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    'गर्व है! बलिदानी का बेटा हूं', श्रीनगर में दर्द साझा कर आतंक पीड़ितों के छलके आंसू; नियुक्ति पत्रों से लौटी उम्मीद

    Updated: Wed, 05 Aug 2026 11:31 PM (IST)

    श्रीनगर में आतंकी हिंसा के शिकार परिवारों को नियुक्ति पत्र मिले, जिससे उन्हें वर्षों के संघर्ष के बाद सम्मान और उम्मीद मिली। जुनैद मुल्ला जैसे कई पीड़ ...और पढ़ें

    श्रीनगर में नियुक्ति पत्रों से लौटी लोगों की उम्मीद। फोटो जागरण

    श्रीनगर में नियुक्ति पत्रों से लौटी लोगों की उम्मीद। फोटो जागरण

    HighLights

    1. जुनैद मुल्ला ने पिता के बलिदान का दर्द साझा किया।

    2. आतंकी हिंसा पीड़ितों को वर्षों बाद मिला सम्मान और नौकरी।

    3. उपराज्यपाल सिन्हा की पहल से परिवारों को नई जिंदगी मिली।

    राज्य ब्यूरो, श्रीनगर। श्रीनगर के शेर-ए-कश्मीर इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस सेंटर (एसकेआइसीसी) का सभागार बुधवार को केवल नियुक्ति पत्र वितरण का मंच नहीं था, बल्कि उन परिवारों की पीड़ा, प्रतीक्षा और टूटे सपनों का साक्षी भी बना, जिन्होंने आतंकवाद की आग में अपने सबसे प्रिय रिश्ते खो दिए।

    वर्षों तक दिल में दफन दर्द उस समय शब्दों में बदल गया, जब आतंकी हिंसा के पीड़ित परिवारों ने मंच पर आकर अपनी जिंदगी की दास्तां सुनाई। सभागार में मौजूद कई लोगों की आंखें नम हो गईं।

    25 वर्षों तक हमारा परिवार अकेले संघर्ष करता रहा

    सबसे भावुक पल तब आया, जब मंच पर पहुंचे जुनैद मुल्ला ने अपनी कहानी सुनानी शुरू की। उनके पिता स्पेशल पुलिस आफिसर (एसपीओ) थे, जिनकी आतंकियों ने हत्या कर दी थी। उस समय जुनैद की उम्र महज दो वर्ष थी। पिता का चेहरा तक ठीक से याद नहीं, लेकिन उनके जाने के बाद का संघर्ष आज भी उनकी स्मृतियों में ताजा है।

    भर्राए गले से जुनैद ने कहा, 'मैंने बचपन से सिर्फ मुश्किलें देखीं। करीब 25 वर्षों तक हमारा परिवार अकेले संघर्ष करता रहा। हमारी सुध लेने वाला कोई नहीं था। कभी ऐसा नहीं लगा कि हमारे साथ कोई खड़ा है।'

    कुछ क्षण रुककर उन्होंने अपने मन की वह टीस साझा की, जो वर्षों से भीतर दबे ज्वालामुखी की तरह सुलग रही थी। 'मैं मां से कहता था कि मेरे पिता ने देश के लिए अपनी जान दी, लेकिन उनके बलिदान को तो भुला दिया गया। मां हमेशा कहती थीं कि एक दिन कोई आएगा और हमें न्याय मिलेगा, लेकिन मुझे कभी विश्वास नहीं हुआ।'

    लोगों की भर आईं आंखें, समाज में मिला सम्मान

    इतना कहते-कहते उनकी आंखें भर आईं। फिर चेहरे पर हल्की मुस्कान के साथ उन्होंने कहा, 'पांच अगस्त 2025 के बाद हमारे जीवन ने करवट ली। आज मैं गर्व से कह सकता हूं कि मैं एक बलिदानी का बेटा हूं। पहले लगता था कि मेरे पिता का बलिदान कहीं खो गया है।

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    लेकिन आज लगता है कि उनके त्याग को सम्मान मिला है। समाज में हमें वह पहचान और सम्मान मिला है, जिसका हम वर्षों से इंतजार कर रहे थे।' उपराज्यपाल मनोज सिन्हा की ओर देखते हुए जुनैद ने कहा, 'आज पहली बार महसूस हुआ कि हम अकेले नहीं हैं। आपने शहीद परिवारों के दर्द को समझा है। आप हमारे साथ परिवार की तरह खड़े हैं।'

    साझा किया दर्द

    सभागार में मौजूद हर व्यक्ति उस समय भावुक हो उठा, जब एक अन्य लाभार्थी ने अपने भाई की याद में बीते वर्षों का दर्द साझा किया। उसके भाई की वर्ष 2016 में आतंकवादियों ने हत्या कर दी थी। उसने कहा कि उस घटना ने पूरे परिवार की दुनिया बदल दी थी और वर्षों तक संघर्ष ही उनकी नियति बना रहा।

    एक अन्य लाभार्थी, जिनके पिता की 1996 में आतंकवादियों ने हत्या कर दी थी, ने कहा कि 'पिता के जाने के बाद हमारा बचपन, हमारे सपने और हमारा सहारा सब कुछ छिन गया था। इतने वर्षों बाद मिला पुनर्वास हमारे लिए सिर्फ सरकारी नौकरी नहीं, बल्कि नई जिंदगी की शुरुआत है।

    आज हम बेसहारा नहीं

    बारामुला से आए मन्नान ने कहा कि वर्ष 2018 में आतंकियों ने मेरे भाई की हत्या कर दी,क्योंकि हम आतंकियों के एजेंडे के खिलाफ थे और रहेंगे।मेरे भाई की मौत के सदमे ने हम सभी को तोड़ दिया। वही हमारा सहारा था। किसी ने हमें नहीं पूछा। पिछले साल आज ही के दिन उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने हमें रोजगार प्रदान किया। हम आज बेसहारा नहीं हैं।

    समारोह में बार-बार ऐसे क्षण आए, जब शब्दों से अधिक आंखें बोल रही थीं। किसी ने पिता खोए थे, किसी ने भाई, तो किसी ने परिवार का एकमात्र सहारा। आतंकवाद ने उनसे सिर्फ अपनों को नहीं छीना, बल्कि उनका बचपन, उनकी मुस्कान और भविष्य की अनेक उम्मीदें भी छीन ली थीं। वर्षों बाद जब नियुक्ति पत्र उनके हाथों में पहुंचे तो कई चेहरों पर पहली बार संतोष और सम्मान की झलक दिखाई दी।