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    RIMS में भ्रष्टाचार पर CID का शिकंजा: नामांकन और टेंडर घोटालों की जांच तेज, UP की तीन अयोग्य कंपनियों को काम

    Updated: Thu, 25 Jun 2026 10:50 AM (IST)

    रिम्स रांची में नामांकन और टेंडर आवंटन में अनियमितताओं की शिकायतों पर सीआईडी ने छापेमारी की। सीआईडी ने फर्जी प्रमाण पत्र पर नामांकन और अयोग्य कंपनियों ...और पढ़ें

    शैक्षणिक सत्र 2025-2026 में फर्जी प्रमाण पत्र वाले छात्रों के नामांकन की भी है शिकायत।

    शैक्षणिक सत्र 2025-2026 में फर्जी प्रमाण पत्र वाले छात्रों के नामांकन की भी है शिकायत।

    HighLights

    1. सीआईडी ने रिम्स में अनियमितताओं की जांच शुरू की।

    2. फर्जी प्रमाण पत्रों पर नामांकन की शिकायतें सामने आईं।

    3. अयोग्य कंपनियों को सफाई ठेका देने का आरोप है।

    राज्य ब्यूरो, रांची। अब रिम्स में भ्रष्टाचार, अनियमितता की जांच को अपराध अनुसंधान विभाग (सीआईडी) ने अपने अधीन ले लिया है। वर्तमान में दो शिकायतें सीआईडी के पास हैं। एक नामांकन व दूसरी टेंडर आवंटन में अनियमितता से संबंधित है।

    इन दोनों ही शिकायतों की जांच के लिए सीआईडी की दो अलग-अलग विशेष टीमें एक-एक डीएसपी के नेतृत्व में बुधवार को रिम्स में छापेमारी की। दोनों ही शिकायतों से संबंधित दस्तावेज को सीआईडी की टीम ने जब्त की है, जिसकी जांच होगी। जांच में अनियमितता की पुष्टि के बाद सभी संबंधित दोषियों के विरुद्ध सीआइडी प्राथमिकी दर्ज करेगी।

    सीआईडी की एक टीम नामांकन घोटाला से संबंधित मामले में डीन कार्यालय में संबंधित फाइलो की जानकारी ली। वहां से दस्तावेज उठाए। शैक्षणिक सत्र 2025-2026 में नामांकित छात्रों व उनसे जुड़े दस्तावेजों को खंगाला। जबकि, दूसरी टीम रिम्स निदेशक के कार्यालय में जमी रही। वहां टेंडर आवंटन से संबंधित कागजातों का अध्ययन किया।

    रिम्स में सफाइ व्यवस्था के लिए जिन कंपनियों को टेंडर आवंटित हुए हैं, उनसे जुड़े दस्तावेजों का सत्यापन किया। सीआईडी की टीम ने इससे जुड़े दस्तावेज भी जब्त की है। जिसकी जांच होनी है। ये हैं दोनों मामले-

    नामांकन घोटाला : फर्जी प्रमाण पत्रों पर नामांकन लेने का है आरोप

    रिम्स में शैक्षणिक सत्र 2025-2026 बैच में एमबीबीएस में नामांकित छात्र-छात्राओं में कइयों के फर्जी प्रमाण पत्र पर नामांकन के आरोप लगे थे। मामला उजागर होने के बाद रिम्स प्रबंधन ने अपने स्तर से इसकी जांच की। रिम्स प्रबंधन के अनुसार तीन छात्र-छात्राओं के प्रमाण पत्र फर्जी होने के संदेह सामने आए।

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    इनमें एक छात्रा काजल कुमारी का जाति प्रमाण पत्र जांच में फर्जी मिला, जिसके बाद उसका नामांकन रद किया गया। दूसरे छात्र आशीष कुमार के जाति प्रमाण पत्र की जांच के लिए साहिबगंज भेजा गया है, जिसकी जांच रिपोर्ट अभी नहीं मिली है। तीसरा छात्र पप्पू सिंह की निश्शकतता प्रमाण पत्र जांच में सही पाया गया है।

    हालांकि सीआईडी का कहना है कि फर्जी प्रमाण पत्र का मामला सिर्फ तीन छात्र-छात्राओं से ही जुड़े नहीं हैं। फर्जीवाड़ा के मामले अन्य छात्र-छात्राओं से संबंधित भी हैं, जिसकी जांच चल रही है। आरोप है कि रिम्स प्रबंधन शिकायतों पर पर्दा डाले रहा और पिछले एक साल में अपनी जांच पूरी नहीं कर पाया।

    इसका नतीजा यह हुआ कि जिसके प्रमाण पत्र फर्जी होंगे, उसने एक साल तक अपनी पढ़ाई भी पूरी कर ली है। ऐसे में अब उसका प्रमाण पत्र फर्जी पाया जाएगा तो इसके लिए जिम्मेदार कौन होंगे। सीआईडी इन सभी बिंदुओं पर अपनी जांच कर रही है।

