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    बंगाल के अनुभव से सतर्क हुए हेमंत, SIR को लेकर JMM हाई अलर्ट पर; संगठन और सरकार का नया कदमताल

    Updated: Wed, 22 Apr 2026 01:58 PM (IST)

    मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने मतदाता सूची पुनरीक्षण (SIR) को लेकर झामुमो कार्यकर्ताओं को सतर्क रहने का निर्देश दिया है। इसका उद्देश्य सामाजिक सुरक्षा योज ...और पढ़ें

    मतदाता सूची में गड़बड़ी रोकने को झामुमो सक्रिय। (फोटो: जागरण फाइल)

    मतदाता सूची में गड़बड़ी रोकने को झामुमो सक्रिय। (फोटो: जागरण फाइल)

    HighLights

    1. मुख्यमंत्री ने मतदाता सूची पुनरीक्षण पर सतर्कता का निर्देश दिया।

    2. सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के लाभार्थियों के नाम कटने की आशंका।

    3. झामुमो संगठन को बूथ स्तर पर सक्रिय किया जाएगा।

    राज्य ब्यूरो, रांची।बंगाल विधानसभा चुनाव में पहले चरण के प्रचार अभियान से लौटने के बाद झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के केंद्रीय अध्यक्ष सह मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने राज्य की राजनीतिक और प्रशासनिक चुनौतियों को लेकर संगठनात्मक स्तर पर बड़ी सक्रियता दिखाई है।

    विशेष रूप से मतदाता सूची पुनरीक्षण यानी एसआइआर (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) को लेकर उन्होंने पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं को सतर्क रहने का निर्देश दिया है।

    दरअसल झामुमो को आशंका है कि यदि मतदाता सूची में गड़बड़ी हुई और बड़ी संख्या में नाम कटे तो इसका सीधा असर राज्य की सामाजिक सुरक्षा और कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थियों पर पड़ सकता है।

    बंगाल चुनाव प्रचार के दौरान वहां मतदाता सूची से नाम हटने के कई मामलों ने झामुमो के शीर्ष नेतृत्व का ध्यान खींचा। उसी अनुभव के आधार पर उन्होंने झारखंड में ऐसी स्थिति से पहले ही निपटने की रणनीति बनानी शुरू कर दी है। मुख्यमंत्री ने पार्टी के शीर्ष नेताओं के साथ-साथ सभी जिला कमेटियों की बैठक बुलाकर इस विषय पर विशेष तैयारी करने का निर्देश दिया है।

    नाम कटने से कल्याणकारी योजनाओं पर असर की आशंका

    झारखंड सरकार की कई प्रमुख योजनाएं आधार और पहचान सत्यापन से जुड़ी हुई हैं। इनमें मंइयां सम्मान योजना, सर्वजन पेंशन योजना, राशन वितरण, छात्रवृत्ति और अन्य सामाजिक सुरक्षा योजनाएं शामिल हैं।

    झामुमो नेतृत्व का मानना है कि यदि मतदाता सूची से किसी व्यक्ति का नाम हटता है तो उसके पहचान दस्तावेजों के सत्यापन पर भी असर पड़ सकता है। पार्टी के रणनीतिकारों का आकलन है कि झामुमो का पारंपरिक और कोर वोट बैंक ही इन योजनाओं का सबसे बड़ा लाभार्थी वर्ग है।

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    ऐसे में यदि इस वर्ग के नाम मतदाता सूची से हटते हैं तो यह केवल चुनावी नुकसान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर असर डाल सकता है। यही कारण है कि मुख्यमंत्री ने इस मुद्दे को केवल निर्वाचन प्रक्रिया नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय के प्रश्न के रूप में देखा है।

    संगठन को सरकार के साथ जोड़ने की कोशिश

    हेमंत सोरेन अब सरकार और संगठन के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने की दिशा में भी काम कर रहे हैं। अब तक सरकार की योजनाएं प्रशासनिक स्तर पर संचालित होती रही हैं, जबकि संगठन राजनीतिक मोर्चे पर सक्रिय था।

    लेकिन अब पार्टी नेतृत्व चाहता है कि संगठन सीधे जनता के बीच जाकर यह सुनिश्चित करे कि सरकारी योजनाओं का लाभ सही लोगों तक पहुंचे और मतदाता सूची में किसी पात्र व्यक्ति का नाम न छूटे। पार्टी के जिला अध्यक्षों और प्रखंड स्तर के पदाधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि वे पंचायत और बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं की टीम बनाकर मतदाता सूची का सत्यापन कराएं।

    इसके साथ ही लाभुकों की सूची और मतदाता सूची का मिलान भी कराया जाएगा। इससे पार्टी को यह समझने में मदद मिलेगी कि कहीं योजनाओं के लाभार्थियों का नाम चुनावी सूची से बाहर तो नहीं हो रहा।

    राजनीतिक विवाद की वजह भी

    कई राज्यों में मतदाता सूची से नाम कटने की शिकायतें राजनीतिक विवाद का कारण बनी हैं। यही वजह है कि झारखंड में राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए हेमंत सोरेन कोई जोखिम लेने के मूड में नहीं दिख रहे हैं।

    यही वजह है कि उन्होंने भविष्य की चुनावी तैयारियों से पहले संगठन को मजबूत करने और उसे प्रशासनिक सतर्कता के साथ जोड़ने का फैसला किया है। झामुमो के शीर्ष नेतृत्व की पहल के बाद आने वाले दिनों में पार्टी की गतिविधियां जिला से लेकर बूथ स्तर तक तेज होंगी।

    संगठन को स्पष्ट संदेश दिया गया है कि सरकार की योजनाओं का लाभ और मतदाता सूची की शुद्धता, दोनों अब राजनीतिक प्राथमिकता का हिस्सा हैं। झामुमो महासचिव सह प्रवक्ता विनोद पांडेय के मुताबिक संगठन के केंद्रीय अध्यक्ष के दिशानिर्देश के अनुरूप पार्टी के कार्यकर्ता काम करेंगे।

    हेमंत सोरेन की इस नई रणनीति को झारखंड में सरकार और संगठन के बीच तालमेल की नई शुरुआत माना जा रहा है। इससे यह संकेत भी मिल रहा है कि हेमंत सोरेन सिर्फ प्रशासनिक मोर्चे पर नहीं, बल्कि संगठनात्मक मजबूती के जरिए आने वाले राजनीतिक संघर्षों की तैयारी में भी जुट गए हैं।

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