दिखावे की खुराक या बीमारी का न्योता? भारत को 'डायबिटीज की राजधानी' बना रही है हमारी यह गलती
भाषा हो या पहनावा, विदेशी तौर-तरीके हमें हमेशा लुभाते हैं। खान-पान भी इस सूची में पीछे नहीं। हर तरह से आदर्श भारतीय खाद्य परंपरा को त्याग कर हम इतनी त ...और पढ़ें

आज ही अपनी डाइट से कर दें प्रोसेस्ड फूड बाहर (Picture Courtesy: Freepik)
HighLights
खान-पान का हमारी सेहत पर काफी असर होता है
अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड्स को डाइट का हिस्सा बनाने के कारण डायबिटीज के मामले बढ़ रहे हैं
पौष्टिक और घर पर बना खाना खाकर हम सेहत में सुधार ला सकते हैं
आरती तिवारी, नई दिल्ली। आज जब हम ‘विकास’ और ‘आधुनिकता’ की बात करते हैं, तो अक्सर हमारा ध्यान गगनचुंबी इमारतों, तेज रफ्तार जिंदगी और पश्चिमी जीवनशैली की ओर जाता है, लेकिन इस चमक-दमक के पीछे कड़वा सच छिपा है- हमारी गिरती सेहत। इसी बारे में फिट इंडिया मूवमेंट के एंबेसडर व लाइफस्टाइल एक्सपर्ट लूक कुटिन्हो बता रहे हैं।
यह खान-पान की पाश्चात्य शैली के प्रति बढ़ता आकर्षण है कि भारत मधुमेह और मोटापे की राजधानी बनता जा रहा है। तो वहीं 75 प्रतिशत से ज्यादा वयस्कों को मोटापे, 50 प्रतिशत को डायबिटीज जैसी लाइफस्टाइल से जुड़ी समस्याओं को देखते हुए अमेरिका में हेल्थ इमरजेंसी की स्थिति बताते हुए सरकार ने नई पोषण नीति लागू की है और कहा है कि सभी लोग प्रोसेस्ड फूड को त्याग दें और साबुत अनाज व प्राकृतिक भोजन की ओर रुख करें।
जबकि हम भारतीय आयुर्वेद परंपरा की अपनी जड़ों को छोड़कर पश्चिमी देशों की उस ‘अल्ट्रा-प्रोसेस्ड’ डाइट को अपना रहे हैं, जिसने उन्हें बीमार किया है। अब समय आ गया है कि हम अपनी थाली और सोच, दोनों का पुनर्मूल्यांकन करें।
खा रहे दिखावे की खुराक
अक्सर हम पैकेटबंद भोजन या विदेशी व्यंजनों को ‘स्टेटस सिंबल’ मान लेते हैं। गुड़, सत्तू और बाजरा जैसे सुपरफूड्स को हमने पिछड़ा मानकर छोड़ दिया है, लेकिन असल आधुनिकता वह नहीं है जो पैकेट में आती है, बल्कि वह है जो आपको ऊर्जा, मानसिक स्थिरता और मेटाबालिक स्वास्थ्य दे।
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पश्चिमी खान-पान का जोखिम उसकी संरचना में नहीं, बल्कि उन रसायनों में है जो डोपामाइन (खुशी का एहसास कराने वाला हार्मोन) बढ़ाने और पोषण घटाने के लिए बनाए गए हैं। अक्सर पूछा जाता है कि हम पश्चिमी खान-पान को एस्पिरेशन से क्यों जोड़ते हैं, जबकि इसके स्वास्थ्य जोखिम स्पष्ट हैं? सच तो यह है कि ‘एस्पिरेशनल ईटिंग’ का भूगोल से कम और हमारी धारणा से अधिक संबंध है।
आज पैकेट बंद भोजन को हाई स्टैंडर्ड और आधुनिक माना जाता है, जबकि हमारे पारंपरिक खाद्य पदार्थ जैसे गुड़, सत्तू, बाजरा और अन्य श्रीअन्न को ‘पिछड़ा’ या कम आय वाले वर्ग का भोजन समझकर त्याग दिया जाता है।

(Picture Courtesy: Freepik)
घर की रसोई की भूमिका
आजकल किशोरों में बढ़ता मोटापा गंभीर चिंता का विषय है। क्या इसकी मुख्य वजह प्रोसेस्ड स्नैक्स की आसान उपलब्धता है या घर पर पोषण संबंधी जागरूकता की कमी? तो जान लें कि ये दोनों वजहें एक-दूसरे की पूरक हैं। आज किशोरों में मोटापे का कारण केवल इच्छाशक्ति की कमी नहीं है, बल्कि ऐसा माहौल है जहां प्रोसेस्ड खाना खुद-ब-खुद डिलीवर होकर घर आ जाता है।
जब अल्ट्रा-प्रोसेस्ड स्नैक्स सस्ते, रंगीन और हर जगह उपलब्ध हों, तो केवल इच्छाशक्ति के दम पर उनसे बचना मुश्किल होता है, लेकिन असली समस्या तब आती है जब घर पर बच्चों को यह नहीं सिखाया जाता कि एक संतुलित थाली कैसे बनाई जाए या लेबल कैसे पढ़ा जाए।
