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    बारिश की पहली बूंद पड़ते ही शुरू हो जाती है 'सफेद सोने' की तलाश, आखिर क्यों ₹1000 तक बिकता है झारखंड का रुगड़ा?

    By Mansi KumariEdited By: Mansi Kumari
    Updated: Tue, 21 Jul 2026 06:00 AM (GMT+05:30)

    झारखंड का मशहूर रुगड़ा, जिसे 'सफेद सोना' भी कहते हैं, बारिश में जंगल की मिट्टी के नीचे प्राकृतिक रूप से उगता है। यह ग्रामीण परिवारों के लिए मौसमी आय क ...और पढ़ें

    झारखंड को 'सफेद सोना'। जागरण

    झारखंड को 'सफेद सोना'। जागरण

    HighLights

    1. रुगड़ा जंगल की नम मिट्टी में प्राकृतिक रूप से उगता है।

    2. यह ग्रामीण महिलाओं के लिए मौसमी आय का स्रोत है।

    डिजिटल डेस्क, रांची। सुबह के चार बजे हैं। चारों तरफ घना अंधेरा, लगातार होती बारिश और जंगल की पगडंडी पर टोकरी लेकर तेजी से बढ़ते कदम। गांव की महिलाएं किसी पिकनिक पर नहीं, बल्कि उस खजाने की तलाश में निकलती हैं, जो मिट्टी के नीचे छिपा है। यह सोना-चांदी नहीं, बल्कि झारखंड का मशहूर रुगड़ा है।

    जिस रुगड़ा को शहरों में लोग स्वाद और शौक से खरीदते हैं, वही रुगड़ा जंगल किनारे रहने वाले परिवारों के लिए कुछ हफ्तों की ऐसी कमाई लेकर आता है, जिससे बच्चों की पढ़ाई, घर का राशन और कई जरूरी खर्च पूरे होते हैं। यही वजह है कि झारखंड में इसे सिर्फ जंगल की सब्जी नहीं, बल्कि सफेद सोना भी कहा जाता है।

    मिट्टी के नीचे छिपा होता है रुगड़ा, अनुभव से होती है पहचान

    रुगड़ा खेत में नहीं बोया जाता और न ही किसी पेड़ पर उगता है। यह साल के जंगलों की नम और भुरभुरी मिट्टी के अंदर प्राकृतिक रूप से विकसित होता है। बारिश के बाद जमीन पर हल्का उभार बनता है।

    अनुभवी ग्रामीण उसी उभार को देखकर समझ जाते हैं कि नीचे रुगड़ा है। इसके बाद हाथों या छोटी लकड़ी की मदद से बेहद सावधानी से मिट्टी हटाई जाती है। जरा-सी जल्दबाजी रुगड़ा को तोड़ सकती है, जिससे उसकी बाजार में कीमत घट जाती है।

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    हर दिन नहीं मिलता, किस्मत भी साथ होनी चाहिए

    रुगड़ा खोजने का कोई तय फॉर्मूला नहीं है। कई बार लोग सुबह से दोपहर तक जंगल में घूमते रहते हैं और मुश्किल से एक-दो किलो रुगड़ा मिलता है। वहीं कभी कुछ घंटों में ही टोकरी भर जाती है। जंगल का रास्ता आसान नहीं होता। फिसलन, कीड़े-मकोड़े, सांप-बिच्छु और बारिश के बीच घंटों की मेहनत के बाद जो रुगड़ा मिलता है, वही शहर की मंडियों में ऊंची कीमत पर बिकता है।

    इसी मेहनत की वजह से महंगा होता है रुगड़ा

    रुगड़ा की कीमत सिर्फ स्वाद की वजह से नहीं बढ़ती। इसकी सबसे बड़ी वजह है सीमित उपलब्धता और इसे जुटाने में लगने वाली मेहनत। यह साल में केवल कुछ सप्ताह के लिए मिलता है।

    खेती नहीं होती, उत्पादन पूरी तरह प्रकृति पर निर्भर है और मांग लगातार बढ़ रही है। यही कारण है कि कई बाजारों में इसकी कीमत 800 से 1200 रुपये प्रति किलो तक पहुंच जाती है। कुछ दुर्लभ किस्में इससे भी ज्यादा कीमत पर बिकती हैं।

    अब गांव से निकलकर शहरों की थाली तक

    एक समय था जब रुगड़ा सिर्फ ग्रामीण और आदिवासी परिवारों के भोजन का हिस्सा था। आज रांची, जमशेदपुर, बोकारो और धनबाद जैसे शहरों में इसकी मांग लगातार बढ़ रही है।

    रुगड़ा, जिसे पुटू या शाकाहारी मटन भी कहा जाता है, मुख्य रूप से झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओडिशा के जंगलों में मानसून के मौसम में पाया जाता है।

    होटल और रेस्तरां भी मानसून में रुगड़ा के विशेष व्यंजन तैयार करते हैं। सावन में मांसाहार से परहेज करने वाले लोगों के लिए यह स्वादिष्ट शाकाहारी विकल्प माना जाता है।

    महिलाओं के लिए बारिश का सबसे बड़ा रोजगार

    ग्रामीण इलाकों में रुगड़ा सिर्फ जंगल से मिलने वाला खाद्य पदार्थ नहीं, बल्कि मौसमी रोजगार भी है। कई महिलाएं बताती हैं कि सीजन के दौरान रुगड़ा बेचकर घर की आर्थिक स्थिति मजबूत होती है। अच्छी उपलब्धता होने पर कई परिवार पूरे सीजन में हजारों से लेकर लाख रुपये तक की अतिरिक्त आय अर्जित कर लेते हैं।

    क्या कहते है डॉक्टर?

    रुगड़ा में प्रोटीन, फाइबर और कई जरूरी खनिज तत्व पाए जाते हैं। यह पौष्टिक खाद्य पदार्थ है, लेकिन चूंकि यह मिट्टी के अंदर उगता है, इसलिए इसे अच्छी तरह साफ करके और पूरी तरह पकाकर ही खाना चाहिए। जिन लोगों को किसी प्रकार की फूड एलर्जी या पाचन संबंधी समस्या है, उन्हें सीमित मात्रा में ही इसका सेवन करना चाहिए।

    -डॉ. बी कुमार, पूर्व विभागाध्य, मेडिसिन विभाग, रिम्स।