मंगलसूत्र नहीं, इन लाल-सफेद चूड़ियों से होती है बंगाली सुहागिनों की पहचान; क्या है सदियों पुरानी शाखा-पोला परंपरा?
शाखा-पोला बंगाली दुल्हनों के लिए लाल और सफेद चूड़ियों का प्रतीक है, जिसे मंगलसूत्र जितना ही महत्व दिया जाता है।

शाखा पोला पहने जाने की परंपरा (Image Source: AI Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। बंगाली शादी में दुल्हन के सोलह शृंगार में लाल सफेद कंगन यानी शाखा-पोला जरूर होता है। यही औरतों के शादीशुदा होने की सबसे बड़ी निशानी है और हम कह सकते हैं कि बंगाल की परंपरा में इन सफेद कंगनों को मंगलसूत्र जितना महत्व दिया गया है।
इन सभी बातों के इतर यहां सवाल यह है कि आखिर क्यों ये कंगन बंगाली दुल्हनों को पहनाए जाते हैं? कहां से यह परंपरा शुरु हुई? आइए इसके बारे में विस्तार से जानते हैं।
क्या है शाखा-पोला?
शाखा-पोला दो कंगनों या चूड़ियों की जोड़ी है, जिसमें एक का रंग सफेद और दूसरे का रंग लाल होता है। इसमें सबसे दिलचस्प बात कि इसमें शाखा को शंख के खोल से बनाया जाता है। वहीं, लाल चूड़ी यानी पोला को लाल मूंगे से बनाया जाता है। ये दोनों कंगन की जोड़ी महिलाओं के सुहाग, शादीशुदा जिंदगी और संस्कृति की बड़ी पहचान हैं।
दो रंगों के मेल का खास है मतलब
शाखा का सफेद रंग शुभता, पवित्रता और शांति का प्रतीक है, तो पोला का लाल रंग शक्ति, ऊर्जा और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। हम सभी जानते हैं कि हिन्दू धर्म में लाल रंग को सोलह शृंगार का हिस्सा माना गया है, फिर इसमें बंगाली परंपरा के हिसाब से सफेद रंग को जोड़े जाने पर यह अलग क्षेत्रीय संस्कृति की पहचान बन जाता है।
कैसे हुई शुरू हुई शाखा पोला पहने जाने की परंपरा?
सफेद और लाल कंगन के पहने जाने की परंपरा का संबंध बंगाल की कारीगरी और समुद्री व्यापार से गहराई से जुड़ा हुआ है। यहां शंख के खोल को काटकर और उसे तराशकर चूड़ियां सदियों से बनाई जा रही हैं। हालांकि, इस बारे में कोई ठोस तथ्य मौजूद नहीं हैं कि शंख और मूंगे के बने कंगन बंगाल में वैवाहिक जीवन से कैसे जुड़ गए।
हर बंगाली महिला नहीं पहनती शाखा-पोला
इस तथ्य को बहुत कम लोग जानते हैं लेकिन हर बंगाली महिला इन सफेद और लाल कंगनों को नहीं पहनती है। इसके लिए कोई खास नियम नहीं है, कई महिलाएं सिर्फ शादी-व्याह जैसे शुभ अवसरों पर इसे पहने नजर आती हैं, तो कुछ रोजाना पहनकर इस परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं। समझने वाली बात यह है बंगाली समुदाय में इससे जुड़ी रस्में और रीति-रिवाजों में फर्क देखने को मिल सकता है।