    टेंडर अनियमितता : यूपी की तीन कंपनियों को नियमों को ताक पर रखकर काम

    दूसरी शिकायत रिम्स की सफाई व्यवस्था के टेंडर आवंटन में अनियमितता का है। आरोप है कि उत्तर प्रदेश की तीन कंपनियों को नियमों को ताक पर रखकर काम दिया गया है। ये टेंडर रिम्स में पूर्ण स्वच्छता, हाउसकीपिंग, नगर कचरा प्रबंधन और बायोमेडिकल वेस्ट हैंडलिंग से जुड़े थे। आरोप है कि अयोग्य कंपनियों को टेंडर दिया गया था। वित्तीय अनियमितता सहित बड़ी गड़बड़ियों की शिकायत मिली हैं।

    रिम्स में पूर्व में सफाई कार्य से जुड़ीं रहीं अन्नपूर्णा यूटिलिटी सर्विसेज ने स्वास्थ्य मंत्री को पत्र लिखकर इसकी शिकायत की थी। इस कंपनी ने अपनी शिकायत में बताया था कि किस तरह रिम्स प्रबंधन ने टेंडर की तिथि बढ़ा दी और लखनऊ व दिल्ली की अपनी चहेती एजेंसियों को टेंडर भरने का मौका दिया। अन्नपूर्णा यूटिलिटी सर्विसेज इसको लेकर कोर्ट भी गई थी।

    शिकायत के अनुसार रिम्स में सफाई व्यवस्था का टेंडर भरने की अंतिम तिथि 25 जून 2025 की शाम पांच बजे तक थी। नियम विरुद्ध अगले दिन 26 जून की शाम को सुधार पत्र जारी कर टेंडर भरने की तिथि 30 जून कर दी गई।

    नियम कहता है कि शुद्धि पत्र 25 जून की शाम तक जारी होना था। आरोप है कि ऐसा इसलिए किया गया, ताकि रिम्स प्रबंधन के चहेते लखनऊ व दिल्ली वालों का टेंडर भरा जा सके। इस टेंडर में 18 एजेंसियों ने हिस्सा लिया और उनमें से कइयों को शुद्धि पत्र की जानकारी नहीं थी। अन्नपूर्णा एजेंसी को तीन साल के कार्य अनुभव का प्रमाण पत्र भी नहीं दिया गया था।

    जिन्हें टेंडर दिया गया था, उनके पास न औसत वार्षिक टर्नओवर मापदंड के अनुरूप था और न हीं हाउसकीपिंग, सेनिटेशन व बायोमेडिकल वेस्ट जैसे विशिष्ट कार्यों के अनुरूप थे।

    टेंडर में शामिल एजेंसियों के लिए कम से कम तीन वर्षों के अस्पताल अनुभव व 500 बेड वाले अस्पतालों का कार्य अनुभव अनिवार्य था, लेकिन चयनित तीनों एजेंसियां इन शर्तों को पूरा नहीं कर रही थी, फिर भी उन्हें टेंडर दिया गया। सीआइडी की टीम सभी शिकायतों से संबंधित जांच तेज की है। इससे संबंधित दस्तावेज भी जब्त की है, जिसकी जांच होनी है।

    रिम्स की जमीन घोटाला मामले में आरोपित को नहीं मिली जमानत

    एसीबी के विशेष न्यायाधीश ओंकार नाथ चौधरी की अदालत से रिम्स की अधिग्रहीत जमीन से जुड़े मामले में आरोपित प्रमोद कुमार महतो को राहत नहीं मिली है। सुनवाई के बाद अदालत ने बुधवार को उसकी अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी।

    अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए उसे अग्रिम राहत देने से इंकार कर दिया। मामला वर्ष 1964-65 में रिम्स के लिए अधिग्रहीत करीब 9.65 एकड़ जमीन से जुड़ा है। आरोप है कि उक्त सरकारी जमीन को निजी संपत्ति के रूप में दर्शाने के लिए आरोपितों ने आपस में मिलीभगत कर फर्जी वंशावली तैयार की।

    इसके आधार पर जमीन पर अवैध कब्जा कर अपार्टमेंट, दुकान और मकान का निर्माण कराया गया। इस मामले में झारखंड हाई कोर्ट के सख्त आदेश के बाद भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) ने पांच जनवरी 2026 को प्राथमिकी दर्ज कर जांच शुरू की थी।

    जांच के दौरान एसीबी ने सात अप्रैल 2026 को कार्रवाई करते हुए चार आरोपितों राजकिशोर बड़ाइक, कार्तिक बड़ाइक, राजेश झा और चेतन कुमार को गिरफ्तार किया है। एसीबी का आरोप है कि सरकारी भूमि को हड़पने के उद्देश्य से सुनियोजित तरीके से दस्तावेजों में हेराफेरी की गई। मामले की जांच अब भी जारी है।