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    ISL संकट: करोड़ों की फिजूलखर्ची में डूबे बड़े क्लब, समझदारी ने जमशेदपुर एफसी को बचाया

    Updated: Wed, 28 Jan 2026 08:30 PM (GMT+05:30)

    इंडियन सुपर लीग में बड़े फुटबॉल क्लबों को भारी वित्तीय घाटे का सामना करना पड़ रहा है। सैलरी कैप का उल्लंघन कर खिलाड़ियों पर अंधाधुंध खर्च करने के बाद, ...और पढ़ें

    फाइल फोटो।

    फाइल फोटो।

    HighLights

    1. बड़े ISL क्लबों ने सैलरी कैप का उल्लंघन कर भारी खर्च किया।

    2. जमशेदपुर एफसी ने वित्तीय अनुशासन से खुद को संकट से बचाया।

    3. खिलाड़ी वेतन कटौती के खिलाफ, अनुबंध का सम्मान चाहते हैं।

    जागरण संवाददाता, जमशेदपुर। 14 फरवरी से इंडियन सुपर लीग (ISL) के मैदान पर फुटबॉल की वापसी तो हो रही है, लेकिन पर्दे के पीछे भारतीय फुटबॉल की आर्थिक नींव बुरी तरह चरमरा गई है। एक ओर जहां लीग के बड़े क्लब भारी वित्तीय घाटे के कारण अपने ही खिलाड़ियों से वेतन में कटौती (Salary Cut) की गुहार लगा रहे हैं, वहीं जमशेदपुर एफसी (JFC) ने अपनी वित्तीय सूझबूझ से एक मिसाल पेश की है।  

    दिखावे की होड़ और बजट का उल्लंघन 

    आईएसएल में इस बार मचे बवाल की मुख्य वजह क्लबों द्वारा बजट से बाहर जाकर किया गया अंधाधुंध खर्च है। लीग के नियमों के अनुसार, खिलाड़ियों पर खर्च करने के लिए प्रति टीम 18 करोड़ रुपये का 'सैलरी कैप' (अधिकतम सीमा) निर्धारित था।
     
    इधर, मोहन बागान और ईस्ट बंगाल जैसे बड़े क्लबों ने इस सीमा को नजरअंदाज करते हुए खिलाड़ियों पर 30 से 40 करोड़ रुपये तक लुटा दिए। यही 'जुआ' अब इन क्लबों के लिए गले की फांस बन गया है। 
     
    वित्तीय दबाव इतना बढ़ चुका है कि ये क्लब अब अनुबंध के बावजूद खिलाड़ियों के वेतन में कटौती करना चाहते हैं। इसके उलट, जमशेदपुर एफसी ने अनुशासन का परिचय देते हुए महज 12 करोड़ रुपये ही खर्च किए। 

    क्लबों का नुकसान, एआइएफएफ का मुनाफा?

    इसका परिणाम यह है कि जेएफसी के किसी भी खिलाड़ी पर इस आर्थिक संकट की आंच नहीं आएगी। बेंगलुरु एफसी के मालिक पार्थ जिंदल ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है कि भारतीय फुटबॉल फिलहाल घाटे का सौदा साबित हो रहा है। 
     
    स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 14 फरवरी से शुरू हो रही लीग के पास वर्तमान में न तो कोई आधिकारिक ब्रॉडकास्टर है और न ही कोई बड़ा कमर्शियल पार्टनर। 

    इसके बावजूद, क्लबों पर वित्तीय बोझ कम नहीं हुआ है। प्रत्येक क्लब को एआइएफएफ (AIFF) को 1 करोड़ रुपये की फ्रेंचाइजी फीस देनी है। 
    लीग के संचालन के लिए क्लबों को सामूहिक रूप से 14.56 करोड़ रुपये का योगदान देना होगा। हैरानी की बात यह है कि इस पूरी प्रक्रिया में एआइएफएफ अपना खर्च निकालकर मुनाफे में रहेगा, जबकि सारा जोखिम क्लबों और खिलाड़ियों के सिर होगा। 

    खिलाड़ियों का बढ़ता असंतोष 

    क्लबों की इस मांग ने खिलाड़ियों के बीच असंतोष पैदा कर दिया है। मुंबई सिटी एफसी के खिलाड़ियों ने स्पष्ट कर दिया है कि वे किसी भी तरह की वेतन कटौती को स्वीकार नहीं करेंगे। 
     
    उनका तर्क सीधा है- अनुबंध एक कानूनी प्रतिबद्धता है और क्लबों को अपने वादे का सम्मान करना चाहिए। पिछले सीजन में कई क्लबों ने खर्च कम रखने के बावजूद 20 करोड़ रुपये का नुकसान सहा था। इस साल जीतने की चाह में उन्होंने 30-40 करोड़ का जोखिम लिया, जो अब उल्टा पड़ता दिख रहा है।