80% मानसिक रोगियों को नहीं मिल रहा समय पर इलाज, विशेषज्ञों ने जताई गहरी चिंता
भारतीय मनोचिकित्सा समाज (IPS) ने देश में मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति पर गहरी चिंता जताई है। मानसिक सेहत को लेकर ...और पढ़ें

देश में मानसिक स्वास्थ्य इलाज के बड़े 'गैप' से बढ़ रहा है खतरा (Image Source: Freepik)
HighLights
80% मानसिक रोगियों को समय पर नहीं मिलता इलाज
इसमें सामाजिक कलंक और भेदभाव प्रमुख बाधाएं बनी
वैश्विक स्तर पर भी 70% मरीजों को डॉक्टर नहीं मिल पाते
प्रेट्र, नई दिल्ली। भारतीय मनोचिकित्सा समाज (आइपीएस) ने देश में मानसिक स्वास्थ्य उपचार के लगातार इलाज में लगातार बड़े गैप पर गहरी चिंता जताई है। कहा कि मानसिक बीमारियों से पीड़ित लगभग 80-85 प्रतिशत लोगों को समय पर या सही इलाज नहीं मिल पाता है। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि उपचार में प्रगति और बढ़ती जागरूकता के बावजूद मानसिक बीमारी से पीड़ित अधिकांश लोग औपचारिक स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली से बाहर बने रहते हैं।

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मानसिक विकारों से जूझते 85% लोग मदद से दूर
राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएमएचएस) के आंकड़ों से पता चलता है कि भारत दुनिया में सबसे व्यापक उपचार अंतराल का सामना कर रहा है, जहां 85 प्रतिशत से अधिक लोग सामान्य मानसिक विकारों से पीड़ित हैं, लेकिन उपचार की मांग नहीं करते या प्राप्त नहीं करते। वैश्विक संदर्भ में 70 प्रतिशत से अधिक मानसिक बीमारी से पीड़ित व्यक्तियों को प्रशिक्षित स्वास्थ्य पेशेवरों से देखभाल नहीं मिलती और कई निम्न आय वाले देशों में 10 प्रतिशत से भी कम जरूरतमंद लोग आवश्यक उपचार प्राप्त करते हैं।
हालांकि, हाल के पहलों जैसे कि टेली मानस राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य हेल्पलाइन, जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम का विस्तार और मानसिक स्वास्थ्य पर बढ़ती नीति ध्यान सकारात्मक कदम हैं। आइपीएस के विशेषज्ञों ने जोर दिया कि इन प्रयासों को बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए काफी बढ़ाया जाना चाहिए। आइपीएस ने जोर दिया कि मानसिक स्वास्थ्य को समग्र स्वास्थ्य का एक अभिन्न घटक माना जाना चाहिए, जिसे शारीरिक स्वास्थ्य के समान प्राथमिकता, निवेश और तात्कालिकता की आवश्यकता है।
तत्काल राष्ट्रीय ध्यान की आवश्यकता
भारतीय मनोचिकित्सा समाज (आइपीएस) की अध्यक्ष डॉ. सविता मल्होत्रा ने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य विकार अत्यधिक उपचार योग्य हैं, फिर भी भारत में अधिकांश मरीज चुपचाप पीड़ित रहते हैं। इलाज न मिलना गहरे नकारात्मक पूर्वाग्रह, जागरूकता की कमी और प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के अपर्याप्त एकीकरण को दर्शाता है ।
उन्होंने कहा कि यह केवल एक चिकित्सा चिंता नहीं है बल्कि यह एक सामाजिक व विकासात्मक मुद्दा है जिसे तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है। इसमें सामाजिक कलंक और भेदभाव प्रमुख बाधाएं बनी हुई हैं क्योंकि व्यक्ति परिवार, कार्यस्थल और हाशिए पर डाल दिए जाने के डर से बचते हैं। जागरूकता की कमी समस्या को और बढ़ाती है, क्योंकि कई लोग मानसिक बीमारी के प्रारंभिक लक्षणों को चिकित्सा स्थितियों के रूप में पहचानने में असफल रहते हैं, जिन्हें पेशेवर मदद की आवश्यकता होती है। भारत में मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों की कमी है।
बीमारी पुरानी होने पर बढ़ता है जोखिम
मानव व्यवहार और संबद्ध विज्ञान संस्थान (आइएचबीएएस) के पूर्व निदेशक डॉ. निमेश जी देसाई ने इलाज में देरी या उपचार न मिलने के गंभीर परिणामों पर प्रकाश डाला। जब मनोचिकित्सा देखभाल में देरी होती हैं तो बीमारी अक्सर अधिक गंभीर और पुरानी हो जाती है, जिससे दिव्यांगता, पारिवारिक तनाव, उत्पादकता की हानि, आत्महानि और आत्महत्या का जोखिम बढ़ जाता है। देसाई ने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य को शारीरिक स्वास्थ्य के समान तात्कालिकता और गंभीरता के साथ संबोधित किया जाना चाहिए । सामुदायिक सेवाओं को मजबूत करना, प्राथमिक देखभाल के डाक्टरों को प्रशिक्षित करना और संदर्भ प्रणाली में सुधार करना इस अस्वीकार्य उपचार अंतराल को पाटने के लिए आवश्यक कदम है।
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