लोहरदगा में आरटीआई का मजाक: मांगी योजनाओं की सूची, विभाग ने थमाया 2.46 लाख रुपये का बिल
लोहरदगा भूमि संरक्षण विभाग ने एक आरटीआई आवेदन के जवाब में जानकारी देने के लिए 2.46 लाख रुपये का बिल थमा दिया, जबकि आवेदक ने केवल योजनाओं की सारांश जान ...और पढ़ें

AI Generated Image.
HighLights
विभाग ने 1.23 लाख पन्नों की फोटोकॉपी का दावा किया।
मांगी गई थी योजनाओं की सारांश जानकारी, नहीं पूरी फाइल।
विक्रम चौहान, लोहरदगा। सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम का उद्देश्य सरकारी कामकाज में पारदर्शिता लाना है, लेकिन लोहरदगा के भूमि संरक्षण विभाग ने इस कानून का मजाक बनाकर रख दिया है।
विभाग ने एक आरटीआई आवेदन के जवाब में आवेदक को जानकारी उपलब्ध कराने के बदले 2 लाख 46 हजार रुपये जमा कराने का हैरान करने वाला पत्र भेजा है।
विभाग का दावा है कि मांगी गई सूचना देने के लिए 4100 संचिकाओं के लगभग एक लाख 23 हजार पृष्ठों की फोटोकॉपी करनी होगी, जिसके लिए प्रति पृष्ठ दो रुपये की दर से यह हेवी शुल्क निर्धारित किया गया है।
क्या थी मांगी गई जानकारी और क्या मिला जवाब?
विभाग के इस कदम के बाद स्थानीय स्तर पर चर्चाएं तेज हैं कि आखिर अधिकारी कौन सा राज छिपाना चाहते हैं। दैनिक जागरण की ओर से 8 जून 2026 को सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत एक आवेदन दिया गया था।
इसमें वित्तीय वर्ष 2021-22 से लेकर सूचना उपलब्ध कराने की तिथि तक जिले में संचालित परकुलेशन टैंक (PT), तालाब जीर्णोद्धार, बोरिंग, कृषि यंत्र वितरण समेत विभिन्न सरकारी योजनाओं से संबंधित लाभुकों की सूची, स्वीकृत एवं भुगतान की गई राशि, तथा पूर्ण और लंबित योजनाओं की सटीक जानकारी मांगी गई थी।
इस आवेदन के जवाब में जन सूचना पदाधिकारी सह भूमि संरक्षण पदाधिकारी, लोहरदगा के हस्ताक्षर से 6 जुलाई 2026 को एक निबंधित डाक (Registered Post) के माध्यम से पत्र भेजा गया।
पत्र में कहा गया कि संबंधित सूचनाएं 4100 संचिकाओं में बिखरी हुई हैं और उनका विवरण देने के लिए 1.23 लाख पन्नों की प्रतिलिपि तैयार करनी होगी, जिसके लिए आवेदक को 2.46 लाख रुपये का भुगतान करना होगा।
आवेदन को ठीक से पढ़ना भी नहीं समझा जरूरी
इस मामले में चौंकाने वाली बात यह है कि विभाग ने आरटीआई आवेदन को ठीक से पढ़ना भी गवारा नहीं किया। आवेदन में किसी भी संचिका (File) की संपूर्ण प्रतिलिपि या उसके सारे पन्नों की मांग नहीं की गई थी।
आवेदक ने केवल योजनावार लाभुकों की सूची, भुगतान का विवरण और वर्तमान स्थिति का सारांश मांगा था। इसके बावजूद, विभाग ने संकलित डेटा देने के बजाय सभी संचिकाओं के हर एक पन्ने की संख्या जोड़कर एक बड़ा बजट बनाकर थमा दिया।
अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन पर उठे गंभीर सवाल
भूमि संरक्षण विभाग के इस रवैये ने आरटीआई अधिनियम के जमीनी क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस संबंध में आरटीआई कार्यकर्ता सुनील कुमार ने अपनी राय दी है।
इनका कहना है कि यदि मांगी गई सूचना रिकॉर्ड के संकलित स्वरूप में पहले से उपलब्ध है या इसे अलग-अलग अभिलेखों से आसानी से एक सूची के रूप में तैयार किया जा सकता है, तो आवेदक पर अनावश्यक रूप से हजारों पृष्ठों की फोटोकॉपी लेने का आर्थिक बोझ डालना बिल्कुल गलत है।
यह अधिनियम की मूल मंशा के विपरीत है और सूचना को दबाने या आवेदक को डराने का एक प्रयास प्रतीत होता है।