JMM और आजसू की नजर बंगाल के सीमावर्ती इलाकों पर, 'जल-जंगल-जमीन' के नाम पर जयराम भी मैदान में
Assembly election 2026 झारखंड की क्षेत्रीय पार्टियां जैसे झामुमो, आजसू और जेएलकेएम बंगाल के सीमावर्ती क्षेत्र में राजनीतिक पैठ बनाने की कोशिश कर रही ह ...और पढ़ें

झारखंडी दल बंगाल के जंगल महल में विस्तार कर रहे।
HighLights
झामुमो, आजसू, जेएलकेएम की सीमावर्ती सीटों पर नजर।
यह सक्रियता बंगाल के सियासी समीकरणों को प्रभावित करेगी।
प्रदीप सिंह, रांची। झारखंड की क्षेत्रीय राजनीति अब राज्य की सीमाओं से बाहर निकलकर बंगाल में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की दिशा में आगे बढ़ रही है।
सत्तारूढ़ झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो), आजसू पार्टी और झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा (जेएलकेएम) बंगाल के सीमावर्ती इलाकों खासकर जंगल महल क्षेत्र में अपनी राजनीतिक जमीन तलाशने में जुट गई हैं।
इन दलों की रणनीति साफ संकेत देती है कि आने वाले समय में झारखंड की राजनीति का असर पड़ोसी राज्यों में भी देखने को मिल सकता है।
बंगाल का जंगल महल क्षेत्र, जिसमें पुरुलिया, बांकुड़ा और पश्चिम मेदिनीपुर जैसे जिले शामिल हैं, झारखंड से भौगोलिक और सामाजिक रूप से काफी जुड़ा हुआ है। यहां बड़ी संख्या में आदिवासी और मूलवासी समुदाय निवास करते हैं, जिनका सांस्कृतिक और भाषाई रिश्ता झारखंड से गहरा है।
यही वजह है कि झारखंडी पार्टियां इस क्षेत्र को अपने विस्तार के लिए उपयुक्त मान रही हैं। इन दलों की नजर पांच से 10 ऐसी विधानसभा सीटों पर है, जहां वे अपने उम्मीदवार उतारने की तैयारी में हैं।
झामुमो की रणनीति और गठबंधन की संभावना
झारखंड मुक्ति मोर्चा एंट्री को लेकर सतर्क और रणनीतिक रुख अपनाए हुए है। पार्टी नेतृत्व तृणमूल कांग्रेस के साथ तालमेल बनाकर आगे बढ़ने की संभावनाओं पर विचार कर रहा है।
माना जा रहा है कि अगर गठबंधन की स्थिति बनती है तो झामुमो सीमित सीटों पर चुनाव लड़ते हुए अपनी उपस्थिति दर्ज कराना चाहेगा।
इससे पार्टी को बंगाल में बिना बड़े जोखिम के संगठन विस्तार का अवसर मिल सकता है। पिछले विधानसभा चुनाव में भी यह कवायद हुई थी। लेकिन अंतिम समय में झामुमो अध्यक्ष हेमंत सोरेन को तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने अपने पक्ष में प्रचार के लिए मना लिया था।
आजसू की पुरानी कोशिशें और भाजपा से तालमेल
आजसू पार्टी पहले भी बंगाल में चुनावी प्रयोग कर चुकी है। पिछले विधानसभा चुनाव में पार्टी ने पुरुलिया से सटे बाघमुंडी सीट पर अपना उम्मीदवार उतारा था।
हालांकि, उस समय उसे अपेक्षित सफलता नहीं मिली, लेकिन पार्टी ने अपने जनाधार को परखने का प्रयास जरूर किया। इस बार आजसू भाजपा के साथ संभावित तालमेल के जरिए बंगाल में अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश में है।
चर्चा है कि भाजपा आजसू के लिए एक सीट छोड़ सकती है, ताकि गठबंधन का दायरा और प्रभाव बढ़ाया जा सके।
जेएलकेएम का आक्रामक विस्तार अभियान
झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा (जेएलकेएम) इस पूरे परिदृश्य में आक्रामक नजर आ रहा है। पार्टी के अध्यक्ष जयराम कुमार महतो लगातार सीमावर्ती बंगाल क्षेत्रों का दौरा कर रहे हैं और स्थानीय स्तर पर संगठन को मजबूत करने में जुटे हैं।
जेएलकेएम का दावा है कि वह झारखंड की सीमा से सटे बंगाल के इलाकों में मजबूत विकल्प बन सकता है।
पार्टी पांच से 10 सीटों पर उम्मीदवार उतारने की योजना पर काम कर रही है और स्थानीय मुद्दों को प्रमुखता देने की रणनीति अपना रही है। जयराम ने इस सिलसिले में झारखंड से सटे इलाकों में प्रचार अभियान भी आरंभ कर दिया है।
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सियासी समीकरणों पर पड़ेगा असर
झारखंडी दलों की इस सक्रियता से बंगाल के पारंपरिक राजनीतिक समीकरणों पर असर पड़ सकता है। खासकर जंगल महल क्षेत्र, जो पहले से ही राजनीतिक रूप से संवेदनशील रहा है।
वहां नए राजनीतिक दलों की एंट्री मुकाबले को त्रिकोणीय या बहुकोणीय बना सकती है। इससे वोटों का बिखराव होने की संभावना भी बढ़ेगी, जिसका सीधा फायदा या नुकसान बड़े दलों तृणमूल कांग्रेस और भाजपा को हो सकता है।
हालांकि, झारखंडी दलों के लिए यह राह आसान नहीं होगी। बंगाल की राजनीति में स्थानीय मुद्दे, भाषा और क्षेत्रीय पहचान बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
ऐसे में बाहरी दलों को अपनी स्वीकार्यता साबित करने के लिए जमीन पर लंबा काम करना होगा। फिर भी, सीमावर्ती इलाकों में साझा सामाजिक-सांस्कृतिक आधार इन दलों के लिए एक अवसर जरूर प्रदान करता है।
बंगाल की सियासत में झारखंडी पार्टियों की यह सक्रियता आने वाले चुनावों को और दिलचस्प बना सकती है, जहां सीमाओं के पार भी राजनीतिक विस्तार की नई कहानी लिखी जा रही है।
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