मेरा नामकुम मेरी पहचान: 186 साल पहले रांची में उगी थी चाय, आज बंद है प्रोसेसिंग प्लांट
झारखंड में चाय की खेती को पुनर्जीवित करने के प्रयास जारी हैं, जिसमें गुमला और हजारीबाग में पायलट प्रोजेक्ट शुरू किए गए हैं। रांची के नामकुम जैसे क्षेत ...और पढ़ें

1950 के आसपास पिस्का मोड़ के पास चाय की खेती का दुर्लभ तस्वीर। जागरण
HighLights
गुमला और हजारीबाग में चाय की खेती के पायलट प्रोजेक्ट शुरू।
रांची में 1839 से चाय बागानों का गौरवशाली इतिहास रहा।
संजय कृष्ण, रांची। चाय की पत्तियां एक बार फिर जीवन में स्वाद घोल सकती हैं। गुमला व हजारीबाग में एक बार फिर से सरकार पायलट प्रोजेक्ट के तहत प्रयास कर रही है। हजारीबाग में काम शुरू हो गया है।
नामकुम का पुराना दौर लौट सकता है। उसकी पहचान एक बार फिर चाय की खेती से बन सकती है। कहना न होगा, हमारी स्मृतियों में नामकुम चाय बागान की स्मृतियां एकदम ताजी हैं। यहां के चाय बागान में अब बस्ती आबाद हो गई है, लेकिन नाम आज भी रह गया है।
यहां हाल-हाल तक खेती होती थी। फिर नामकुम ही नहीं, कई और क्षेत्र थे, जहां चाय की पैदावार होती थी। 1966 में 12 चाय बागान का जिक्र मिलता है, जिसमें काम करने वाली पांच सौ से अधिक महिला श्रमिक थीं। ये सभी आदिवासी महिलाएं थीं। नामकुम से लेकर महिलौंग और गेतलसूद तक पूरा इलाका ही चाय की खेती के लिए प्रसिद्ध था।

रांची में पहली बार कब उगी थी चाय?
रांची में चाय की खेती की बात करें तो 1839 में रांची में गवर्नर-जनरल के एजेंट आस्ले ने अपने परिसर में चाय उगाने का सफल प्रयोग करने के बाद फोर्ट विलियम स्थित बंगाल सरकार को सुझाव दिया था कि छोटानागपुर में चाय उगाई जा सकती है।
इस सुझाव को स्वीकार कर लिया गया और रांची के आसपास के इलाकों में कई चाय और काफी के बागान शुरू किए गए। रांची में चाय की खेती 1862 से चली आ रही है और इसकी शुरुआत स्टेनफोर्थ ने की थी, जो एक सेवानिवृत्त नागरिक थे और रांची में बस गए थे।
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उन्होंने दो बागान शुरू किए, एक रांची से लगभग तीन मील उत्तर में होटवार में और दूसरा लगभग 12 मील पूर्व में प्लांडू में। इस बागान को उन्होंने बड़कागढ़ एस्टेट से पट्टे पर लिया था, जिसे विद्रोह के बाद सरकार ने जब्त कर लिया था।
वर्ष 1872 में प्लांडू बागान का पूरा क्षेत्र (184 एकड़) परिपक्व पौधों से आच्छादित था और इससे 20,500 पाउंड (एक पाउंड-450 ग्राम) पत्तियां प्राप्त हुईं, जिनका उपयोग काली चाय बनाने में हुआ। होटवार एस्टेट में केवल 35 एकड़ क्षेत्र परिपक्व पौधों से आच्छादित था और इससे 3,200 पाउंड चाय प्राप्त हुई। इसके बाद कई नए बागान खोले गए और सभी यूरोपीय प्रबंधन के अधी थे।

