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    हूल दिवस विशेष: हजारीबाग के टाटीझरिया से उठी थी अंग्रेजों और जमींदारों के खिलाफ बगावत की आवाज

    Updated: Tue, 30 Jun 2026 08:01 AM (GMT+05:30)

    Hool Diwas Special: हजारीबाग के टाटीझरिया स्थित झरपो राजगढ़ संथाल हूल विद्रोह का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। यहां आदिवासियों ने डुगडुगी बजाकर अंग्रेजों ...और पढ़ें

    झरपो राजगढ़ में डुगडुगी बजाकर जुटे थे सैकड़ों आदिवासी, तीर-धनुष और भाला लेकर शुरू किया था आंदोलन।

    झरपो राजगढ़ में डुगडुगी बजाकर जुटे थे सैकड़ों आदिवासी, तीर-धनुष और भाला लेकर शुरू किया था आंदोलन।

    HighLights

    1. झरपो राजगढ़ संथाल हूल विद्रोह का महत्वपूर्ण साक्षी रहा।

    2. आदिवासियों ने डुगडुगी बजाकर अंग्रेजों के खिलाफ बगावत की।

    3. आदिवासी जागरूकता और अधिकारों की लड़ाई का केंद्र बना।

    मिथिलेश पाठक, टाटीझरिया (हजारीबाग)। संथाल हूल की चर्चा होते ही सिद्धो-कान्हू, चांद और भैरव की वीरगाथा याद आती है, लेकिन हजारीबाग के टाटीझरिया प्रखंड का झरपो गांव भी इस ऐतिहासिक जनविद्रोह का महत्वपूर्ण साक्षी रहा है।

    अंग्रेजी हुकूमत, जमींदारों और ठेकेदारों के शोषण के खिलाफ यहां के आदिवासियों ने भी संगठित होकर बगावत का शंखनाद किया था। आज भी झरपो में मौजूद राजगढ़ के अवशेष उस ऐतिहासिक संघर्ष की गवाही देते हैं।

    झरपो राजगढ़ पर आदिवासियों ने बोला था धावा

    इतिहासकारों और स्थानीय लोगों के अनुसार, झरपो में तत्कालीन राजा कामाख्या नारायण सिंह का प्रशासनिक महल हुआ करता था। हूल आंदोलन के दौरान क्षेत्र के आदिवासियों ने इस महल पर भी धावा बोला और अंग्रेजी शासन तथा सामंती व्यवस्था के खिलाफ अपने विरोध को मुखर किया।

    आंदोलन को गति देने के लिए आसपास के गांवों से सैकड़ों आदिवासी पारंपरिक हथियारों—तीर-धनुष, भाला और परसा—के साथ झरपो में एकत्रित हुए थे।

    डुगडुगी बजाकर जुटे थे सैकड़ों आदिवासी, रांची के लिए हुए थे रवाना

    बताया जाता है कि झरपो राजगढ़ में डुगडुगी बजाकर लोगों को एकजुट किया गया। इसके बाद बैलगाड़ियों पर सवार होकर आंदोलनकारियों का जत्था रांची की ओर रवाना हुआ, ताकि इस जनआंदोलन को व्यापक स्वरूप दिया जा सके।

    उस दौर में झरपो क्षेत्र हूल क्रांति का प्रमुख केंद्र बन गया था। सिमराढाब, करंबा, पूतो, हरदिया, पानिमाको, सिजहुवा, जेरूवाडीह समेत आसपास के कई गांवों के आदिवासी इसी स्थल से आंदोलन में शामिल हुए थे।

    शहीदों की याद और आदिवासी जागरूकता का केंद्र

    स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि लंबे समय तक हूल क्रांति की स्मृति में झरपो में लोगों का जुटान होता रहा और शहीदों को श्रद्धांजलि दी जाती रही। क्षेत्र के लोगों का कहना है कि बाद के वर्षों में भी झरपो आदिवासी जागरूकता और अधिकारों की लड़ाई का केंद्र बना रहा।

    कई अवसरों पर झारखंड आंदोलन के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन और आदिवासी नेता बबन हांसदा भी इस क्षेत्र में पहुंचे तथा डुगडुगी बजाकर लोगों को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक और संगठित होने का संदेश दिया।

    विरासत को सहेजने की जरूरत

    स्थानीय लोगों का मानना है कि झरपो की इस ऐतिहासिक विरासत को संरक्षित कर नई पीढ़ी तक पहुंचाने की जरूरत है, ताकि हजारीबाग की इस गौरवशाली भूमिका को भी इतिहास में उचित स्थान मिल सके।

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