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    प्राणकोट नरसंहार: रूह कंपा देता है अपनों की हत्या का वह दृश्य, आतंकियों ने 27 लोगों को उतारा था मौत के घाट

    Updated: Sat, 18 Apr 2026 01:10 PM (IST)

    तलवाड़ा के विस्थापितों ने 1998 के प्राणकोट नरसंहार के पीड़ितों को श्रद्धांजलि दी। इस आतंकी घटना में हिज्बुल मुजाहिदीन ने 27 निर्दोष लोगों की बेरहमी से ...और पढ़ें

    प्राणकोट नरसंहार: विस्थापितों ने 1998 की आतंकी घटना के पीड़ितों को दी मार्मिक श्रद्धांजलि

    प्राणकोट नरसंहार: विस्थापितों ने 1998 की आतंकी घटना के पीड़ितों को दी मार्मिक श्रद्धांजलि

    HighLights

    1. 1998 प्राणकोट नरसंहार के 27 पीड़ितों को श्रद्धांजलि दी गई

    2. हिज्बुल मुजाहिदीन आतंकियों ने परिवारों को बेरहमी से खत्म किया

    3. विस्थापित आज भी उस त्रासदी का दर्द झेल रहे हैं

    राजेश डोगरा, रियासी। तलवाड़ा के विस्थापितों ने अपने प्रदर्शन को लगातार तीसरे दिन शनिवार को जारी रखते हुए वर्ष 1998 के प्राणकोट नरसंहार में जान गंवाने वाले 27 निर्दोष लोगों की याद में मार्मिक श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किया।

    जैसे ही उस काली रात का जिक्र हुआ, माहौल गमगीन हो गया और लोगों की आंखें नम हो गईं। उस आतंकी घटना में कई लोगों का लगभग पूरा परिवार ही खत्म हो गया था।

    वक्ताओं और पीड़ित परिवारों ने बताया कि उस रात हिज्बुल मुजाहिदीन के आतंकियों ने पूरे इलाके को चारों ओर से घेर लिया था। घरों में घुसे आतंकियों ने एक-एक कर लोगों को निशाना बनाना शुरू कर दिया। परिवारों के सामने ही उनके अपनों को बेरहमी से मौत के घाट उतारा जा रहा था, लेकिन डर और बेबसी इतनी थी कि कोई कुछ कर नहीं पा रहा था।

    उन्होंने बताया कि स्थानीय निवासी सोभा राम के घर में घुसकर आतंकियों ने सोभा राम, उनकी माता रेस्मो देवी, उनके दो बेटे स्वर्ण सिंह और रशपाल सिंह, तीन बेटियां बिट्टो देवी, बंतो देवी, कल्लो देवी तथा बहू कांता देवी की निर्मम हत्या कर दी थी।

    आतंकियों ने कुल्हाड़ी, लोहे की राड और कुदाल से पीट-पीट कर हत्या की। वहीं, कुछ लोगों को गोलियों से भी निशाना बनाया गया। यह मंजर इतना भयावह था कि जिसने भी देखा, वह आज तक उसे भूल नहीं पाया।

    परिवार के कुछ सदस्यों ने किसी तरह अपनी जान बचाई। उस समय चार वर्षीय रानो देवी और छह वर्षीय बल्लो देवी मवेशियों के बाड़े में छिप गईं, जबकि उनके दो भाई दलीप सिंह और संजीव सिंह खेतों की ओर भागकर छिप गए। इन बच्चों ने अपनी आंखों के सामने अपने पूरे परिवार को खत्म होते देखा और किसी तरह खुद को बचाया।

    इस घटना में मनीराम का पूरा परिवार खत्म हो गया जिसमें लगभग आठ लोग मारे गए, जबकि मोहनलाल के परिवार से भी मात्र उसकी पत्नी विद्या देवी बचीं, बाकी चार लोगों को आतंकियों ने मौत के घाट उतार दिया। चंदाराम का पूरा परिवार भी खत्म कर दिया गया, जिसमें पांच लोगों की हत्या की गई थी।

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    प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि कई ने अपनी आंखों के सामने अपने माता-पिता, भाई-बहनों और बच्चों को तड़प-तड़प कर दम तोड़ते देखा। दिल दहला देने वाली बात यह थी कि जो यह मंजर देख रहे थे, उन्हें भी पता था कि अगला नंबर उनका ही है। पहले अपनों को मरते देखा और फिर खुद भी उसी क्रूरता का शिकार बन गए। चीख-पुकार और खौफ से भरी वह रात आज भी लोगों के दिलों में जिंदा है।

    पीड़ित परिवारों ने कहा कि उस घटना ने उनकी जिंदगी हमेशा के लिए बदल दी। कई मासूम बच्चे अनाथ हो गए और वर्षों बाद भी वह दर्द और डर कम नहीं हुआ है। विस्थापितों ने कहा कि वे इस दर्दनाक त्रासदी को कभी नहीं भूल सकते, जिसने न केवल उन्हें अपनों को खोया बल्कि इसी घटना के बाद रातोंरात पलायन शुरू हो गया था और आज भी विस्थापन का दंश झेल रहे हैं। कार्यक्रम के अंत में दो मिनट का मौन रखकर दिवंगत आत्माओं को श्रद्धांजलि अर्पित की गई।