झारखंड में पहली बार प्रीनेटल जेनेटिक जांच शुरू, गर्भ में ही पता चलेगा आनुवांशिक बीमारी का पता
रिम्स रांची के जेनेटिक्स विभाग ने झारखंड में पहली बार प्रसवपूर्व आनुवांशिक जांच शुरू की है। इससे गर्भ में ही थैलेसीमिया और सिकल सेल एनीमिया जैसी गंभीर ...और पढ़ें

रिम्स
HighLights
रिम्स रांची में पहली बार प्रसवपूर्व आनुवांशिक जांच शुरू।
थैलेसीमिया, सिकल सेल जैसी गंभीर बीमारियों की गर्भ में पहचान।
निजी लैब से कम खर्च, एक साल तक निःशुल्क जांच।
जागरण संवाददाता, रांची। राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (रिम्स) के जेनेटिक्स एवं जीनोमिक्स विभाग ने प्रसवपूर्व (प्रीनेटल) आनुवांशिक जांच के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि हासिल की है।
अब गर्भ में पल रहे शिशु में थैलेसीमिया, सिकल सेल एनीमिया, ड्यूशेन मस्कुलर डिस्ट्राफी, स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी समेत कई गंभीर आनुवांशिक बीमारियों की समय रहते पहचान संभव हो गई है। इससे ऐसे दंपतियों को बड़ी राहत मिलेगी, जिनके परिवार में पीढ़ी-दर-पीढ़ी आनुवांशिक रोगों का इतिहास रहा है।
रिम्स के जेनेटिक्स एवं जीनोमिक्स विभागाध्यक्ष डॉ. अनूपा प्रसाद ने बताया कि अधिकांश आनुवांशिक बीमारियों का स्थायी इलाज अभी उपलब्ध नहीं है। ऐसे में समय रहते बीमारी की पहचान और आनुवांशिक परामर्श ही सबसे प्रभावी उपाय है।
उन्होंने बताया कि डॉ. किरण त्रिवेदी के साथ मिलकर झारखंड में पहली बार इस सुविधा की शुरुआत की गई है। अब तक विभाग में थैलेसीमिया और सिकल सेल एनीमिया से संबंधित 26 प्रसवपूर्व आनुवांशिक परीक्षण किए जा चुके हैं।
इन जांचों और विशेषज्ञ परामर्श के आधार पर दो बीटा-थैलेसीमिया और दो सिकल सेल रोग से प्रभावित शिशुओं के जन्म को रोका जा चुका है। इसके अलावा पहली बार बीटा-कीटोथायोलेज की कमी (बीटा-कीटोथायोलेज डिफिशिएंसी) जैसे अत्यंत दुर्लभ आनुवांशिक रोग का भी सफल प्रसवपूर्व निदान किया गया। यह बीमारी एसीएटी-1 जीन में परिवर्तन के कारण होती है। समय पर पहचान और परामर्श से इस रोग से प्रभावित शिशु के जन्म को भी रोका गया।
गर्भावस्था के शुरुआती चरण में होती है जांच
रिम्स में गर्भावस्था के 9 से 11 सप्ताह तथा 16 से 20 सप्ताह के बीच प्रसवपूर्व जांच की सुविधा उपलब्ध है। जांच के लिए गर्भ से सुरक्षित तरीके से नमूना लिया जाता है।
इसके बाद डीएनए निकालकर पीसीआर, सैंगर सीक्वेंसिंग और एमएलपीए जैसी अत्याधुनिक तकनीकों से आनुवांशिक परीक्षण किया जाता है। जांच रिपोर्ट के आधार पर दंपति को विशेषज्ञ आनुवांशिक परामर्श दिया जाता है। पूरी प्रक्रिया में सामान्यत एक से दो सप्ताह का समय लगता है।
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निजी लैब की तुलना में बेहद कम खर्च
रिम्स में इस जांच की लागत मात्र 3,500 रुपये है, जबकि निजी प्रयोगशालाओं में इसी जांच के लिए 15 हजार रुपये या उससे अधिक खर्च करना पड़ता है। विभाग के अनुसार डीबीटी-निदान केंद्र परियोजना के तहत अगले एक वर्ष तक यह जांच निःशुल्क उपलब्ध कराई जाएगी।
गंभीर बीमारियों की रोकथाम में मिलेगी मदद
विशेषज्ञों के अनुसार जिन परिवारों में पहले से थैलेसीमिया, सिकल सेल रोग, मस्कुलर डिस्ट्राफी या अन्य आनुवांशिक बीमारियों का इतिहास है, उनके लिए यह सुविधा बेहद महत्वपूर्ण साबित होगी।
समय पर जांच से गर्भस्थ शिशु में बीमारी की पुष्टि होने पर दंपति चिकित्सकीय सलाह के आधार पर उचित निर्णय ले सकेंगे। इससे भविष्य में गंभीर आनुवांशिक रोगों से प्रभावित बच्चों के जन्म को रोकने और परिवारों को मानसिक, सामाजिक तथा आर्थिक बोझ से बचाने में भी मदद मिलेगी।