Trending

    विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

    120 साल पुरानी 'ब्रिटिश इंजीनियरिंग' का दिखेगा नया दम, गुरपा-गझंडी घाट की ऐतिहासिक सुरंगें होंगी और मजबूत

    Updated: Mon, 29 Jun 2026 07:24 PM (IST)

    रेलवे ग्रैंड कार्ड सेक्शन की 120 साल पुरानी गुरपा-गुझंडी सुरंगों को मजबूत कर रहा है। यह पहल सुरक्षा बढ़ाने और बढ़ती मालगाड़ियों के परिचालन को सुगम बना ...और पढ़ें

    गुरपा-गुझंडी घाट सेक्शन की 1906 में बनीं ऐतिहासिक सुरंगें होंगी और मजबूत।

    गुरपा-गुझंडी घाट सेक्शन की 1906 में बनीं ऐतिहासिक सुरंगें होंगी और मजबूत।

    HighLights

    1. 120 साल पुरानी गुरपा-गुझंडी सुरंगों का सुदृढ़ीकरण।

    2. सुरक्षा और परिचालन क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होगी।

    3. डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर के लिए महत्वपूर्ण पहल।

    संवाद सहयोगी, झुमरीतिलैया (कोडरमा)। नई दिल्ली–हावड़ा ग्रैंड कार्ड सेक्शन अंतर्गत गुरपा–गुझंडी घाट सेक्शन में स्थित 120 वर्ष से अधिक पुरानी तीन ऐतिहासिक रेल सुरंगों को अधिक सुरक्षित एवं मजबूत बनाने की दिशा में रेलवे ने महत्वपूर्ण पहल शुरू कर दी है।

    डेडिकेटेड फ्रेट कोरिडोर (डीएफसी) और लंबी मालगाड़ियों के बढ़ते परिचालन को देखते हुए सुरंगों के सुदृढ़ीकरण एवं संरचनात्मक मजबूती के लिए विस्तृत कार्ययोजना तैयार की जा रही है। परियोजना पूरी होने के बाद इस व्यस्त रेलखंड पर सुरक्षा, संरक्षा और परिचालन क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होने की उम्मीद है।

    पिछले दिनों पूर्व मध्य रेलवे के महाप्रबंधक सिंह एवं धनबाद मंडल के मंडल रेल प्रबंधक (डीआरएम) अखिलेश कुमार मिश्रा ने गुरपा–गुझंडी घाट सेक्शन का निरीक्षण कर तीनों सुरंगों की वर्तमान स्थिति, सुरक्षा व्यवस्था तथा रखरखाव कार्यों का जायजा लिया।

    निरीक्षण के दौरान तकनीकी विशेषज्ञों के साथ सुरंगों की संरचनात्मक मजबूती, भविष्य की आवश्यकताओं तथा प्रस्तावित कार्यों पर विस्तार से चर्चा की गई। ब्रिटिश शासनकाल में 6 दिसंबर 1906 को निर्मित इन तीन सुरंगों ने ग्रैंड कार्ड रेलमार्ग के विकास में ऐतिहासिक भूमिका निभाई थी। इनकी लंबाई क्रमशः 496 मीटर, 454 मीटर और 395 मीटर बताई जाती है।

    पिछले एक शताब्दी से अधिक समय में सुरंगों में जल रिसाव, चट्टानों से पत्थर गिरने तथा प्राकृतिक क्षरण जैसी समस्याएं सामने आती रही हैं। हालांकि, रेलवे द्वारा समय-समय पर किए गए रखरखाव और तकनीकी उपायों के कारण इन पर काफी हद तक नियंत्रण पाया गया है।

    खबरें और भी

    रेल अधिकारियों के अनुसार, अब विशेषज्ञ एजेंसियों की तकनीकी सहायता से सुरंगों के विस्तार, पुनर्रचना तथा अतिरिक्त संरचनात्मक सुदृढ़ीकरण का कार्य किया जाएगा। इसके तहत आधुनिक इंजीनियरिंग तकनीकों का उपयोग कर सुरंगों की दीर्घकालिक मजबूती सुनिश्चित की जाएगी, ताकि भविष्य में किसी भी प्रकार की संरचनात्मक चुनौती का प्रभावी ढंग से सामना किया जा सके।

    अधिकारियों ने बताया कि पूर्व में सुरंगों की गोलाई और डायमेंशन में किए गए सुधार के बाद भारी बीओबीआर कोयला रेकों का नियमित परिचालन संभव हो सका था। वर्तमान में गया–कोडरमा रेलखंड देश के सबसे व्यस्त रेलमार्गों में शामिल है, जहां अप एवं डाउन लाइन पर प्रतिदिन लगभग 300 यात्री और मालगाड़ियां संचालित होती हैं।

    ऐसे में प्रस्तावित सुदृढ़ीकरण कार्य से न केवल परिचालन अधिक सुरक्षित होगा, बल्कि लंबी और अधिक भार क्षमता वाली मालगाड़ियों के संचालन में भी सुविधा मिलेगी।

    रेलवे अधिकारियों के अनुसार, यह परियोजना भविष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर तैयार की जा रही है, ताकि आने वाले वर्षों में भी ग्रैंड कार्ड का यह महत्वपूर्ण घाट सेक्शन सुरक्षित, सक्षम और निर्बाध रूप से संचालित होता रहे।

    ब्रिटिश इंजीनियरिंग की अनूठी मिसाल हैं तीनों सुरंगें

    गुरपा–गुझंडी घाट सेक्शन ग्रैंड कोर्ड परियोजना का सबसे चुनौतीपूर्ण हिस्सा माना जाता था। पहाड़ी क्षेत्र में लगभग 22 किलोमीटर लंबे घाट सेक्शन का निर्माण करने के लिए ब्रिटिश इंजीनियरों ने पहाड़ों को काटकर तीन लंबी सुरंगें बनाई थीं।

    उस दौर में आधुनिक टनल बोरिंग मशीनें उपलब्ध नहीं थीं। हजारों मजदूरों ने हथौड़ी, छैनी, फावड़े और डायनामाइट की मदद से कठोर चट्टानों को काटकर सुरंगों का निर्माण किया। खुदाई के दौरान पानी का रिसाव, धंसान, धुआं निकालने की व्यवस्था और चट्टानों की मजबूती बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौतियां थीं।

    सुरंगों के भीतर ईंट और पत्थर की मेहराबी लाइनिंग की गई, जिसकी मजबूती के कारण ये संरचनाएं आज भी 120 वर्ष बाद रेलवे की महत्वपूर्ण धरोहर बनी हुई हैं।

    लंबे समय तक इस घाट सेक्शन में भारी मालगाड़ियों को अतिरिक्त बैंकिंग इंजन की सहायता से चढ़ाया जाता था। आज भी यह देश के सबसे व्यस्त और चुनौतीपूर्ण रेलखंडों में शामिल है।

    यह भी पढ़ें- 100 साल पुराना सपना टूटा: रेलवे ट्रैक बदला तो भड़के 90 हजार आदिवासी, नए रूट से भंडरिया-बड़गड़ बाहर होने पर आक्रोश