राजघराने से निकला ठेकुआ और पुर्तगालियों के लाए आलू से बना चोखा, पढ़िए बिहारी खाने का रोचक इतिहास
बिहार के खानपान का अपना एक समृद्ध इतिहास है, जिस पर प्राचीन धर्मों, साम्राज्यों और विदेशी यात्रियों का गहरा प्रभाव पड़ा है।

बिहार के खानपान का दिलचस्प सफर (Picture Credit- AI Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। भारत के नक्शे पर बिहार सिर्फ एक राज्य नहीं, बल्कि एक ऐसा जीता-जागता इतिहास है, जहां की राजनीति के अलावा खानपान भी काफी दिलचस्प और स्वादिष्ट है।
रामायण और महाभारत काल से जुड़े इस राज्य के खानपान पर सदियों के सफर और कई साम्राज्यों, धर्मों और विदेशी यात्रियों का असर देखने को मिलता है। आइए बिहार के लजीज व्यंजनों के इस रोचक इतिहास को करीब से जानते हैं:-
खीर और शाकाहार की शुरुआत
छठी सदी ईसा पूर्व में जैन और बौद्ध धर्म के विस्तार ने बिहार की थाली की सूरत बदल दी। जैन धर्म के संदेश ने शाकाहार को बढ़ावा दिया। बौद्ध भिक्षुओं ने भिक्षा में मिले अनाजों और मसालों से अपना एक अलग 'बौद्ध भोजन' गढ़ा। क्या आप जानते हैं कि पूरे देश में खुशी के मौके पर बनने वाली 'खीर' का तार भी बिहार से जुड़ा है? माना जाता है कि लंबे उपवास के बाद खीर खाकर ही गौतम बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी।
लिट्टी-चोखा का नया अवतार
बिहारी खाने का नाम आते ही सबसे पहले 'लिट्टी-चोखा' जहन में आता है। सिन्धु घाटी सभ्यता में भी आग पर सेंके गए आटे के गोल पेड़ों का जिक्र मिलता है, जो शायद लिट्टी का ही प्राचीन रूप थे। लेकिन मजेदार बात यह है कि चोखे की जान यानी 'आलू', 16वीं सदी में पुर्तगाली अपने साथ भारत लाए थे। उससे पहले चोखा कचालू या अरबी से बनता था। इसी तरह बिहार में चाव से खाया जाने वाला 'लाल साग' भी मूल रूप से एक दक्षिण अफ्रीकी पौधा है।
सत्तू, मखाना और दही-चूड़ा
बिहार की चिलचिलाती गर्मी में 'सत्तू' किसी संजीवनी से कम नहीं। जौ और चने से बनने वाले सत्तू का इतिहास सिन्धु घाटी सभ्यता जितना ही पुराना है। यजुर्वेद काल से खाए जा रहे मखाने हों या फिर लौकी का दही वाला रायता, ये सभी चीजें तपती लू में शरीर को अंदर से ठंडा रखने का अचूक नुस्खा हैं। मिथिलांचल में गर्मी को मात देने के लिए 'दही-चूड़ा' आज भी सबसे ज्यादा मशहूर है।
बिहार में खानपान में नवाबी छाप
बिहार के खाने पर इस्लामी स्वाद का भी गहरा असर है। 13वीं सदी के आसपास चंपारण के इलाकों में 'ताश' (फारसी में अर्थ- चपटा) नाम की एक गोश्त की डिश मशहूर हुई, जिसे घी में पकाया जाता था। बाद में शेरशाह सूरी के दौर में मशहूर 'बिहारी कबाब' का जन्म हुआ। इसके अलावा बादाम और जाफरान से बना अनोखा 'अंडे का हलवा' भी इसी असर का एक शानदार उदाहरण है।
हथवा राजघराने से निकला 'ठेकुआ'
बिहार का सबसे मशहूर मीठा व्यंजन 'ठेकुआ' दरअसल हथवा राजघराने की देन है। इसे गेहूं, गुड़, घी और मेवे के मिश्रण को लकड़ी के सांचे पर 'ठोककर' (दबाकर) बनाया जाता है, इसलिए इसका नाम 'ठेकुआ' पड़ गया। आज यह डिश बिहार के हर घर और हर त्योहार की शान बन चुकी है।
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