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    कहीं आपका आयरन इनटेक दिमाग को वक्त से पहले बूढ़ा तो नहीं कर रहा? अल्जाइमर से जुड़ी रिसर्च में खुलासा

    Updated: Sat, 27 Jun 2026 08:01 AM (IST)

    शोधकर्ताओं ने पाया है कि दिमाग में अतिरिक्त आयरन न्यूरॉन्स की सुरक्षा कम करता है, जिससे वे तनाव के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते हैं। इसे 'क्रोनोफेरोप् ...और पढ़ें

    ब्रेन सेल्स को कैसे कमजोर करता है एक्स्ट्रा आयरन? (Picture Courtesy: Freepik)

    ब्रेन सेल्स को कैसे कमजोर करता है एक्स्ट्रा आयरन? (Picture Courtesy: Freepik)

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    प्रेट्र, नई दिल्ली। शोधकर्ताओं ने पाया है कि दिमाग के न्यूरान में ज्यादा आयरन दिमाग के सेल्स की रक्षा को कम कर सकता है, जिससे तनाव व अन्य सेलुलर नुकसान के प्रति संवेदनशीलता बढ़ जाती है। इसे उन्होंने 'क्रोनोफेरोप्टोसिस' नाम दिया है। 

    एक्स्ट्रा आयरन सेल्स की रक्षा करने वाले एंटीआक्सीडेंट प्रोटीन को खत्म कर देता है, जिससे दिमाग के सेल्स बाहरी तनावों के प्रति संवेदनशील व कमजोर हो जाती हैं। सेल डेथ डिस्कवरी नामक पत्रिका में प्रकाशित निष्कर्षों से पता चलता है कि दिमाग की सेल्स में आयरन का संचय न्यूरोडीजेनेरेशन रोगों की भविष्यवाणी, रोकथाम और उपचार के प्रयासों में महत्वपूर्ण लक्ष्य हो सकता है। शोधकर्ताओं ने यह जानकारी दी।

    न्यूरान तनाव के प्रति अधिक संवेदनशील 

    अमेरिका के साल्क इंस्टीट्यूट फार बायोलाजिकल स्टडीज में शोध प्रोफेसर पाम माहेर ने कहा, "अल्जाइमर रोग और अन्य न्यूरोडीजेनेरेशन विकारों के संदर्भ में लचीलापन एक महत्वपूर्ण चर्चा का विषय बन गया है, जिसका उद्देश्य दिमाग को उन तनावों का सामना करने में अधिक लचीला बनाना है, जो न्यूरोडीजेनेरेशन में योगदान करते हैं। 

    महेर ने कहा कि अध्ययन दर्शाता है कि जब आयरन एक निश्चित स्तर पर पहुंचता है, तो सेल्स लचीलापन खो देती हैं, जिससे न्यूरान्स तनाव के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते हैं जो उन्हें नुकसान पहुंचाते हैं।

    आयरन का संचय न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों से संबंधित 

    शोधकर्ताओं ने कहा कि पिछले अध्ययनों में पाया गया है कि आयरन धीरे-धीरे न्यूरान्स के अंदर जमा हो सकता है। जबकि जीवन के प्रारंभिक चरण में आयरन का संचय न्यूरॉन के काम पर कम प्रभाव डालता है, लेकिन जीवन के बाद के चरण में यह धीरे-धीरे न्यूरोनल की मृत्यु में योगदान कर सकता है। टीम ने यह पता लगाने के लिए न्यूरॉन्स का अध्ययन किया कि क्या और कैसे यह आयरन का संचय न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों से संबंधित है। 

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    लंबे समय तक आयरन की अधिकता फेरोप्टोटिक स्ट्रेस की स्थिति पैदा करती है, जिसमें नर्व सेल्स जीवित तो रहती हैं, लेकिन ऑक्सीडेटिव चोट के प्रति संवेदनशील हो जाती हैं। आयरन हरे पत्तेदार साग, स्टार्च वाले अनाज, लीन मीट, समुद्री भोजन और दूसरी खाने की चीजों में पाया जाता है ।

    न्यूरान्स पर तनाव डालने लगता है आयरन का जमाव

    हालांकि, लंबे समय तक संपर्क में रहने वाले न्यूरॉन्स में कुछ प्रक्रियाओं का बढ़ना और कुछ का कम होना देखा गया। इसमें हानिकारक केमिकल का जमा होना, फायदेमंद केमिकल का कम होना और लिपिड पेरोक्सीडेशन का बढ़ना शामिल था। 

    जब हर ग्रुप को और ज्यादा तनाव का सामना करना पड़ा, तो कम समय तक संपर्क में रहने वाले न्यूरान्स तनाव झेल पाए, जबकि लंबे समय तक संपर्क में रहने वाले न्यूरान्स ऐसा नहीं कर पाए। माहेर की लैब में लेखक नवाब जान डार ने कहा, इन सेल्स का भविष्य आयरन की मात्रा से तय नहीं होता, बल्कि इस बात से तय होता है। कि वे कितने समय तक तनाव में रहती हैं।" 

    शोधकार्ताओं ने कहा कि ऐसे उपाय विकसित किए जा सकते हैं जिनसे उस स्थिति में मदद मिल सके, जब दिमाग कमजोर होने लगता है यानी जब आयरन का जमाव न्यूरॉन्स पर तनाव डालने लगता है। इससे आयरन के असंतुलन को ठीक किया जा सकेगा और न्यूरॉन्स को लंबे समय तक मजबूत बनाए रखा जा सकेगा।