Dhanbad Accident: जब डैम टूटने से खदान में घुसा था पानी, 29 मजदूरों की डूबने से मौत
धनबाद के बागडिगी कोलियरी में 2 फरवरी 2001 को हुए भीषण हादसे की 25वीं बरसी पर यह त्रासदी फिर याद की गई। एक बांध टूटने से खदान में पानी भर गया, जिससे 29 ...और पढ़ें
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कोयला खदान में खनन करते मजदूर। फाइल फोटो
HighLights
2001 बागडिगी खदान हादसे में 29 खनिकों ने जान गंवाई।
पुराना बांध टूटने से खदान में पानी का सैलाब आया।
सलीम अंसारी ने सात दिन बाद मौत को मात दी।
श्रवण कुमार, लोदना। समय का पहिया भले ही आगे बढ़ गया हो, लेकिन 2 फरवरी की तारीख आते ही झरिया के बागडिगी कोलियरी के श्रमिकों और उनके परिवारों के जख्म फिर से हरे हो जाते हैं।
2001 का वह भयावह मंजर, जब जमीन के सैकड़ों फीट नीचे काला हीरा निकालने गए 29 श्रमिक काल के गाल में समा गए थे। हादसा आज भी लोगों के कलेजे को दहला देता है। आज इस भीषण त्रासदी की 25वीं बरसी है।
दीवार टूटी और मौत बनकर घुसा पानी
किसे पता था कि फरवरी की वह दो तारीख बागडिगी के लिए काली साबित होगी। दोपहर के करीब 12 बजे थे, जब लोदना क्षेत्र की बागडिगी कोलियरी की 12 नंबर खदान में अचानक एक जोरदार धमाके जैसी आवाज हुई।
वर्षों पुराना 1962 से संचित डैम का बांध टूट गया और लाखों गैलन पानी खदान के भीतर घुस गया। खदान के भीतर काम कर रहे श्रमिकों को संभलने तक का मौका नहीं मिला।
प्रशासनिक तंत्र और बचाव अभियान
हादसे की खबर मिलते ही चारों ओर अफरा-तफरी मच गई। उस वक्त के दिग्गज प्रशासनिक अधिकारी और नेता, जिनमें तत्कालीन आयुक्त वी. क्रिस्पोट्टा, एसपी अब्दुल गनी मीर और पूर्व मंत्री बच्चा सिंह शामिल थे।
मौके पर डटे रहे। खदान की गहराई और पानी के दबाव को देखते हुए मुंबई से विशेष गोताखोरों की टीम बुलाई गई, लेकिन उस दौर की तकनीक और संसाधनों की कमी ने रेस्क्यू को बेहद धीमा बना दिया।
कई दिनों तक खदान से पानी निकालने का काम चलता रहा। रेस्क्यू ऑपरेशन के बाद जब उम्मीदें खत्म होने लगीं, तब परिजनों के आग्रह पर शव निकालने की प्रक्रिया शुरू हुई। 5 फरवरी की आधी रात को पहला शव बाहर निकाला गया। जिसकी पहचान उसके कैप लैंप नंबर से हुई।
मौत को मात देकर सलीम ने लिखी संघर्ष की नई इबारत
2 फरवरी 2001 की वह काली सुबह को बागडिगी कोलियरी में हुए उस भीषण हादसे को याद कर आज भी रूह कांप उठती है। यह कहानी केवल 29 मजदूरों की जलसमाधि की नहीं है। बल्कि यह कहानी है सलीम अंसारी की, जिन्होंने सात दिनों तक मौत के साये में रहकर जिंदगी की पुकार सुनी और मौत को शिकस्त दी।
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168 घंटे, अंधेरा, प्यास और अटूट जिजीविषा
सात नंबर सीम में ड्यूटी पर तैनात सलीम अंसारी और उनके साथी उस समय हतप्रभ रह गए, जब अचानक एक धमाके के साथ पानी का सैलाब आ गया। पलक झपकते ही वहां मौजूद 29 मजदूर पानी के आगोश में समा गए।
सलीम बताते हैं कि चारों तरफ मौत का सन्नाटा और पानी का शोर था। वह किसी तरह कोयले के एक ऊंचे ढेर पर चढ़ गए। सात दिनों तक न अन्न का दाना था, न पीने को साफ पानी। प्यास असहनीय होती, तो खदान का वही मटमैला पानी पीकर खुद को जिंदा रखा।

उन्होंने बताया कि उनकी आंखों के सामने ही कई साथियों ने पानी में डूबकर दम तोड़ दिया। तत्कालीन एसीएम प्रसाद साहब रेस्क्यू टीम के साथ आए, उनको देख हम चीख उठे थे। उन्होंने देखा और हमको निकाल कर बाहर ले गए।
हादसे का कारण सुरक्षा मानकों की अनदेखी
जांच और रिपोर्टों के अनुसार, यह कोई प्राकृतिक आपदा नहीं बल्कि एक मानवीय चूक थी। इस हादसे ने सुरक्षा मानकों की घोर अनदेखी को उजागर किया था।
पुराना बांध में 1962 से खदान के एक डैम में पानी भरा था। एक सप्ताह से बांध से पानी का रिसाव हो रहा था, लेकिन सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम नहीं किए गए। बांध टूटने से पानी सैलाब सीधे खदान में जा घुसा, जिससे कामगारों को संभलने का मौका तक नहीं मिला।
आग की भेंट चढ़ी खदान, बलिदान स्मारक के अस्तित्व पर भी संकट
दुर्भाग्यवश, जिस खदान ने विश्व मानचित्र पर अपनी पहचान बनाई, वह आज भूमिगत आग की चपेट में आने के कारण बंद हो चुकी है। खदान के चानक बालू व ओबी से भर दिए गए हैं।
इतना ही नहीं, आसपास चल रही अन्य परियोजनाओं के कारण अब यहां बने बलिदान स्मारक और स्थानीय बागडिगी कोलियरी बस्ती के अस्तित्व पर भी खतरा मंडराने लगा है।
हर साल 2 फरवरी को बीसीसीएल के सीएमडी, डीटी, डीपी समेत कई वरीय अधिकारी, श्रमिक और यूनियन प्रतिनिधि व स्थानीय लोग स्मारक पर जुटते हैं।
मोमबत्तियां जलाकर पुष्प अर्पित करते हैं और उन 29 बलिदानियों को याद करते हैं, जिन्होंने देश के कोयला उत्पादन के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी।