दुमका के नागबासुकी मंदिर में उमड़ेगा आस्था का सैलाब, भव्य मेले में आज जुटेंगे 4 राज्यों के श्रद्धालु
दुमका के बिशनपुर स्थित प्राचीन नागबासुकी मंदिर में आद्रा नक्षत्र के समापन पर 7 जुलाई को भव्य मेला लगेगा, जिसमें झारखंड, बिहार और पश्चिम बंगाल से हजारो ...और पढ़ें

नागबासुकी मंदिर। फाइल फोटो
HighLights
नागबासुकी मंदिर में 7 जुलाई को लगेगा भव्य मेला।
सर्पदंश से मुक्ति और मनोकामना पूर्ति की है मान्यता।
झारखंड, बिहार, बंगाल से हजारों श्रद्धालु होंगे शामिल।
संवाद सहयोगी, सरैयाहाट (दुमका)। जिले के सरैयाहाट प्रखंड स्थित बिशनपुर गांव का प्राचीन नागबासुकी मंदिर आस्था व विश्वास का प्रमुख केंद्र है। बिहार-झारखंड की सीमा पर स्थित इस मंदिर में आद्रा नक्षत्र के समापन अवसर पर मंगलवार सात जुलाई को भव्य मेला लगेगा। इसमें झारखंड, बिहार और पश्चिम बंगाल से हजारों श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना है।
मंदिर को लेकर मान्यता है कि यदि किसी व्यक्ति को सर्पदंश हो जाए, तो यहां पूजा-अर्चना कर बाबा का नीर (पवित्र जल) पिलाने से उसकी जान बच जाती है। श्रद्धालुओं का यह भी विश्वास है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई हर कामना पूरी होती है। संतान प्राप्ति, पुत्र-पुत्री के विवाह व अन्य मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए भी बड़ी संख्या में लोग यहां माथा टेकने आते हैं।
300 साल पुरानी परंपरा
स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार लगभग 300 वर्ष पूर्व बनैली रियासत के राजघराने की ओर से हर वर्ष मंदिर में दूध और लावा भेजा जाता था। राजा कृत्यानंद सिंह के समय तक यह परंपरा जारी रही। बनैली रियासत के राजाओं की इस मंदिर में गहरी आस्था थी।
मंदिर की स्थापना से जुड़ी लोककथा भी लोगों के बीच प्रचलित है। यह क्षेत्र कभी बंजर हुआ करता था। जहां पर्याप्त वर्षा नहीं होती थी और मड़ुआ के अलावा कोई फसल नहीं उगती थी। इसी स्थान पर मोती राउत नामक व्यक्ति अपनी फसल की रखवाली करते हुए एक पत्थर पर सो गया।
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स्वप्न में उसे उस पत्थर पर प्रतिदिन जल चढ़ाने का संकेत मिला। अगले दिन से उसने ऐसा करना शुरू किया। जिसके बाद क्षेत्र में अच्छी वर्षा हुई और हरियाली लौट आई। उसने यह बात ग्रामीणों को बताई। जिसके पश्चात यहां नागबासुकी मंदिर की स्थापना हुई। तभी से यह मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है।
आद्रा नक्षत्र में होती है विशेष पूजा
आद्रा नक्षत्र के दौरान यहां 15 दिनों तक विशेष पूजा-अर्चना होती है। जिसका समापन भव्य मेले के साथ होता है। इस दौरान बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल से हजारों श्रद्धालु मंदिर पहुंचते हैं। श्रद्धालु बाबा को दूध और लावा अर्पित करते हैं तथा मनोकामना पूरी होने पर बलि भी चढ़ाते हैं।
अंतिम दिन मंदिर परिसर और आसपास का पूरा क्षेत्र श्रद्धालुओं की भारी भीड़ से खचाखच भर जाता है। मेला क्षेत्र में श्रद्धालुओं की भीड़ को देखते हुए स्थानीय प्रशासन की ओर से सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए गए हैं। विधि-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस बल के साथ दंडाधिकारियों की भी तैनाती की गई है।