शहर की सुरक्षा करने वाले खुद असुरक्षित, टपकती छत और दरकती दीवारों के बीच गुजर रही हजारीबाग में पुलिस जवानों की रातें
हजारीबाग पुलिस लाइन में करीब 79 सरकारी क्वार्टर जर्जर हालत में हैं, जहाँ पुलिसकर्मी अपने परिवारों के साथ असुरक्षित माहौल में रहने को मजबूर हैं। छत टपक ...और पढ़ें

हजारीबाग पुलिस लाइन के 79 क्वार्टर जर्जर हालत में। जागरण
HighLights
हजारीबाग पुलिस लाइन के 79 क्वार्टर जर्जर हालत में।
छत टपकती, दीवारें दरकती, सांप-बिच्छू का खतरा बना रहता।
विनय कुशवाहा, हजारीबाग। शहर और जिले की सुरक्षा का जिम्मा संभालने वाले पुलिस जवान खुद जर्जर सरकारी आवासों में रहने को मजबूर हैं। हजारीबाग पुलिस लाइन स्थित सीटीएस कालोनी के करीब 79 सरकारी क्वार्टर वर्षों से बदहाल हैं। इन्हीं आवासों में पुलिसकर्मी अपने परिवार के साथ रहते हैं और यहीं से रोज ड्यूटी पर निकलते हैं।
बरसात शुरू होते ही इन मकानों की हालत और खतरनाक हो जाती है। टपकती छत, दरकती दीवारें और जर्जर दरवाजे-खिड़कियां हर पल किसी बड़े हादसे की आशंका पैदा कर रही हैं। करीब पांच से छह दशक पहले भवन प्रमंडल द्वारा बनाए गए इन क्वार्टरों की वर्षों से समुचित मरम्मत नहीं हुई है। अधिकांश मकानों की छत से बारिश का पानी टपकता है।
कई कमरों में पानी भर जाता है। मजबूरी में पुलिसकर्मियों ने छत पर प्लास्टिक की मोटी चादर बिछा रखी है, लेकिन इससे भी राहत नहीं मिलती। पूरी रात बाल्टी और बर्तनों में पानी भरते हुए परिवार रात गुजारने को विवश हैं। स्थिति इतनी खराब है कि कई मकानों की दीवारों में गहरी दरारें पड़ चुकी हैं। प्लास्टर झड़ चुका है और कई जगह सरिया बाहर निकल आया है। दरवाजे और खिड़कियां भी टूट चुकी हैं।
कई परिवारों ने लकड़ी और प्लास्टिक के सहारे इन्हें किसी तरह उपयोग लायक बना रखा है। टूटे दरवाजों और खिड़कियों से रात के समय सांप, बिच्छू और अन्य जहरीले जीव-जंतु घरों में घुस आते हैं, जिससे परिवारों में हमेशा भय बना रहता है। पुलिसकर्मियों का कहना है कि तेज बारिश और आंधी के दौरान पूरी रात जागकर बितानी पड़ती है।
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डर रहता है कि कहीं छत या दीवार का हिस्सा गिरकर कोई बड़ा हादसा न हो जाए। कई क्वार्टर अब रहने योग्य नहीं बचे हैं, लेकिन वैकल्पिक व्यवस्था नहीं होने के कारण जवान इन्हीं मकानों में रहने को मजबूर हैं। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि पुलिसकर्मियों के वेतन से हर महीने लगभग 10 प्रतिशत राशि आवास किराये के रूप में काटी जाती है, लेकिन बदले में सुरक्षित आवास नहीं मिल रहा।
जवानों का कहना है कि जब विभाग नियमित रूप से किराया वसूल रहा है तो रहने योग्य आवास उपलब्ध कराना भी उसकी जिम्मेदारी है। जानकारी के अनुसार इन भवनों का निर्माण करीब 50 से 60 वर्ष पहले हुआ था। इसके बाद न तो इनकी व्यापक मरम्मत हुई और न ही इन्हें कंडम घोषित कर नए आवास निर्माण की दिशा में ठोस पहल की गई। परिणामस्वरूप इनकी स्थिति लगातार खराब होती गई।
पुलिस लाइन के जर्जर आवासों की मरम्मत और नए भवनों के निर्माण के लिए कई बार संबंधित विभाग को पत्र लिखा गया है। उम्मीद है कि जल्द सकारात्मक निर्णय लेकर पुलिसकर्मियों को राहत दी जाएगी।'
-अनिरुद्ध कुमार, अध्यक्ष, झारखंड पुलिस एसोसिएशन
बारिश शुरू होते ही सबसे ज्यादा परेशानी होती है। पूरी रात छत से पानी टपकता रहता है। टूटे दरवाजे और खिड़कियों से सांप और जहरीले कीड़े घर में आ जाते हैं। बच्चों के साथ हर समय डर के साये में रहना पड़ता है।
-एक पुलिस जवान की पत्नी