानी का तंत्र) बदलाव के कगार पर है।

    रोमशू ने कहा कि पिछले छह दशकों में हमने 30 प्रतिशत से ज्यादा ग्लेशियर मास खो दिया है। अनुमान है कि 21वीं सदी के अंत तक और भी ज्यादा ग्लेशियर मास खत्म हो जाएगा। उन्होंने बताया कि ग्लोबल वार्मिंग के चलते बढ़ते तापमान ने पूरे जम्मू-कश्मीर प्रदेश में बर्फबारी के पैटर्न, ग्लेशियर के वॉल्यूम और नदी के बहाव को बदल दिया है।

    उन्होंने कहा, इन बदलावों से वह लाखों लोग प्रभावित हो सकते हैं, जो पीने के पानी, सिंचाई और पनबिजली के लिए हिमालय से पिघलने वाले पानी पर निर्भर हैं। उन्होंने कहा कि ये अनुमान आने वाले कई दशकों के लिए थे, जिनमें एक ऐसे भविष्य की तस्वीर दिखाई गई है, जहां इस इलाके की पानी की सुरक्षा इस बात पर निर्भर करेगी कि अनुकूलन की रणनीतियां कितनी तेजी से अपनाई जाती हैं।

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    रोमशू ने बताया कि बढ़ते तापमान ने पूरे प्रदेश में बर्फबारी के पैटर्न, ग्लेशियर के आकार और नदियों के बहाव को बदल दिया है। पीने के पानी, सिंचाई और पनबिजली के लिए हिमालय से पिघलने वाले पानी पर निर्भर लाखों लोगों के लिए इन बदलावों से नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा और आने वाले समय में उन्हें पेयजल के संकट से जूझना पड़ेगा।

    कॉन्फ्रेंस में शामिल पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के वैज्ञानिक डॉ. जगवीर सिंह ने कहा कि हाल के अनुमानों के अनुसार, ग्लोबल तापमान प्री-इंडस्ट्रियल लेवल (औद्योगिक क्रांति से पहले के स्तर) से तापमान 2.2 से 2.35 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया है। तापमान में डिग्री का कुछ हिस्सा (जैसे 0.15 डिग्री) बढ़ना सुनने में भले ही कम लगे, लेकिन बदलाव की रफ्तार पहले लगाए गए अनुमानों से कहीं ज्यादा तेज है।

    उन्होंने कहा कि तापमान बढ़ने और बारिश के पैटर्न में बदलाव होने पर ये बुनियादी प्रक्रियाएं असामान्य ढंग से प्रतिक्रिया करती हैं। वक्ताओं ने तर्क दिया कि वेटलैंड्स, जंगलों और ग्लेशियर वाले वाटरशेड को बहाल करने और उनकी सुरक्षा करने से कश्मीर जैसे इलाकों को चरम स्थितियों से निपटने के लिए एक सुरक्षा कवच मिलता है, ऐसा सुरक्षा कवच जो अक्सर सिर्फ इंजीनियरिंग समाधानों से नहीं मिल पाता। बता दें कि पेयजल, सिंचाई तथा रोजमर्रा की अन्य गतिविधियों के लिए घाटी के लोग स्थानीय नदी-नालों पर ही निर्भर हैं।