कैसे लाइफस्टाइल में बदलाव करके डिमेंशिया के आधे मामलों को रोका जा सकता है, क्या कहती है नई रिसर्च?
आठ देशों के शोध विश्लेषण से पता चला है कि जीवनशैली में बदलाव कर डिमेंशिया के लगभग आधे मामलों को रोका जा सकता है। ...और पढ़ें

डिमेंशिया का खतरा कैसे हो सकता है कम? (Picture Courtesy: Freepik)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
प्रेट्र, नई दिल्ली। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में सेहत से जुड़ी कई चुनौतियां हमारे सामने आ रही हैं, जिनमें से एक बड़ी समस्या डिमेंशिया भी है। हाल ही में ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और चीन समेत आठ देशों में डिमेंशिया से जुड़े पब्लिक हेल्थ कैंपेन का एक नया विश्लेषण किया गया है।
इस शोध से यह बेहद चौंकाने वाली वाली बात सामने आई है कि अगर हम अपनी कुछ आदतों और व्यवहार में बदलाव कर लें, तो डिमेंशिया के लगभग आधे मामलों को होने से रोका जा सकता है। आइए जानें इस बारे में।
इन रिस्क फैक्टर्स को बदलकर कम करें जोखिम
रिसर्च के अनुसार, डिमेंशिया के कई ऐसे रिस्क फैक्टर्स हैं, जिन्हें आसानी से बदला जा सकता है। अक्सर लोग इन बातों पर ध्यान नहीं देते, लेकिन ये हमारी मेंटल हेल्थ पर गहरा असर डालते हैं। एक्सरसाइज न करना या फिजिकल एक्टिविटी की कमी, सिगरेट या तंबाकू का इस्तेमाल, खान-पान में लापरवाही के कारण बढ़ता कोलेस्ट्रॉल, मेंटल स्ट्रेस और डिप्रेशन डिमेंशिया के खतरे को बढ़ा सकते हैं। इसलिए अगर इन आदतों में सुधार किया जाए, तो इस न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारी के खतरे को काफी हद तक टाला जा सकता है।
क्यों जागरूकता अभियान नहीं हो रहे सफल?
शोधकर्ताओं का मानना है कि डिमेंशिया को लेकर बड़े पैमाने पर चलाए जाने वाले सार्वजनिक स्वास्थ्य जागरूकता अभियान बहुत से लोगों तक तो पहुंच जाते हैं, लेकिन ये लोगों के व्यवहार में बदलाव लाने में नाकाम साबित हो रहे हैं। इन अभियानों से लोगों की जानकारी में बहुत कम सुधार होता है और वे अपनी आदतों को नहीं बदलते।
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व्यक्तिगत और सामुदायिक कोशिश है जरूरी
ऑस्ट्रेलिया की कर्टिन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं के मुताबिक, लोगों के व्यवहार में असली बदलाव लाने के लिए अब नए तरीकों की जरूरत है। इसके लिए ऐसे कदम उठाने होंगे जो लोगों को पर्सनल और सोशल लेवल पर जोड़ सकें।
स्टडी में पाया गया कि जब लोगों को शिक्षा और बातचीत पर आधारित उपायों से जोड़ा गया, तो उनके व्यवहार में लगातार सुधार देखा गया। अपने रिस्क फैक्टर्स को पहचानना, ऑनलाइन कोर्स और ई- लर्निंग प्रोग्राम की मदद, कम्युनिटी बेस्ड तरीको को अपनाने जैसे उपाय काफी कारगर साबित हो सकते हैं।
भविष्य के लिए बड़ी चेतावनी
यह शोध इसलिए भी अहम है, क्योंकि डिमेंशिया में दुनिया भर के करीब 5.7 करोड़ लोगों को प्रभावित कर रहा है। अनुमान लगाया गया है कि साल 2050 तक यह संख्या बढ़कर तीन गुना हो जाएगी।