पहलगाम की बैसरन घाटी फिर चहकने को बेताब...; आतंकी हमले के एक साल बाद भी पर्यटन की बहारों पर पसरा है सन्नाटा
पहलगाम की बैसरन घाटी एक साल पहले हुए आतंकी हमले के बाद से खामोश है। कभी पर्यटकों से गुलजार रहने वाली यह 'मिनी स्विट्जरलैंड' अब सन्नाटे में डूबी है। हम ...और पढ़ें

देवदार से आती हवाओं में आज भी घुला है मासूमों का दर्द और अपनों को खोने का मातम। फोटो: साहिल मीर
HighLights
आतंकी हमले के एक साल बाद भी बैसरन घाटी बंद।
पहलगाम की पर्यटन-निर्भर अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान।
हजारों घोड़े-खच्चर मालिकों और गाइडों की रोजी-रोटी प्रभावित।
रजिया नूर, श्रीनगर। 'मिनी स्विट्जरलैंड' बैसरन की गुमसुम वादियां...बर्फ से लदे पहाड़...देवदार के पेड़ों से आती ठंडी हवा के झोंके, मैदान में मखमली घास, चारों ओर फैली शांति और लिदर दरिया से बहती धारा। करीब एक वर्ष पहले बैसरन घाटी में आतंकियों की क्रूरता ने देश-दुनिया को हिला दिया था।
उस खूनी दोपहर के बाद से यहां की बहारें, जो कभी पर्यटकों की हंसी से गूंजती थीं, खामोश और गुमसुम हो गई। खौफ के कई माह बाद कश्मीर फिर से चहकने लगा है, लेकिन बैसरन में सन्नाटा पसरा है। उस दिन की दर्दनाक यादें, मासूमों का खून और अपनों को खोने वाले परिवारों का दर्द आज भी वहां की हवाओं में महसूस किया जा सकता है। पहलगाम से सटी बैसरन घाटी पर हमला पर्यटन पर निर्भर स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए झटका साबित हुआ।
हजारों लोग प्रभावित हुए जिनमें घोड़े-खच्चर वाले, टूरिस्ट गाइड, फोटोग्राफर, टैक्सी चालक शामिल हैं। हमले के बाद सुरक्षा कारणों से बंद किए कई पर्यटनस्थल फिर खोले गए, लेकिन बैसरन नहीं खुलने से स्थानीय लोग भुखमरी के कगार पर पहुंच गए हैं। उनका कहना है कि अनुच्छेद 370 हटने के बाद घाटी में पर्यटन ने रिकार्ड स्तर छुआ था, लेकिन हमले ने सारी मेहनत पर पानी फेर दिया।
अमरनाथ यात्रा भी शुरू होने वाली
बैसरन से सटे गांव के मुदस्सर ने कहा कि दो माह बाद अमरनाथ यात्रा भी शुरू होने वाली है। ऐसे में सरकार बैसरन को पर्यटकों के लिए खोले। आतंकी कभी नहीं चाहते कि कश्मीरी खुशहाल रहे। हम जब भी बैसरन के पास से गुजरते हैं तो हमारी आंखें नम हो उठती हैं।
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6000 घोड़े हैं...
पहलगाम में करीब 6000 घोड़े हैं जिनमें 5000 घोड़े व खच्चर हैं। इससे 10,000 लोगों का पेट पलता था। उक्त लोग पहलगाम के नजदीकी गांवों गनीशबल, आवूरा, आडो, बदरन, बदगाम, कुलर, दछनीपोरा, बटकूट, गुजरन, लोगरीपोरा आदि शामिल हैं, के हजारों लोग घोड़े, खच्चर, टूरिस्ट गाइड का काम कर अपनी अजीविका कमाते हैं।
क्या कहते हैं स्थानीय लोग
बटकूट गांव के फिरोज अहमद खान (घोड़े वाला) ने कहा कि मैं पहलगाम से बैसरन तक पर्यटकों को ले जाता था। बैसरन पहलगाम से पांच किलोमीटर की दूरी पर एक पहाड़ी पर है। प्रति पर्यटक से 1500 रुपये वसूलते थे। दिन में दो या तीन बार पर्यटकों को ले जाता। औसतन रोज की 3000 तक कमाई होती थी। एक साल से मेरी वह कमाई छूट गई है। अब मैं पहलगाम में ही सवारी करवाता हूं। यह नंबर आने पर निर्भर है। वहां कई घोड़े वाले हैं। जो कुछ मिलता है घोड़े के रखरखाव व इसके खानपान पर भी खर्च करना पड़ता है।
माजिद अहमद (घोड़े वाला) ने कहा, सच पूछें तो हम लोगों का रोजागर छिन गया है। हम भुखमरी के कगार पर पहुंच गए हैं। पर्यटकों को घोड़े पर पहलगाम से बैसरन की सैर करवाना हमारी कमाई का एक मात्र साधन था। हमले के बाद से बैसरन बंद रहने से हम कहीं के नहीं रहे हैं। हम कर्जदार हो गए हैं।
छोटी-छोटी जरूरतें पूरी करने के लिए संघर्ष कर रहे
हार्स एंड पोनी वाला एसोसिएशन स्टैंड नंबर 2 के अध्यक्ष रईस अहमद ने कहा कि बैसरन घाटी तक जाने के लिए कोई सीधी सड़क नहीं है। पर्यटक यहां तक पहुंचने के लिए मुख्य रूप से इन्हीं घोड़ों और खच्चरों का इस्तेमाल करते हैं। पहलगाम में 6000 घोड़ों में से करीब 5,000 घोड़े व खच्चर बैसरन के लिए उपलब्ध रहते थे। बैताब घाटी, आडू घाटी तथा पहलगाम के साथ सटे अन्य पर्यटनस्थल स्थलों की तुलना में बैसारन घाटी से नहीं की जाती है। सबसे नजदीक होने के कारण पहलगाम आने वाले अधिकांश पर्यटक बैसरन जाना ही पसंद करते थे। यह इलाका बहुत खूबसूरत है।
10 हजार लोग बैसरन पर निर्भर
पहलगाम से घोड़ा व खच्चर बुक होते हैं। कुल मिलाकर 10,000 से अधिक लोग बैसरन पर निर्भर रह अपना रोजगार कमाते थे। बीते एक वर्ष से ये लोग बेरोजगार बैठे हुए हैं। बैसरन में जो इंसानी जानों का नुसकान हुआ, उसकी भरपाई तो कभी नहीं जा सकेगी। यहां लोग छोटी-छोटी जरूरतें पूरी करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। हमारे बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है। पहलगाम के स्थानीय होटल कारोबारी मुदस्सर बताते हैं, “जो पर्यटक पहलगाम पहुँचते हैं, वह बैसरन जाने के लिए ललायित रहते ही हैं।