60 दिन की मेहनत, 12 महीने का सहारा: बिहार की 'धान' पर टिकी लातेहार के सैकड़ों परिवारों की जिंदगी
बरवाडीह के सैकड़ों परिवार धान रोपनी के लिए बिहार पलायन करते हैं, जिसकी डेढ़-दो महीने की कमाई उनके पूरे साल की आर्थिक रीढ़ बनती है। यह कमाई कर्ज चुकाने ...और पढ़ें

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HighLights
डेढ़-दो माह की कमाई पूरे साल का खर्च चलाती है।
स्थानीय रोजगार की कमी पलायन का मुख्य कारण है।
संवाददाता जागरण, लातेहार। बरवाडीह से हर वर्ष धान रोपनी के मौसम में बिहार जाने वाले मजदूरों को देखकर यह समझना आसान नहीं कि उनका यह सफर केवल डेढ़ महीने की मजदूरी तक सीमित नहीं है। गांवों की असल तस्वीर बताती है कि यह कमाई सैकड़ों परिवारों के लिए पूरे साल की आर्थिक रीढ़ बन चुकी है।
यही वजह है कि सावन शुरू होने से पहले घरों में तैयारी यात्रा के साथ पूरे वर्ष के खर्च की होने लगती है। बरवाडीह प्रखंड के अनेक गांवों में ऐसे परिवार हैं, जिनकी नियमित आय का कोई स्थायी स्रोत नहीं है। खेती छोटी है, मजदूरी पूरे वर्ष नहीं मिलती और रोजगार के अवसर भी सीमित हैं।
ऐसे में धान रोपनी के दौरान बिहार में मिलने वाला लगातार काम उनके लिए सबसे भरोसेमंद आमदनी बन जाता है। मजदूर जानते हैं कि यदि इस मौसम में कमाई छूट गई तो आने वाले महीनों में परिवार चलाना कठिन हो जाएगा।
अनिल, विजेंद्र, मो. अब्दुल्ला समेत अन्य ग्रामीण बताते हैं कि बाहर से लौटने के बाद सबसे पहले साहूकार या दुकानदार का उधार चुकाया जाता है। इसके बाद बच्चों की स्कूल फीस, किताब-कॉपी, कपड़े, बीमार स्वजन के इलाज, घर की जरूरतें और खेती के लिए बीज-खाद की व्यवस्था की जाती है।
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कई परिवारों में दीपावली और छठ जैसे पर्वों की तैयारी भी इसी कमाई को ध्यान में रखकर होती है। यानी डेढ़ महीने की मजदूरी केवल जेब नहीं भरती, बल्कि पूरे वर्ष की जरूरतों का हिसाब तय करती है।
ग्रामीणों का कहना है कि यह पलायन रोजगार के साथ गांव की आर्थिक व्यवस्था का हिस्सा बन चुका है। कई परिवारों का वार्षिक बजट इस आधार पर बनता है कि रोपनी के मौसम में कितनी मजदूरी मिलेगी। यदि किसी कारण से काम कम मिला या मौसम बिगड़ गया, तो पूरे साल का आर्थिक संतुलन बिगड़ जाता है।
स्थानीय जानकारों का मानना है कि यदि बरवाडीह क्षेत्र में कृषि आधारित उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण इकाइयां, वनोपज आधारित रोजगार और मनरेगा के तहत समय पर पर्याप्त कार्य उपलब्ध हों, तो मजदूरों को दूसरे प्रदेशों की ओर नहीं जाना पड़ेगा। इससे गांव में आय भी बढ़ेगी और स्थानीय बाजार की आर्थिक गतिविधियां भी मजबूत होंगी।
बरवाडीह की यह तस्वीर बताती है कि यहां धान रोपनी ग्रामीण अर्थव्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव बन चुकी है। डेढ़ महीने तक दूसरे प्रदेश के खेतों में बहाया गया पसीना ही कई घरों में बारह महीने तक चूल्हा जलाए रखता है। यही कारण है कि हर वर्ष सैकड़ों मजदूर अपने गांव से दूर चले जाते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि इस कमाई पर ही उनके परिवार के आने वाले पूरे साल का भविष्य टिका है।
धान रोपनी पलायन एक नजर में
- बरवाडीह से धान रोपनी के लिए 300 से 500 मजदूर हर वर्ष धान रोपनी के मौसम में बिहार के विभिन्न जिलों में जाते हैं। (स्थानीय अनुमान)
- 30 से 45 गांवों के परिवार इस मौसमी पलायन से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जुड़े हैं।
- 45 से 60 दिन तक बिहार में रहकर करते हैं धान रोपनी का कार्य।
- 20 हजार रूपये से 35 हजार रूपये तक एक मजदूर की औसत मौसमी कमाई।
- कमाई का बड़ा हिस्सा राशन, बच्चों की पढ़ाई, खेती के लिए बीज-खाद, इलाज और पुराने कर्ज चुकाने में खर्च होता है।
- जुलाई-अगस्त के दौरान सबसे अधिक होता है मजदूरों का पलायन।
- रोजगार की कमी और मनरेगा में नियमित काम नहीं मिलना पलायन का प्रमुख कारण बताया जाता है।
- सितंबर तक अधिकांश मजदूर गांव लौट आते हैं और खरीफ फसल की देखभाल में जुट जाते हैं।