अक्सर माता-पिता खुद इन चुनौतियों से जूझ रहे होते हैं। हमें बच्चों को केवल अनुशासन नहीं, बल्कि एक ऐसा सिस्टम देना होगा जहां वे लेबल पढ़कर वास्तविक स्वास्थ्य को समझना, असली भूख को पहचानना और उसके अनुरूप प्लेट लगाना सीखें। कम नींद, शारीरिक गतिविधि का अभाव और तनाव इस समस्या को और बढ़ा देते हैं। समाधान बच्चों को शर्मिंदा करने में नहीं, बल्कि घर के वातावरण को बदलने में है।
बदलनी होगी परिभाषा
खाद्य उद्योग ने डिब्बाबंद भोजन को सुविधाजनक बना दिया है। हमें इस परिभाषा को बदलना होगा। असली सुविधा वह है जब हम घर पर दाल-चावल भिगोकर रखते हैं या पहले से भोजन की योजना बनाते हैं। जब आप लगातार सात से 10 दिन शुद्ध भोजन करते हैं और बेहतर महसूस करने लगते हैं, तो आपको प्रेरणा की नहीं, केवल निरंतरता की आवश्यकता होती है।
खाद्य उद्योग पैकेटबंद भोजन को आकर्षक बनाता है, लेकिन हमें दीर्घायु को चुनना होगा। हम इस समस्या से डरकर नहीं, बल्कि स्वस्थ विकल्पों को सुविधाजनक बनाकर जीत सकते हैं। घर पर बुनियादी तैयारी करें ताकि भूख लगने पर आप बिस्किट के बजाय घर का बना नाश्ता खा पाएं।
समय की कमी, एकल परिवार और स्क्रीन के बढ़ते प्रभाव ने पैकेटबंद भोजन को मजबूरी बना दिया है। स्वास्थ्य जोखिम ‘पश्चिमी’ होने में नहीं है, बल्कि फूड लिटरेसी की कमी में है। अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थ पोषण के लिए नहीं, बल्कि लंबी शेल्फ-लाइफ और आपके दिमाग में डोपामाइन रिलीज करने के लिए बनाए जाते हैं। वास्तविक आधुनिकता वह है जिसमें आपके पास जीवन जीने के लिए भरपूर ऊर्जा, मानसिक स्थिरता और बेहतर मेटाबालिज्म हो।
क्या महंगा या दुर्लभ है असली भोजन?
आज हर कोई यह अवश्य कहता है कि अब वास्तविक और सेहतमंद भोजन सुलभ नहीं। वह या तो महंगा है या पहुंच से दूर। यह एक भ्रम है। असल में, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड भोजन को इस तरह डिजाइन और विज्ञापित किया जाता है कि वही हमारा ध्यान खींचे।
एक सेब को विज्ञापन की जरूरत नहीं होती, लेकिन चिप्स के पैकेट को होती है। आज डिलीवरी एप्स के दौर में पौष्टिक भोजन और जंक फूड, दोनों समान दूरी पर हैं। अंतर केवल हमारी ‘नीयत’ और ‘योजना’ का है। जब हम अपनी थकान या तनाव को भोजन से मिटाने की कोशिश करते हैं, तो हम अक्सर गलत चुनाव करते हैं।
समाधान बाजार में नहीं, हमारी खाद्य परंपराओं, आयुर्वेद और अनुशासन में है। असली सेहत पैकेट में नहीं, आपकी रसोई और दिनचर्या में छिपी है!
करने होंगे तीन बड़े बदलाव
- अगर आपकी रिपोर्ट में शुगर लेवल बढ़ा हुआ है, तो इसे जीवनभर की दवा की शुरुआत न मानें। यह आपके पास अपनी सेहत सुधारने का एक सुनहरा अवसर है।
- प्री-डायबिटीज पर काम करने को कल पर न टालें। यह संकेत है कि आपके शरीर को मरम्मत की जरूरत है।
- कम खाने के बजाय सही क्रम में खाएं। पहले प्रोटीन और फाइबर (सलाद/सब्जियां) लें, उसके बाद कार्ब्स। इससे ब्लड शुगर अचानक नहीं बढ़ता।
- भोजन के बाद 10-15 मिनट की पैदल सैर, सोने का निश्चित समय और गहरी सांस लेने का अभ्यास नियमित तौर पर करें। ये छोटी चीजें इंसुलिन संवेदनशीलता में सुधार करती हैं और मीठा खाने की क्रेविंग कम करती हैं।
असली भोजन की पहचान
एक व्यस्त पेशेवर, जो भारतीय महानगरों के शोर-शराबे में रह रहा है, के लिए ‘असली भोजन’ क्या है? असली भोजन वह है जो उन सामग्रियों से बना हो, जिन्हें आप पहचान सकें और आपका शरीर जिनसे सेहतमंद हो सके।
- लेबल पढ़ना सीखें- यदि सामग्री की सूची बहुत लंबी है या उसमें ऐसे नाम हैं, जिन्हें आप पढ़ नहीं सकते या जिनका स्रोत समझ नहीं सकते तो वह भोजन नहीं, केमिकल का डिब्बा है।
- सस्टेनेबल स्वास्थ्य का अर्थ पूर्णता नहीं, बल्कि निरंतरता है। पैकेटबंद भोजन कभी-कभार के लिए ठीक है, लेकिन इसे आधार न बनाएं। दिन की शुरुआत कम से कम एक ‘शुद्ध देसी भोजन’ से करें।