धनबाद में सूखे से जूझते किसानों को कृषि विभाग की बड़ी सलाह: वैकल्पिक खेती से मिलेगा लाभ
Jharkhand Agricultureः धनबाद में मानसूनी बारिश की कमी से धान की खेती प्रभावित हुई है, जिससे किसानों को भारी नुकसान का डर है। ...और पढ़ें

कम बारिश में वैकल्पिक खेती से किसानों को नहीं होगा नुकसान। (प्रतीकात्मक फोटो)
HighLights
मानसून की कमी से धान की खेती पर संकट।
कृषि विभाग ने वैकल्पिक फसलें अपनाने की सलाह दी।
मोटे अनाज के बीजों पर 50% सरकारी अनुदान।
जागरण संवाददाता, धनबाद। Dhanbad Agriculture Department जिले में मानसूनी बारिश की बेरुखी ने एक बार फिर किसानों की उम्मीदों और मेहनत पर पानी फेर दिया है। जून और जुलाई का महत्वपूर्ण समय लगभग बीतने को है लेकिन सामान्य से काफी कम हुई बारिश के कारण जिले ज्यादातर खेतों में धान की रोपनी नहीं हो सकी।
जिन खेतों में इस मौसम में धान की हरी-भरी फसल लहलहाया करती थी वहां के खेत आज सूखे पड़े है। लगातार सूखाड़ की मार झेल रहे किसानों को अब अपनी जमा-पूंजी, बीज और महीनों की मेहनत डूबने का गहरा डर सता रहा है।
खेतों में सिंचाई के समुचित साधन न होने, विशेषकर टांड़ और ढलान वाली भूमियों में पानी न ठहरने के कारण किसानों के सामने परिवार के भरण-पोषण पर भी गंभीर संकट उत्पन्न हो गया है।
वहीं किसानों की इस बदहाली और संभावित आर्थिक तबाही की गंभीरता को समझते हुए राज्य के कृषि, पशुपालन एवं सहकारिता विभाग ने किसानों को राहत पहुंचाने और आर्थिक नुकसान से उबारने के लिए एक विशेष रणनीति तैयार की है।
कृषि वैज्ञानिकों एवं विभागीय अधिकारियों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के इस दौर में केवल धान जैसी अधिक पानी मांगने वाली फसल पर निर्भर रहना जोखिम भरा है। कहा ऊंची (टांड़) और मध्यम ढलान वाली भूमि पर धान बोने के बजाय, कम पानी, कम लागत और कम समय में पककर तैयार होने वाली वैकल्पिक फसलें मड़ुआ, अरहर, मूंग, उड़द और मक्का की बुवाई करें।
जिला कृषि पदाधिकारी अभिषेक मिश्रा ने बताया कि किसानों को बीजों की किल्लत न हो इसके लिए विभाग राजगंज, गोविंदपुर, ओझाडीह कटनियां (टुंडी), लटानी फतेहपुर (पूर्वी टुंडी) तथा विराजपुर समेत जिले के विभिन्न समितियों के केंद्रों पर मोटे अनाज के उन्नत बीज 50 प्रतिशत सरकारी अनुदान पर उपलब्ध करा दी है।
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उन्होंने कम बारिश की वर्तमान स्थिति को देखते हुए किसानों से टांड़ भूमि पर धान लगाने का जोखिम न लेंने की अपील की है। अभिषेक मित्रा ने बताया कि मड़ुआ व दलहनी फसलों को धान की तुलना में केवल एक-चौथाई पानी की जरूरत होती है।
यदि बुवाई के बाद 20-25 दिनों तक बारिश रुक भी जाए तब भी ये फसलें नष्ट नहीं होतीं। कहा मूंग व उड़द मात्र 85 दिनों में तथा मड़ुआ लगभग 110 दिनों में तैयार हो जाता है। समय पर खेत खाली होने से अगली रबी फसल की बुवाई प्रभावित नहीं होगी।
उन्होंने कहा कि टांड़ व मध्यम भूमि खाली छोड़ने के बजाय इन फसलों से अच्छी उपज ली जा सकती है जबकि पानी वाले निचले क्षेत्रों में ही धान लगाना फायदेमंद है। यही नहीं उन्होने कहा कि झारखंड मिलेट मिशन योजना के तहत किसानों को प्रति एकड़ 3,000 रुपये का अनुदान मिलने से खेती की लागत शून्य हो जाती है और पूरा उत्पादन शुद्ध लाभ में बदल जाता है।
वैकल्पिक खेती से किसानों को मिलने वाले प्रमुख लाभ
कम बारिश की वर्तमान स्थिति को देखते हुए किसान भाई टांड़ भूमि पर धान लगाने का जोखिम न लें। पैक्स केंद्रों पर मड़ुआ, मूंग और अरहर के उन्नत बीज उपलब्ध कराए गए हैं। किसान समय रहते इनका लाभ उठाएं तो संभावित नुकसान से बच सकेंगे।
अभिषेक मिश्रा, कृषि पदाधिकारी, धनबाद