बिना दोषमुक्ति के पूरी सैलरी का अधिकार नहीं, DAV के निलंबित कर्मचारी की याचिका पर रांची हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
झारखंड हाई कोर्ट ने डीवीसी के एक निलंबित कर्मचारी के मामले में स्पष्ट किया है कि यदि कोई कर्मचारी पूरी तरह दोषमुक्त नहीं होता, तो उसे निलंबन अवधि का प ...और पढ़ें

रांची हाईकोर्ट। फाइल फोटो

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राज्य ब्यूरो, रांची। झारखंड हाई कोर्ट ने दामोदर वैली कारपोरेशन (डीवीसी) के एक कर्मचारी की सेवा से संबंधित मामले में स्पष्ट किया है कि अगर कोई कर्मचारी पूरी तरह दोषमुक्त नहीं होता है, तो उसे निलंबन अवधि का पूरा वेतन पाने का अधिकार नहीं है।
अदालत ने विभाग द्वारा निलंबन अवधि को नन-ड्यूटी मानने के निर्णय को सही ठहराया। डीवीसी में सहायक आपरेटर (इलेक्ट्रिकल) के पद पर कार्यरत गजेंद्र प्रसाद को वर्ष 2002 में एक आपराधिक मामले के कारण निलंबित कर दिया गया था।
इसके बाद उनके खिलाफ विभागीय जांच शुरू की गई, जिसमें शादी की जानकारी नहीं देने और बिना अनुमति मुख्यालय छोड़ने जैसे आरोप लगाए गए। जांच के बाद कर्मचारी कुछ आरोपों में दोषी पाए गए और 2009 में उन्हें एक साल के लिए एक वेतन वृद्धि रोकने की सजा दी गई।
करीब पांच वर्षों तक निलंबित रहने के दौरान कर्मचारी को केवल जीवन निर्वाह भत्ता दिया गया। बाद में 2018 में विभाग ने आदेश जारी कर पूरे निलंबन काल (2002 से 2007) को नन-ड्यूटी घोषित कर दिया।
यानी इस अवधि को सेवा अवधि में नहीं जोड़ा गया और अतिरिक्त वेतन देने से इनकार कर दिया गया। इस फैसले को चुनौती देते हुए कर्मचारी ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी।
होईकोर्ट ने बरकरार रखा फैसला
एकल पीठ ने मामले में आंशिक राहत देते हुए कुछ निष्कर्षों में हस्तक्षेप किया, लेकिन सजा और निलंबन अवधि को नन-ड्यूटी मानने के आदेश को बरकरार रखा। इसके खिलाफ कर्मचारी ने खंडपीठ में अपील की।
खंडपीठ ने सुनवाई के बाद कहा कि कर्मचारी पूरी तरह दोषमुक्त नहीं हुआ था और विभागीय जांच में कुछ आरोप साबित हुए थे। निलंबन को पूरी तरह गलत भी नहीं माना गया। ऐसे में डीवीसी सेवा नियमावली के तहत कर्मचारी को पूर्ण वेतन का दावा करने का अधिकार नहीं बनता।
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अदालत ने स्पष्ट किया कि नियमों के अनुसार, केवल उन्हीं मामलों में पूरा वेतन मिलता है, जहां कर्मचारी पूरी तरह बरी हो या निलंबन पूरी तरह अनुचित साबित हो।
अन्य मामलों में सक्षम प्राधिकारी ही तय करता है कि कितनी राशि दी जाएगी। इसी आधार पर हाई कोर्ट ने कर्मचारी की अपील को खारिज करते हुए विभाग के फैसले को सही ठहराया।
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