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    झारखंड में वजूद की लड़ाई लड़ रही संस्कृत, 1994 के बाद से शिक्षकों की नहीं हुई बहाली; 8 साल से वीरान पड़ा स्कूल

    Updated: Sat, 11 Jul 2026 08:00 AM (IST)

    झारखंड में संस्कृत भाषा अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है, जहाँ 1994 के बाद से शिक्षकों की बहाली नहीं हुई है। ...और पढ़ें

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    HighLights

    1. झारखंड में संस्कृत भाषा अस्तित्व के लिए संघर्षरत है।

    2. 1994 के बाद से संस्कृत शिक्षकों की बहाली नहीं हुई।

    3. सभी 6 राजकीय संस्कृत विद्यालय शिक्षक विहीन हैं।

    अरविंद तिवारी, चैनपुर (पलामू)। देवभाषा संस्कृत का अतीत भले ही गौरवशाली रहा हो, समस्त भाषाओं की जननी संस्कृत भले ही कही जाती हो पर वर्तमान में वेद पुराण उपनिषदों कि यह भाषा अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है।

    संसाधनों की घोर कमी, शिक्षक व छात्र विहीन विद्यालय संस्कृत शिक्षा की करुण गाथा कहते नजर आते हैं। सरकार की उपेक्षापूर्ण नीति व वक्र दृष्टि ने भी मानो संस्कृत भाषा को सागर में तिरोहित करने का संकल्प ले लिया है।

    पलामू के मेदिनीनगर स्थित प्रमंडलीय राजकीय संस्कृत उच्च विद्यालय अपनी दुर्दशा पर आठ आठ आंसू बहा रहा है। वर्षों बीत गए विद्यालय ने अपने परिसर में शिक्षक छात्रों की चहल कदमी व वर्गकक्ष में पठन-पाठन होते नहीं देखा। 2019 से विद्यालय शिक्षक व छात्रवहीन हैं।

    विद्यालय के एकमात्र शिक्षक की पदोन्नति हो गई। उनके जाने के बाद से विद्यालय एक लिपिक व एक अनुसेवक के भरोसे संचालित है।दोनों कर्मी विद्यालय आते हैं, ताला खोलकर हाजिरी बनाते हैं एवं भयभीत अवस्था में कार्यालय में बैठते हैं कि कहीं जर्जर भवन के छत का मलवा उनके सिर पर न आ गिरे।

    विद्यालय भवन अत्यंत जर्जर है जो कभी भी ध्वस्त हो सकता है। विद्यालय के अनुसेवक अजय कुमार पाठक ने बताया कि 1994 के बाद शिक्षकों की बहाली ही नहीं हुई है। 2019 के बाद शिक्षक नहीं होने के कारण विद्यालय में नामांकन नहीं हुआ है।

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    विद्यालय का भवन अत्यंत ही जर्जर है। फिलहाल मेदिनीनगर स्थित जिला स्कूल परिसर में स्थित राजकीय संस्कृत उच्च विद्यालय शिक्षक व छात्र रूपी संजीवनी की आशा में अंतिम सांसे गिन रहा है।

    झारखंड के सभी 6 राजकीय संस्कृत विद्यालय हैं शिक्षक विहीन

    प्राप्त जानकारी के अनुसार झारखंड में 6 राजकीय संस्कृत उच्च विद्यालय हैं। जो देवघर,धनबाद, रांची, पश्चिम सिंहभूम, हजारीबाग व पलामू जिले मैं अवस्थित है। इनमें सभी उच्च विद्यालय शिक्षक विहीन है।

    एकीकृत बिहार में 1994 में संस्कृत शिक्षकों की बहाली हुई थी। बहाल शिक्षकों में अधिकांश रिटायर्ड हो गए और शेष प्रमोशन पाकर दूसरे विभागों में चले गए।झारखंड बनने के ढाई दशक बाद भी संस्कृत शिक्षकों की बहाली नहीं हुई है।

    संस्कृत महाविद्यालय भी बदहाल, बैगर शिक्षक छात्र हो रहे परीक्षा उत्तीर्ण

    पलामू प्रमंडल का एकमात्र संस्कृत महाविद्यालय का हाल भी बदहाल है। 2018 से महाविद्यालय स्थायी प्राचार्य व स्थायी शिक्षक विहीन है। सभी शिक्षकों के अवकाश प्राप्त हो जाने के बाद 2024 तक महाविद्यालय अतिथि शिक्षकों के भरोसे संचालित रहा। इसके बाद महाविद्यालय में एक भी शिक्षक नहीं हैं। यहां पर सृजित सात पर्दों के विरुद्ध एक भी शिक्षक नहीं हैं।

    फिलहाल एक लिपिक व एक रात्रि प्रहरी समेत अनुबंध के एक आदेशपाल के भरोसे महाविद्यालय संचालित है।रांची संस्कृत महाविद्यालय के प्राचार्य 2021 से इस महाविद्यालय प्राचार्य के प्रभार में हैं। साल में एक दो बार उनका महाविद्यालय में आना-जाना होता है। इधर सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि बगैर शिक्षक के विद्यालय में प्रतिवर्ष 30/ 35 बच्चों का नामांकन होता है। वे परीक्षा देते हैं और उत्तीर्ण भी हो जाते हैं।

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