राजनीति की भेंट चढ़ा रामगढ़ का इंदिरा गांधी श्रमिक कॉलेज, 5 साल से बंद; परिसर बना खंडहर
रामगढ़ का इंदिरा गांधी श्रमिक महाविद्यालय पांच साल से राजनीति और वित्तीय अनियमितताओं के कारण बंद है, जिससे एक हजार से अधिक छात्रों का भविष्य अंधकार मे ...और पढ़ें

रामगढ़ का इंदिरा गांधी श्रमिक कॉलेज
HighLights
इंदिरा गांधी श्रमिक महाविद्यालय पांच साल से बंद पड़ा है।
राजनीति और वित्तीय अनियमितताएं बंद होने का मुख्य कारण।
परिसर खंडहर में बदल रहा, छात्रों का भविष्य अधर में।
संजय मंडल, मांडू (रामगढ़)। ग्रामीण क्षेत्र की बेटियों और दूरदराज के युवाओं को उच्च शिक्षा का संबल देने के उद्देश्य से स्थापित इंदिरा गांधी श्रमिक महाविद्यालय, मांडू पिछले पांच वर्षों से राजनीति और वित्तीय अनियमितताओं की भेंट चढ़कर बंद पड़ा है। जिस परिसर में कभी एक हजार से अधिक छात्र-छात्राओं का भविष्य संवरता था, आज वह वीरानगी और बदहाली के आंसू रो रहा है।
तीन एकड़ का परिसर अब बन रहा खंडहर
महाविद्यालय के नाम पर लगभग 3 एकड़ की बेशकीमती भूमि और उसमें बने एक दर्जन से अधिक कमरे वर्तमान में देखरेख के अभाव में खंडहर में तब्दील होते जा रहे हैं। स्थानीय ग्रामीणों ने बताया कि मांडू प्रखंड के सुदूर ग्रामीण इलाकों की युवतियों को उच्च शिक्षा के लिए भटकना न पड़े, इसके लिए स्थानीय लोगों ने अपनी जमीन दान में दी थी।
बड़े ही अरमानों के साथ इस कॉलेज की नींव रखी गई थी, जहां दो दर्जन से अधिक शिक्षक और गैर-शैक्षणिक कर्मी अपनी सेवाएं दे रहे थे। मगर, कॉलेज प्रबंधन की आपसी राजनीति ने इस संस्थान के अस्तित्व पर ही ताला लगा दिया।
पैसे की हेराफेरी बनी बंद होने की मुख्य वजह
सूत्रों और स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, कॉलेज के बंद होने के पीछे की मुख्य वजह भारी वित्तीय अनियमितता और पैसों की हेराफेरी है। इस गतिरोध को दूर करने और कॉलेज को दोबारा सुचारू रूप से संचालित करने के लिए कई बार विश्वविद्यालय के प्रतिनिधिमंडल ने मांडू महाविद्यालय का औचक निरीक्षण भी किया।
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हर बार उम्मीद की नई किरण तो जगी, लेकिन अंदरूनी राजनीति और कानूनी अड़चनों के कारण कॉलेज दोबारा नहीं खुल सका। इसका सीधा खामियाजा आज मांडू प्रखंड के उन गरीब और ग्रामीण छात्रों को भुगतना पड़ रहा है, जिन्हें उच्च शिक्षा के लिए मिलों दूर का सफर तय करना पड़ता है या आर्थिक तंगी के कारण पढ़ाई छोड़नी पड़ रही है।
दबाव में दिया इस्तीफा, बैंक खाते में अब भी मेरा नाम: प्राचार्य
इस पूरे मामले पर पक्ष रखते हुए कॉलेज के वर्तमान प्राचार्य प्रो. प्रदीप कुमार सिन्हा ने कई चौंकाने वाले खुलासे किए। उन्होंने बताया मैंने भारी दबाव के कारण अपने पद से इस्तीफा दे दिया था, लेकिन प्रबंधन या विभाग द्वारा मेरा इस्तीफा अभी तक स्वीकार नहीं किया गया है।
वर्तमान स्थिति यह है कि विभागीय फाइलों और कॉलेज के बैंक खाते में आज भी बतौर प्राचार्य मेरा ही नाम दर्ज है। मैंने अपने अंतिम 7 महीनों का वेतन भी नहीं लिया है।
सुलगते सवाल और अधर में भविष्य
एक तरफ जहां सरकार ''बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ'' और ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा व्यवस्था सुदृढ़ करने के बड़े-बड़े दावे करती है, वहीं दूसरी ओर जनता की जमीन पर खड़ा यह शिक्षा का मंदिर प्रशासनिक उदासीनता और आपसी गुटबाजी के कारण दम तोड़ रहा है।
अब देखना यह है कि क्या विश्वविद्यालय प्रशासन और शिक्षा विभाग इस दिशा में कोई ठोस कदम उठाकर कॉलेज को पुनर्जीवित करता है, या मांडू के युवाओं का भविष्य यूं ही अंधकार में डूबा रहेगा।
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