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    लोहरदगा में 2 साल बाद 23 आदिवासियों ने की सरना धर्म में वापसी, आदिवासी रीति-रिवाज से हुआ अनुष्ठान

    Updated: Sat, 25 Apr 2026 08:16 AM (GMT+05:30)

    लोहरदगा के भंडरा प्रखंड में सात आदिवासी परिवारों के 23 सदस्यों ने ईसाई धर्म छोड़कर अपनी मूल सरना संस्कृति में 'घर वापसी' की। ...और पढ़ें

    सात आदिवासी परिवारों के 23 सदस्यों ने की 'घर वापसी'। (जागरण)

    सात आदिवासी परिवारों के 23 सदस्यों ने की 'घर वापसी'। (जागरण)

    HighLights

    1. सात आदिवासी परिवारों के 23 सदस्यों की घर वापसी।

    2. दो साल पहले ईसाई धर्म अपनाया था प्रलोभन से।

    3. पारंपरिक सरना संस्कृति और रीति-रिवाजों को पुनः अपनाया।

    संवाद सूत्र, भंडरा (लोहरदगा)। जिले के भंडरा प्रखंड क्षेत्र के अंबेरा गांव में शुक्रवार को सात आदिवासी परिवारों के 23 सदस्यों ने स्वेच्छा से अपने मूल धर्म में ‘घर वापसी’ की।

    सभी परिवार पिछले करीब दो वर्षों से ईसाई मत का पालन कर रहे थे, लेकिन अब उन्होंने अपनी पारंपरिक सरना संस्कृति और आदिवासी परंपराओं को पुनः अपनाने का निर्णय लिया।

    इस मौके पर आयोजित कार्यक्रम पूरी तरह से आदिवासी रीति-रिवाजों के अनुसार संपन्न हुआ। पारंपरिक धार्मिक गुरुओं की अगुवाई में विधिवत अनुष्ठान कर सभी का शुद्धिकरण कराया गया।

    पहान विद्यासागर उरांव, पुजार तिवारी उरांव और महतो संदीप उरांव ने अनुष्ठान की मुख्य भूमिका निभाई। अनुष्ठान के बाद सभी लोगों ने अपनी मूल पहचान और परंपरा को फिर से स्वीकार किया।

    दो साल पहले अपनाया था ईसाई धर्म

    ग्रामीणों के अनुसार, इन परिवारों को करीब दो वर्ष पूर्व गांव के ही एक दंपती द्वारा बहला-फुसलाकर ईसाई धर्म अपनाने के लिए प्रेरित किया गया था। बीमारी ठीक होने और अन्य प्रकार के प्रलोभन का हवाला देकर धर्म परिवर्तन कराया गया था।

    हालांकि, समय के साथ इन परिवारों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से दूर होने का एहसास हुआ, जिसके बाद उन्होंने अपने पूर्वजों के धर्म में लौटने का निर्णय लिया।

    इस कार्यक्रम को सफल बनाने में स्थानीय ग्रामीणों की सक्रिय भागीदारी रही। विश्व हिंदू परिषद के जिला मंत्री भीम नाथ शाहदेव सहित कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इसमें सहयोग किया।

    ग्रामीणों में बुधमनिया उरांव, मोहन उरांव, रजनी उरांव, प्रकाश उरांव, कामेश्वर उरांव, विमला उरांव, बबीता उरांव, मनु उरांव और कालेश्वर उरांव की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इस आयोजन के बाद गांव में सामाजिक एकजुटता का संदेश भी गया और पारंपरिक संस्कृति के संरक्षण पर जोर दिया गया।

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