वर्ष 1966 तक 2,070 एकड़ क्षेत्र में फैले 21 बागान थे, जबकि उत्पादन 300,000 पाउंड से अधिक हो रहा था। उसी समय पूरी तरह से काफी की पत्तियों से ग्रीन टी बनाई जाती थी। छोटा नागपुर में काफी की पैदावार भी अच्छी होती थी, लेकिन बड़े पैमाने पर इसकी खेती नहीं की जाती है।
रांची का पुरुलिया रोड काफी की खेती के लिए प्रसिद्ध था और इसकी खेती जाहिर है, मिशनरियां कराती थीं। उसी तरह चाय बागान की खेती पिस्का मोड़ और नामकुम क्षेत्र में भी बड़े पैमाने पर की जाती थी।
इन बागानों में हरी चाय का उत्पादन होता था, जिसे कलकत्ता भेजा जाता है और वहां से इसे मुख्य रूप से मध्य पूर्व के देशों में निर्यात किया जाता है। जिन 12 चाय बागानों का उल्लेख मिलता है, उनमें से 11 सुवर्णरेखा कृषि संपदा, प्लांडू के अंतर्गत आते थे, प्लांडू और सबेया नामक दो समूहों में विभाजित किया गया था। शेष एक, यानी दलादली चाय बागान, डोला चाय संपदा के अंतर्गत आता था।
1966 में कार्यरत बागान
| क्रमांक | चाय बागान | क्षेत्रफल (एकड़) | श्रमिकों की संख्या |
|---|---|---|---|
| 1 | प्लांडू चाय बागान | 200 | 146 |
| 2 | चूरू चाय बागान | 135 | 74 |
| 3 | बड़गांव चाय बागान | 145 | 48 |
| 4 | खटंगा चाय बागान | 134 | 42 |
| 5 | महिलौंग चाय बागान | 95 | 45 |
सबेया टी एस्टेट-
| क्रमांक | चाय बागान | क्षेत्रफल (एकड़) | श्रमिकों की संख्या |
|---|---|---|---|
| 1 | सबेया चाय बागान | 33.16 | 83 |
| 2 | मेसरा चाय बागान | 104.07 | 56 |
| 3 | महेशपुर चाय बागान | 69.00 | 50 |
| 4 | तापी टोआ चाय बागान | 102.11 | 30 |
| 5 | आनंदी चाय बागान | 54.00 | 32 |
| 6 | गेतलसूद चाय बागान | 47.73 | 30 |
डाला टी एस्टेट-
1. दलदली चाय बागान 101 19
गुमला में चाय की खेती की नई शुरुआत, 35 एकड़ में बनेगा पायलट प्रोजेक्ट
गुमला: गुमला जिले में पहली बार व्यावसायिक स्तर पर चाय की खेती की दिशा में बड़ा कदम उठाया जा रहा है। बिशुनपुर के नरमा फार्म में उद्यान विभाग 35 एकड़ भूमि पर 1.46 करोड़ रुपये की लागत से पायलट प्रोजेक्ट शुरू करेगा।
विभाग को 70 लाख रुपये की प्रारंभिक राशि भी मिल चुकी है। जानकारी के अनुसार चाय की खेती की योजना दो-तीन वर्ष पहले ही बनाई गई थी। उस समय खेत तैयार कर लिया गया था और कुछ चाय के पौधे भी मंगाए गए थे, लेकिन पौधरोपण के लिए अनुकूल मौसम नहीं रहने के कारण पौधे नहीं लगाए जा सके। इसके बाद तैयार खेत लंबे समय तक बंजर पड़ा रहा।

अब विभाग ने इस वर्ष फिर से पौधारोपण की तैयारी शुरू कर दी है। परियोजना सफल होने पर किसानों को नकदी फसल का नया विकल्प मिलेगा, रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और गुमला चाय उत्पादन के क्षेत्र में नई पहचान बना सकेगा।
हजारीबाग में हो रही खेती
कृषि मंत्री नेहा शिल्पी तिर्की ने बताया कि हजारीबाग के डेमोटांड के 20 एकड़ भूमि में चाय की खेती हो रही है। अब यहां काफी की भी खेती होगी, इसे उद्यान से जोड़ा जाएगा। हजारीबाग छोड़कर कही भी चाय की खेती सफल नहीं हुई। कृषि विभाग अब डेमोटाड में ही पूरा ध्यान लगाएगा। अन्य जिलों की मिट्टी और क्लाइमेट अनुकूल नहीं है।
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