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    सरला भट्ट हत्याकांड: 35 साल बाद यासीन मलिक समेत 5 आतंकियों पर चार्जशीट, कश्मीरी हिंदुओं को डराने की थी साजिश

    By Naveen NawazEdited By: Rahul Sharma
    Updated: Mon, 29 Jun 2026 06:52 PM (IST)

    कश्मीरी हिंदू नर्स सरला भट्ट के 1990 अपहरण और हत्या मामले में 35 साल बाद एसआईए ने आरोपपत्र दाखिल किया है। इसमें यासीन मलिक समेत पांच आतंकियों की भूमिक ...और पढ़ें

    कश्मीरी हिंदुओं की न्याय की लड़ाई में बड़ा मोड़, 1990 में मारी गईं नर्स सरला भट्ट केस में 737 पन्नों की चार्जशीट दाखिल।

    कश्मीरी हिंदुओं की न्याय की लड़ाई में बड़ा मोड़, 1990 में मारी गईं नर्स सरला भट्ट केस में 737 पन्नों की चार्जशीट दाखिल

    HighLights

    1. सरला भट्ट हत्याकांड में 35 साल बाद आरोपपत्र दाखिल।

    2. यासीन मलिक समेत पांच आतंकियों की भूमिका स्थापित।

    3. कश्मीरी हिंदुओं में दहशत फैलाने की थी साजिश।

    राज्य ब्यूरो, श्रीनगर। कश्मीर में आतंकवाद के शुरुआती दौर की सबसे विभत्स घटनाओं में शामिल कश्मीरी हिंदू नर्स सरला भट्ट के अपहरण और हत्या मामले में 35 वर्ष बाद जांच ने निर्णायक मोड़ लिया है।

    जम्मू-कश्मीर पुलिस की प्रदेश जांच एजेंसी (एसआईए) ने 737 पृष्ठों का आरोपपत्र दाखिल कर जेकेएलएफ के तत्कालीन प्रमुख कमांडर मोहम्मद यासीन मलिक समेत पांच आतंकियों की भूमिका स्थापित की है। एजेंसी का दावा है कि हत्या कश्मीरी हिंदुओं में दहशत फैलाने और उन्हें घाटी छोड़ने पर मजबूर करने की सुनियोजित आतंकी साजिश का हिस्सा थी।

    एसआईए के अनुसार जांच में मोहम्मद यासीन मलिक, खुर्शीद अहमद चालकू, अब्दुल हमीद शेख, मोहम्मद यूसुफ सोफी उर्फ इदरीस तथा गुलाम मोहम्मद टपलू की भूमिका सामने आई है। इनमें अब्दुल हमीद शेख, मोहम्मद यूसुफ सोफी और गुलाम मोहम्मद टपलू मारे जा चुके हैं, जबकि यासीन मलिक फिलहाल दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद हैं।

    उन्हें आतंकवाद के वित्तपोषण और आतंकी गतिविधियों से जुड़े मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाई जा चुकी है। इसके अलावा वे रुबैया सईद अपहरण कांड और 1990 में भारतीय वायुसेना के चार कर्मियों की हत्या से जुड़े मामलों में भी मुकदमे का सामना कर रहे हैं। एसआईए ने फरार आतंकी खुर्शीद अहमद चालकू के विरुद्ध उद्घोषणा (प्रोक्लेमेशन) की कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी है। एजेंसी के अनुसार उसके पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (पीओजेके) भाग जाने की आशंका है।

    एसकेआईएमएस से अगवा, अगली सुबह गोलियों से छलनी मिला शव

    एसकेआईएमएस, सौरा में स्टाफ नर्स के रूप में कार्यरत सरला भट्ट का 18 अप्रैल 1990 को अस्पताल के निकट से अपहरण कर लिया गया था। उन्हें अमानवीय यातनाएं और शारीरिक प्रताड़ना देने के बाद श्रीनगर के मल्लाबाग स्थित उमर कालोनी में स्वचालित राइफल से गोली मारकर हत्या कर दी गई। अगले दिन गोलियां से छलनी उनका शव बरामद हुआ। यह घटना कश्मीर में आतंकवाद के शुरुआती दौर के सबसे निर्मम अपराधों में गिनी जाती है।

