Trending

    विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

    झारखंड के जंगल सूने: पहली बार पलाश लाल नहीं, सखुआ पर भी 20 प्रतिशत ही आए फूल

    Updated: Sat, 04 Apr 2026 08:01 AM (IST)

    झारखंड के जंगलों में इस वर्ष पलाश और सखुआ के फूलों की भारी कमी देखी गई है। आमतौर पर लालिमा से भरे रहने वाले जंगल सूने पड़े हैं, जिससे सरहुल जैसे पारंप ...और पढ़ें

    झारखंड के जंगलों में पहली बार सूना पड़ा पलाश। (फोटो: जागरण)

    झारखंड के जंगलों में पहली बार सूना पड़ा पलाश। (फोटो: जागरण)

    HighLights

    1. झारखंड के जंगलों में पलाश और सखुआ के फूल नहीं खिले।

    2. सरहुल पर्व, पारंपरिक उपयोग पर फूलों की कमी का असर।

    3. जलवायु परिवर्तन और वनों की कटाई को बताया जा रहा कारण।

    जागरण संवाददाता, तुपुदाना (रांची)। झारखंड के जंगलों में इस वर्ष एक अभूतपूर्व बदलाव देखने को मिला है। राज्य का राजकीय फूल पलाश, जो हर वर्ष जनवरी महीने से खिलना शुरू कर देता था, इस बार लगभग पूरी तरह से नहीं खिला।

    सामान्यतः फरवरी और मार्च के महीने में जैसे ही लोग शहरों से बाहर निकलते थे, चारों ओर पलाश के लाल फूलों से सजे जंगल नजर आते थे और पूरा क्षेत्र लालिमा से भर जाता था। पलाश के फूलों की सुंदरता इतनी आकर्षक होती थी कि लोग इन्हें तोड़कर अपने घरों में सजाने के लिए भी ले जाते थे।

    इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में पलाश के फूलों से प्राकृतिक रंग बनाकर होली खेली जाती थी। लेकिन इस वर्ष यह परंपरा भी फीकी पड़ गई है। राज्य के अधिकांश जंगलों में पलाश के पेड़ खाली नजर आए, जबकि कहीं-कहीं केवल एक-दो पेड़ों पर ही सीमित संख्या में फूल दिखाई दिए।

    सखुआ में भी फूलों की कमी

    पलाश के साथ-साथ सखुआ के पेड़ों में भी इस वर्ष फूलों की भारी कमी देखी गई है। सखुआ, जिसे स्थानीय लोग ‘सरई फूल’ के नाम से जानते हैं, सरहुल पर्व में विशेष महत्व रखता है। इस बार सखुआ के पेड़ों में फूल नहीं आने से पूजा के लिए फूल जुटान ग्रामीणों के लिए काफी मुश्किल हो गया था।

    खबरें और भी

    जानकारी के अनुसार, केवल लगभग 20 प्रतिशत सखुआ पेड़ों में ही फूल आए हैं। आमतौर पर सखुआ के फूलों की भीनी-भीनी सुगंध से पूरा जंगल महक उठता है और यह वातावरण को जीवंत बना देता है।

    सरहुल के दौरान इन फूलों की पूजा की जाती है और लोग इन्हें अपने कानों, सिर और घरों में ‘फूलखोंसी’ के रूप में धारण करते हैं। सखुआ के पत्तों पर ही सिंगबोंगा और मारंगबुरू को प्रसाद अर्पित किया जाता है, जिससे इसकी धार्मिक महत्ता और बढ़ जाती है।

    बुजुर्गों ने बताया जीवन में पहली बार देखा ऐसा

    इस स्थिति को लेकर ग्रामीण और आदिवासी समुदायों में गहरी चिंता देखी जा रही है। कई लोग इसे अपशगुन मानते हुए जंगल के देवताओं की नाराजगी से जोड़कर देख रहे हैं। गांवों में रहने वाले बुजुर्गों का कहना है कि उन्होंने अपने जीवन में कभी ऐसा नहीं देखा, जब न पलाश खिला हो और न ही सखुआ में पर्याप्त फूल आए हों।

    जंगलों में रहने वाले लोगों के अनुसार, इस वर्ष पलाश में नाम मात्र के फूल आए हैं, जबकि सखुआ में भी बहुत कम पेड़ों में फूल दिखे हैं। इससे पारंपरिक मान्यताओं और प्राकृतिक संतुलन को लेकर लोगों में चिंता बढ़ गई है।

    29rcl_M_11_29032026_512

    रांची समेत कई इलाकों में नहीं खिले पलाश के फूल

    राजधानी रांची के आसपास के क्षेत्रों के साथ-साथ खूंटी, सिंहभूम, हजारीबाग, चतरा, पलामू, लातेहार, गढ़वा, सिमडेगा और गुमला के जंगलों में भी यही स्थिति देखने को मिली है। लगभग पूरे राज्य में पलाश के फूल नहीं खिले हैं, जबकि सखुआ में भी सीमित मात्रा में ही फूल आए हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि यह समस्या किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे झारखंड में व्यापक रूप से देखने को मिल रही है।

    दवा और तेल के पारंपरिक उपयोग पर भी असर

    पलाश और सखुआ का महत्व केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि औषधीय और आर्थिक दृष्टि से भी है। ग्रामीण वैद्य पलाश के फूलों को सुखाकर विभिन्न बीमारियों के इलाज में उपयोग करते हैं। वहीं सखुआ के पेड़ों में फूल आने के बाद उससे जो बीज निकलता है, उससे तेल तैयार किया जाता है। इस वर्ष फूलों की कमी से इन पारंपरिक उपयोगों पर भी असर पड़ने की संभावना है, जिससे ग्रामीण जीवन प्रभावित हो सकता है।

    मौसम में बदलाव या जलवायु असंतुलन की आशंका

    विशेषज्ञों के अनुसार, यह स्थिति केवल एक संयोग नहीं हो सकती, बल्कि इसके पीछे पर्यावरणीय कारण भी हो सकते हैं। मौसम में असामान्य बदलाव, तापमान में उतार-चढ़ाव या वर्षा के पैटर्न में परिवर्तन इसके संभावित कारण हो सकते हैं। यदि आने वाले वर्षों में भी यही स्थिति बनी रहती है, तो इसका असर झारखंड की जैव विविधता, पारंपरिक त्योहारों और ग्रामीण जीवनशैली पर पड़ सकता है।

    क्या कहते हैं एक्स्पर्ट

    प्रकृति के साथ छेड़छाड़, जंगलों की कटाई और पहाड़ों के दोहन का परिणाम है कि इस बार पलाश नहीं खिला, यह झारखंड के लिए चिंता का विषय है।
    -जगलाल पाहन, मुख्य पाहन, हातमा, रांची

    लंबे जाड़े, अचानक गर्मी और जलवायु परिवर्तन के कारण पलाश नहीं खिला, यह प्रकृति से छेड़छाड़ का संकेत है, जिसका भविष्य में गंभीर असर पड़ सकता है।
    -नीतीश प्रियदर्शी, पर्यावरणविद्

    74328257

    सखुआ में भी फूलों की कमी, सिर्फ 20 प्रतिशत पेड़ों में फूल। (फोटो: जागरण) 

    यह भी पढ़ें- झारखंड बजट खर्च: मंइयां योजना ने बढ़ाया मान, तमाम विभागों में खर्च करने का संकट दिखा

    यह भी पढ़ें- गठबंधन में दरार! झामुमो-कांग्रेस में तनातनी के बीच विधायकों का मूड जानने आ रांची रहे तेजस्वी; झारखंड में चल क्या रहा?