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    साइलेंट चोर ‘ग्लूकोमा’ से रहें सावधान! आंखों में दिखें ये संकेत, तो तुरंत करवाएं जांच

    Updated: Tue, 10 Mar 2026 06:10 PM (GMT+05:30)

    काला मोतियाबिंद या ग्लूकोमा दबे पैर आकर आंखों की रोशनी तक छीन लेने वाली बीमारी है। ...और पढ़ें

    ग्लूकोमा की वक्त रहते पहचान है जरूरी (Picture Courtesy: Freepik)

    ग्लूकोमा की वक्त रहते पहचान है जरूरी (Picture Courtesy: Freepik)

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    जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

    संक्षेप में पढ़ें

    लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। ‘ग्लूकोमा’ आम ‘मोतियाबिंद या कैटारेक्ट’ नहीं है। इसमें केवल आंखों की रोशनी धुंधली नहीं पड़ती बल्कि पूरी दृष्टि चली जाती है।

    अगर समय पर इसकी पहचान हो जाए तो इसे रोक पाना संभव है वरना व्यक्ति अंधेपन का शिकार तक हो सकता है। आइए जानें इस बारे में डॉ. मोहिता शर्मा (वरिष्ठ नेत्र सर्जन एवं चेयरपर्सन, तिरुपति आई सेंटर, नोएडा) से।

    कैसे होता है ग्लूकोमा?

    आंखों में एक तरफ से पानी भरता है और दूसरी ओर से निकलता है, जब यह प्रक्रिया बाधित होकर आई एंगल ब्लाक करने लगती है तब ग्लूकोमा की शुरुआत होती है। दरअसल, आंखों के अंदर मौजूद 'एक्वियस ह्यूमर' नामक तरल पदार्थ बाहर न निकलकर अंदर ही जमा होने लगता है। जिससे आंखों के पीछे की आप्टिक नर्व पर दबाव बढ़ता है और दृष्टि कम होने लगती है। इसके अलावा उम्र बढ़ना, रक्तचाप, मधुमेह, आनुवंशिकता या आंखों में लगी चोट को ग्लूकोमा होने के कारण बताए जाते हैं।

    लक्षण

    शुरुआत में ग्लूकोमा के लक्षण विशेष रूप से दिखते नहीं हैं। कई लोगों को सिरदर्द, आंखों के सामने इंद्रधनुष जैसे रंग बनना या उल्टियां होने जैसी परेशानियां होती हैं, लेकिन अधिकांश मामलों में तो इस बीमारी में आंखों में दर्द तक नहीं होता। जब आंखों की साइड की नजर कमजोर होने लगती है तब जाकर ग्लूकोमा के लक्षण सामने आते हैं और फिर धीरे-धीरे केंद्र की रोशनी भी जाने लगती है।

    Glaucoma Symptoms (1)

    (AI Generated Image)

    क्या है ऑप्टिक नर्व?

    आंख के पिछले हिस्से में दस लाख से अधिक तंत्रिका तंतुओं का एक समूह है, जो रेटिना द्वारा देखी गई छवियों को विद्युत संकेतों के रूप में मस्तिष्क तक पहुंचाने का काम करता है। यह नर्व आंख और मस्तिष्क के बीच एक महत्वपूर्ण कनेक्ट के रूप में काम करती है।

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    ग्लूकोमा के प्रकार

    ग्लूकोमा भी दो तरह के होते हैं। पहला, ओपन-एंगल ग्लूकोमा, जो भारत में अधिकांश लोगों को होता है, इसमें व्यक्ति की दृष्टि धीरे-धीरे जाती है, लेकिन दूसरा, एंगल-क्लोजर ग्लूकोमा जिसमें बीमारी का पता चलते ही दृष्टि एक से दो दिन के अंदर ही चली जाती है।

    क्या है इलाज?

    मेडिकल साइंस में ग्लूकोमा का इलाज संभव है। पहले नसों के दबाव की जांच होती है और ग्लूकोमा का पता लगाया जाता है। आंखों की हालत देखकर डाक्टर आई ड्राप देते हैं, जिसे सारी जिंदगी लेना होता है। कई बार लोग लापरवाही के चलते इसे बीच में ही छोड़ देते हैं और ग्लूकोमा वापस आ जाता है।

    किन विटामिन्स का रखें खयाल?

    आंखों की रोशनी ठीक रखने के लिए विटामिन ए, सी और ई से भरपूर खाद्य पदार्थ लेने की सलाह दी जाती है। इसके साथ ही एंटी-आक्सीडेंट्स युक्त हरी पत्तेदार सब्जियां, फल और ओमेगा थ्री फैटी एसिड भी लेना चाहिए।

    ये हैं जरूरी बातें

    • अगर आंख का आपरेशन पहले से हुआ है, तो ग्लूकोमा होने की संभावनाएं अधिक होती हैं।
    • एक बार आई ड्राप शुरू होने पर सारी उम्र उसे लेना अनिवार्य होता है।
    • जरूरत पड़ने पर ग्लूकोमा की सर्जरी भी होती है।

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