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    गवाह, फोरेंसिक और तकनीकी साक्ष्यों से जुड़ी कड़ियां

    आतंकवाद के चरम दौर में भय और आतंक के कारण गवाह सामने नहीं आए और मामला दशकों तक अनसुलझा रहा। 18 मार्च 2024 को पुलिस महानिदेशक के आदेश पर इसकी जांच एसआईए को सौंपी गई। एजेंसी ने संरक्षित गवाहों के बयान, प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही, फोरेंसिक एवं बैलिस्टिक विश्लेषण, मेडिकल साक्ष्य, दस्तावेजी रिकॉर्ड, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य तथा व्यापक फील्ड जांच के आधार पर घटनाक्रम का पुनर्निर्माण किया और 737 पृष्ठों का आरोपपत्र तैयार किया।

    मुखबिर की कहानी फर्जी, हत्या थी पहले से तय

    एसआईए की जांच में यह भी स्पष्ट हुआ कि सरला भट्ट को मुखबिर बताने का आरोप पूरी तरह झूठा और मनगढ़ंत था। एजेंसी के अनुसार यह केवल उनकी पूर्वनियोजित हत्या को उचित ठहराने के लिए आतंकवादियों द्वारा गढ़ा गया बहाना था। 

    जांच के अनुसार सरला भट्ट की हत्या कोई अलग-थलग घटना नहीं थी, बल्कि जेकेएलएफ की सुनियोजित आतंकी साजिश का हिस्सा थी। इसका उद्देश्य विशेष रूप से कश्मीरी पंडित समुदाय सहित आम नागरिकों में भय का माहौल पैदा करना, उनके पलायन की परिस्थितियां निर्मित करना तथा संगठन के अलगाववादी एजेंडे को आगे बढ़ाना था।

    आरोपपत्र में भारतीय दंड संहिता (आरपीसी) की धाराओं 364, 341, 302, 201, 120-बी, टाडा अधिनियम तथा भारतीय शस्त्र अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत अपराध स्थापित किए गए हैं।

    एसआईए का संदेश: समय बीतेगा, कानून नहीं भूलेगा

    एसआईए ने कहा है कि 35 वर्ष बाद आरोपपत्र दाखिल होना यह स्पष्ट संदेश है कि आतंकवाद के मामलों में समय कभी भी अपराधियों की ढाल नहीं बन सकता। चाहे कितना भी समय बीत जाए, आतंकवादी अपराधों के दोषियों को कानून के समक्ष जवाबदेह ठहराने की प्रक्रिया जारी रहेगी। एजेंसी ने इसे आतंकवाद के पीड़ितों, विशेषकर कश्मीरी पंडित समुदाय, के लिए न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया है।

    केस बना पुराने आतंकी मामलों की जांच का नया आधार

    सरला भट्ट हत्याकांड में चार्जशीट दाखिल होना 1989-90 के आतंकवाद के दौरान कश्मीरी हिंदुओं के खिलाफ हुई हत्याओं और अत्याचारों से जुड़े मामलों में न्याय की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। तीन दशक से अधिक समय से विस्थापित समुदाय इन मामलों की निष्पक्ष जांच और दोषियों को सजा दिलाने की मांग करता रहा है।

    वर्ष 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने 1990 के दशक में कश्मीरी हिंदुओं की हत्याओं की दोबारा जांच की मांग वाली याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि घटना के लगभग 27 वर्ष बाद साक्ष्य जुटाना कठिन होगा। बाद में स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराने की मांग वाली क्यूरेटिव याचिका भी स्वीकार नहीं की गई।

    इसके बाद वर्ष 2023 में उपराज्यपाल मनोज सिन्हा के निर्देश पर 1990 के दशक के लंबित मामलों की समीक्षा शुरू हुई। इसी क्रम में सरला भट्ट हत्याकांड सहित कई पुराने मामलों की जांच दोबारा शुरू की गई। हालांकि यह मामला सैकड़ों लंबित मामलों में से केवल एक है, फिर भी चार्जशीट दाखिल होने को कश्मीरी हिंदू समुदाय की लंबे समय से चली आ रही न्याय की लड़ाई में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।