बिरयानी भारतीय नहीं तो फिर भारत कैसे पहुंची? पढ़ें फारस से लेकर आपके प्लेट तक का दिलचस्प सफर
बिरयानी, जिसे लाखों लोग पसंद करते हैं, वास्तव में भारतीय नहीं बल्कि फारसी मूल की डिश है।
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बहुत दिलचस्प है भारत में बिरयानी आने की कहानी (AI Generated Image)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। बिरयानी सिर्फ एक डिश नहीं है, बल्कि हजारों-लाखों लोगों की इमोशन है। भारत हर कोने में आपको बिरयानी खाने को मिल जाएगी। देश के अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग तरीके से बिरयानी बनाई जाती है, जिसका स्वाद सभी को खूब पसंद आता है।
आज लगभग हर शहर और राज्य में बिरयानी मिलती है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि बिरयानी भारतीय डिश नहीं है? जी हां, बिरयानी का इतिहास फारस से जुड़ा है। ऐसे में सवाल आता है कि बिरयानी फिर भारत कैसे पहुंची? दरअसल, इसके पीछे कई तरह की कहानियां सुनने को मिलती हैं, जिनके बारे में वर्ल्ड बिरयानी डे के मौके पर हम आपको बताएंगे।
कैसे मिला बिरयानी नाम?
बिरयानी नाम मिलने के पीछे की कहानी काफी दिलचस्प है। माना जाता है कि बिरयानी शब्द फारसी भाषा के शब्द बिरियां से आया है। बिरियां का मतलब होता है पकाने से पहले तलना। कुछ लोग बिरयानी शब्द को बरिंज से भी जोड़ते हैं, जिसका मतलब होता है चावल। पारंपरिक रूप से चावल को पहले घी में भुना जाता था और फिर गोश्त के साथ धीमी आंच पर दम देकर पकाया जाता था। इसलिए इस पकवान का नाम बिरयानी पड़ा।
भारत कैसे पहुंची बिरयानी?
तैमूर का आक्रमण
भारत में बिरयानी पहुंचने की एक कहानी को मध्य एशियाई आक्रांता तैमूर लंग से जोड़कर देखा जाता है। कहा जाता है कि बिरयानी को 14वीं शताब्दी में तैमूर अपने साथ भारत लाया था। सेना के लिए यह अच्छा और आसान भोजन था। एक बड़े बर्तन में चावल, मसाले और मांस को एक साथ धीमी आंच पर पकने के लिए रख दिया जाता था। यहीं से बिरयानी भारत पहुंची।
मुमताज महल और मुगलिया सल्तनत की कहानी
ये कहानी मुगल सम्राट शाहजहां की बेगम मुमताज महल से जोड़कर बताई जाती है। कहा जाता है कि एक बार मुमताज महल मुगलों के सैन्य शिविर का दौरा करने गईं। वहां उन्हें सैनिक काफी कमजोर लगे। सैनिकों की सेहत को देखते हुए उन्होंने बावर्ची को एक ऐसा पकवान तैयार करने कहा, जिसमें चावल और मांस मिला हो, ताकि सैनिकों को पोषण मिले। बावर्ची ने घी, चावल, मांस और मसालों को मिलाकर एक पकवान तैयार की और इसे दम देकर पकाया। यही डिश आगे चलकर बिरयानी कहलाई।
दक्षिण भारत के व्यापारी
कुछ लोगों का यह भी मानना है कि बिरयानी उत्तर भारत से पहले दक्षिण भारत आ चुकी थी। अरब व्यापारियों के साथ यह पकवान मलाबार तट पहुंचा और धीरे-धीरे देश के दूसरे हिस्सों तक पहुंचा।
भारत में बियानी के अलग-अलग रूप
भारत के अलग-अलग हिस्सों में पहुंचकर बिरयानी का स्वाद बदलता गया। अवध के नवाबों के समय बिरयानी में केवड़ा, गुलाब जल और खड़े मसालों का इस्तेमाल शुरू हुआ। वहीं हैदराबाद में स्थानीय मसालों को मिलाकर तीखी और चटपटी हैदराबादी बिरयानी बनाई।
नवाब वाजिद अली शाह को जब कोलकाता से निर्वासित किया गया, तो पैसों की तंगी में बिरयानी में आलू डालना शुरू किया, जो आज कोलकाता बिरयानी की पहचान है। इसी तरह देश के अलग-अलग हिस्सों में बिरयानी के स्वाद में बदलाव आते गए और आज हमारे पास कई तरह की बिरयानी मौजूद है।
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