टाटा स्टील का नया रोडमैप: टिनप्लेट क्षमता होगी दोगुनी, ट्यूब और वायर कारोबार के बड़े विस्तार की तैयारी
टाटा स्टील 2030 के बाद इस्पात उद्योग की बदलती लागत संरचना के मद्देनजर अपनी दीर्घकालिक रणनीति में बदलाव कर रही है। ...और पढ़ें

टीवी नरेंद्रन, सीईओ सह एमडी टाटा स्टील।
HighLights
2030 के बाद इस्पात उद्योग की लागत संरचना में बड़ा बदलाव।
टाटा स्टील अब मूल्यवर्धित उत्पादों पर अधिक ध्यान केंद्रित करेगी।
टिनप्लेट, ट्यूब, वायर कारोबार की क्षमता में भारी वृद्धि होगी।
जागरण संवाददाता, जमशेदपुर। देश के इस्पात उद्योग (Steel Industry) की लागत संरचना में वर्ष 2030 के बाद बड़ा बदलाव आने की संभावना है।
लौह अयस्क की बढ़ती कीमतों, रॉयल्टी, प्रीमियम और कच्चे माल पर बढ़ते खर्च को देखते हुए टाटा स्टील ने अपनी दीर्घकालिक व्यावसायिक रणनीति में बड़े बदलाव के संकेत दिए हैं।
कंपनी का मानना है कि भविष्य में केवल खनन बढ़ाने या साधारण इस्पात उत्पादन क्षमता बढ़ाने से बेहतर मुनाफा सुनिश्चित नहीं होगा।
इसके बजाय लागत नियंत्रण, परिचालन दक्षता और डाउनस्ट्रीम यानी मूल्यवर्धित उत्पादों पर अधिक पूंजी निवेश कंपनी की प्राथमिकता होगी।
टाटा स्टील के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सह प्रबंध निदेशक (CEO & MD) टीवी नरेंद्रन और मुख्य वित्तीय अधिकारी (CFO) कौशिक चटर्जी ने निवेशकों के साथ आयोजित अर्निंग्स कॉल में यह जानकारी दी।
2030 के बाद बढ़ेगी उत्पादन लागत
टीवी नरेंद्रन ने कहा कि वर्ष 2030 के बाद यदि अधिकांश इस्पात कंपनियों को बाजार दर पर लौह अयस्क खरीदना पड़ा, तो उत्पादन लागत स्वाभाविक रूप से बढ़ जाएगी।
भारत में लौह अयस्क पर रॉयल्टी और प्रीमियम के कारण पहले से ही कच्चे माल की लागत वैश्विक बाजार की तुलना में अधिक है। ऐसे में केवल उत्पादन बढ़ाने की पुरानी रणनीति पर्याप्त नहीं होगी।
कंपनी का जोर अब कम निवेश में अधिक मूल्य (वैल्यू) सृजित करने वाले क्षेत्रों पर रहेगा। कंपनी के अनुसार, अगले 30 महीनों में कोई नया एकीकृत स्टील प्लांट बनाने के बजाय मौजूदा स्टील को अधिक मूल्य वाले उत्पादों में बदलने वाली इकाइयों के विस्तार पर ध्यान दिया जाएगा।
डाउनस्ट्रीम और वैल्यू-एडेड विस्तार की प्रमुख योजनाएं:
- तारापुर में अत्याधुनिक गैल्वनाइजिंग लाइन: तारापुर प्लांट में भारत की सबसे अत्याधुनिक हॉट रोल्ड गैल्वनाइजिंग लाइन स्थापित की जाएगी। इससे ऑटोमोबाइल, इंफ्रास्ट्रक्चर और औद्योगिक क्षेत्रों के लिए उच्च गुणवत्ता का गैल्वनाइज्ड स्टील तैयार होगा।
- टिनप्लेट स्टील की क्षमता होगी दोगुनी: पैकेजिंग स्टील (टिनप्लेट) की उत्पादन क्षमता को दोगुना किया जाएगा। साधारण हॉट रोल्ड स्टील की तुलना में इसमें ₹20,000 से ₹25,000 प्रति टन तक अतिरिक्त वैल्यू एडिशन मिलता है। इसका मुख्य उपयोग खाद्य, पेय पदार्थ और पैकेजिंग उद्योग में होगा।
- ट्यूब कारोबार का 40 लाख टन तक विस्तार: टाटा स्टील के ट्यूब कारोबार की वर्तमान क्षमता 10 से 15 लाख टन है, जिसे बढ़ाकर 40 लाख टन करने की योजना है। इससे निर्माण, इंफ्रास्ट्रक्चर, ऑयल-गैस और इंजीनियरिंग क्षेत्रों की मांग पूरी होगी।
- वायर बिजनेस क्षमता 10 लाख टन पहुंचेगी: वायर (तार) उत्पादन की मौजूदा 6 लाख टन की क्षमता को बढ़ाकर 10 लाख टन किया जाएगा, जो ऑटोमोबाइल और कंस्ट्रक्शन सेक्टर की जरूरतों को पूरा करेगी।
- दो नए इलेक्ट्रिक आर्क फर्नेस (EAF): कंपनी लुधियाना मॉडल की तर्ज पर स्क्रैप को रीसाइकल कर स्टील बनाने के लिए दो नए इलेक्ट्रिक आर्क फर्नेस स्थापित करने पर काम कर रही है।
घरेलू बाजार पर ही केंद्रित रहेगा विकास
प्रबंध निदेशक ने स्पष्ट किया कि टाटा स्टील की भारत में विकास रणनीति यूरोप की परिस्थितियों पर निर्भर नहीं है और घरेलू बाजार में विस्तार की योजनाएं बिना किसी रुकावट के जारी रहेंगी।
आने वाले समय में इस्पात उद्योग की प्रतिस्पर्धा केवल उत्पादन क्षमता से नहीं, बल्कि कम लागत में उच्च गुणवत्ता वाले मूल्यवर्धित उत्पाद उपलब्ध कराने की क्षमता से तय होगी। इसी दिशा में कदम बढ़ाते हुए टाटा स्टील अपने ग्राहक-केंद्रित बिजनेस मॉडल को मजबूत कर रही है।