सुवेंदु अधिकारी के अनछुए पहलू: न पंगा लेते हैं, न छोड़ते हैं; पिता ने बताया सीएम के 'बुबाई' से 'नायक' बनने का सफर
खास बातचीत : पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के पिता शिशिर अधिकारी ने अपने बेटे के बचपन, संघर्ष और मुख्यमंत्री बनने तक के अनछुए पहलुओं को ...और पढ़ें

पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी अपने पिता शिशिर अधिकारी के साथ ।
HighLights
पिता शिशिर अधिकारी ने सुवेंदु को 'बुबाई' और 'बुढ़ी' कहा।
शांत स्वभाव, नेतृत्व क्षमता, चुनौती मिलने पर नहीं छोड़ते।
जमीनी स्तर से सीएम तक का मेहनती राजनीतिक सफर।
जागरण संवाददाता, खड़गपुर। राजनीति के मैदान में विरोधियों के छक्के छुड़ाने वाले और कड़े फैसले लेने के लिए मशहूर पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी अपने पिता और वयोवृद्ध राजनेता शिशिर अधिकारी के लिए आज भी वही छोटे 'बुबाई' हैं। साक्षात्कार में 88 वर्षीय शिशिर अधिकारी ने सुवेंदु के बचपन, उनके संघर्ष और उनके मुख्यमंत्री बनने तक के सफर की ऐसी यादें साझा कीं, जो अब तक दुनिया की नजरों से ओझल थीं।
बेटों में सबसे बड़े, पर पिता के लिए 'बेटी' जैसे
शिशिर अधिकारी बताते हैं कि उनके चार बेटे हैं, जिनमें सुवेंदु सबसे बड़े हैं। वे कहते हैं कि मेरी कोई बेटी नहीं है, इसलिए सुवेंदु लड़का होने के बावजूद मेरे लिए बेटी के समान हैं। (पिता की जुबानी, सीएम की कहानी)
मैं उन्हें प्यार से 'बुड़ी' (बेटी) बुलाता हूं। हालांकि दोस्तों और परिवार में वह 'बुबाई' के नाम से जाने जाते हैं, लेकिन मेरे लिए वह हमेशा मेरी प्यारी बुढ़ी ही रहेंगे।
पंगा नहीं लेते, पर कोई ले तो छोड़ते भी नहीं
सुवेंदु के स्वभाव पर चर्चा करते हुए उनके पिता ने बताया कि वह बचपन से ही बेहद शांत और गंभीर रहे हैं। उनके अनुसार, सुवेंदु कभी किसी से बेवजह पंगा नहीं लेना चाहते थे, लेकिन नेतृत्व के गुण उनमें कूट-कूट कर भरे थे।
शिशिर अधिकारी कहते हैं कि अगर कोई उनसे उलझने की कोशिश करता, तो उसे रोकना वह बखूबी जानते थे। वह एक बार जो ठान लेते हैं, उसे पूरा किए बिना दम नहीं लेते।
समाजसेवा और मेहनत की मिसाल
सुवेंदु का राजनीतिक सफर कांथी कॉलेज की छात्र राजनीति से शुरू हुआ। शिशिर अधिकारी याद करते हैं कि सुवेंदु बचपन से ही बेहद मददगार रहे हैं।
कोई मदद मांगने आता तो वह घर से पैसे ले जाकर उसकी सहायता करते थे। उनकी मेहनत का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि मुझे नहीं पता कि वह कितने घंटे सोते हैं।
दिनभर कार में घूमकर पार्टी और जनता का काम करना उनकी आदत है। मैंने अपने लंबे राजनीतिक जीवन में उनके जैसा मेहनती आर्गेनाइजर नहीं देखा।
अनुभव की भट्टी में तपकर बने नेता
शिशिर अधिकारी का मानना है कि सुवेंदु रातोंरात नेता नहीं बने हैं। उन्होंने सभासद, विधायक, सांसद, मंत्री और को-ऑपरेटिव बैंकों के चेयरमैन के रूप में जमीनी स्तर पर काम किया है।
यही कारण है कि उनमें लोगों को पहचानने की अद्भुत क्षमता है। वह थोड़ी देर बात करके ही समझ जाते हैं कि सामने वाला व्यक्ति कैसा है।
आदर्श और संस्कार: रामकृष्ण मिशन से गहरा नाता
मेदिनीपुर के महान स्वतंत्रता सेनानियों बीरेंद्र नाथ शास्मल, अजय मुखर्जी, सतीश सामंत और सुशील धारा को सुवेंदु अपना रोल मॉडल मानते हैं। बचपन से ही उनका झुकाव आध्यात्म की ओर रहा है।
वह हर शनिवार कांथी रामकृष्ण मिशन जाते थे और वहां के संस्कारों को अपने जीवन में उतारा। शिशिर अधिकारी गर्व से कहते हैं कि आज भी सुवेंदु अपने बड़ों का उतना ही सम्मान करते हैं, जितना बचपन में करते थे।