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    झारखंड HC का बड़ा आदेश: पाकुड़ की 8 पत्थर खदानों पर फर्जीवाड़े का आरोप, सरकार को 4 हफ्ते में जांच का अल्टीमेटम!

    Updated: Thu, 26 Mar 2026 02:51 PM (GMT+05:30)

    झारखंड हाई कोर्ट ने पाकुड़ में फर्जी दस्तावेज के आधार पर पत्थर खनन के लिए पर्यावरण स्वीकृति प्राप्त करने के मामले में मंत्रिमंडल निगरानी विभाग को चार ...और पढ़ें

    झारखंड हाई कोर्ट में पाकुड़ पत्थर खनन फर्जीवाड़े पर निर्णय।

    झारखंड हाई कोर्ट में पाकुड़ पत्थर खनन फर्जीवाड़े पर निर्णय।

    HighLights

    1. हाई कोर्ट ने जांच पर निर्णय को चार सप्ताह दिए।

    2. पाकुड़ में आठ कंपनियों पर फर्जीवाड़े का आरोप।

    3. पर्यावरण स्वीकृति गलत तरीके से हासिल की गई।

    राज्य ब्यूरो, रांची। झारखंड हाई कोर्ट के जस्टिस आर मुखोपाध्याय की अदालत ने फर्जी दस्तावेज के आधार पर पाकुड़ में पत्थर खनन के लिए पर्यावरण स्वीकृति प्राप्त करने मामले में मंत्रिमंडल निगरानी विभाग को प्रारंभिक जांच पर निर्णय लेने के लिए चार सप्ताह का समय प्रदान किया है।

    इस मामले में एसीबी की ओर से प्रारंभिक जांच (पीई) दर्ज करने के लिए मंत्रिमंडल निगरानी विभाग को पत्र लिखा गया था। अदालत ने उक्त आदेश के साथ ही याचिका को निष्पादित कर दिया है। इस संबंध में प्रार्थी पंकज कुमार यादव ने हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की थी।

    जिसमें आरोप लगाया था कि आठ खनन पट्टाधारकों ने पाकुड़ जिला खनन पदाधिकारी के प्रमाणपत्र में फेरबदल करके और राज्य स्तरीय पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण (सिया) के अधिकारियों से मिलीभगत करके पर्यावरण अनुमति प्राप्त कर ली, जो दंडनीय अपराध है।

    अधिकारियों की मिलीभगत कर अवैध खनन

    प्रार्थी की ओर से अधिवक्ता राजीव रंजन तिवारी ने कहा कि इन पट्टाधारकों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश दिया जाए, क्योंकि इन्होंने फर्जी दस्तावेज और सिया के अधिकारियों की मिलीभगत कर एक साल तक खनन किया, जिससे राज्य सरकार को राजस्व का नुकसान हुआ।

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    इन कंपनियों का सिर्फ खनन पट्टा निरस्त किया गया, जबकि मामले में प्राथमिकी दर्ज कर जांच की जानी चाहिए। सरकार की ओर से अधिवक्ता गौरव राज ने अदालत को बताया कि प्रार्थी की शिकायत पर पट्टाधारकों के लाइसेंस पहले ही निरस्त किए जा चुके हैं।

    भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) ने दो सितंबर 2025 को पत्र के माध्यम से प्रारंभिक जांच दर्ज करने की अनुमति के लिए मंत्रिमंडल निगरानी विभाग से पत्राचार किया था, लेकिन अभी तक इस पर कोई निर्णय नहीं लिया गया है।

    इसके बाद अदालत ने मंत्रिमंडल निगरानी विभाग के प्रधान सचिव को निर्देश दिया कि वे दो सितंबर के पत्र पर चार सप्ताह के भीतर विचार करते हुए आवश्यक कार्रवाई करें।

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