अपनों के बीच रहकर भी फोन में खोए रहते हैं आप? हफ्ते में 2 घंटे की 'ग्रीन थेरेपी' करेगी कमाल
क्या आपने कभी गौर किया है कि हम स्क्रीन टाइम के कितने बड़े गुलाम बन चुके हैं? ...और पढ़ें

क्यों स्क्रीन बंद करके टहलना है आपकी सेहत के लिए सबसे जरूरी? (Image Source: AI-Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। क्या आपने कभी गौर किया है कि हम अपनों के साथ बैठे हुए भी अक्सर फोन में खोए रहते हैं? कभी लंच के बीच बेवजह ईमेल चेक करना, तो कभी किसी दोस्त से फोन पर बात करते हुए बीच में ही किसी और को मैसेज टाइप करना- यह हममें से ज्यादातर लोगों की रोजमर्रा की आदत बन चुकी है।
एक रिसर्च के अनुसार, हम दिन भर में 200 से ज्यादा बार अपना फोन चेक करते हैं। अनजाने में ही, इन स्क्रीन्स ने हमारे हर खाली पल और कीमती समय पर पूरी तरह से अपना कब्जा जमा लिया है।

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रोजाना 8 घंटे से ज्यादा स्क्रीन पर बीत रहा वक्त
जब इंटरनेट की शुरुआत हुई थी, तब इसके निर्माताओं ने सोचा था कि यह तकनीक हमारी जिंदगी को और भी बेहतर बनाएगी। उस दौर में लोग हफ्ते में बमुश्किल एक घंटा ही ऑनलाइन बिताते थे, लेकिन 'नीलसन' की मौजूदा रिपोर्ट की सच्चाई चौंकाने वाली है- आज लोग हर दिन 8 घंटे से भी ज्यादा समय स्क्रीन को घूरते हुए बिता देते हैं। यह हमारे सोने या काम करने के कुल समय से भी ज्यादा है। हम इतिहास की शायद पहली ऐसी पीढ़ी हैं, जो खूबसूरत प्राकृतिक नजारों के बजाय अपने हाथों में मौजूद कांच की छोटी-सी स्क्रीन को ज्यादा अहमियत देती है।
हर पल रहता है अगले नोटिफिकेशन का इंतजार
हमारी इस डिजिटल लत का सीधा और खतरनाक असर हमारी मेंटल हेल्थ पर पड़ रहा है। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ के शोध बताते हैं कि बचपन में ज्यादा स्क्रीन देखने वाले बच्चों में किशोरावस्था तक आते-आते डिप्रेशन के लक्षण बढ़ने लगते हैं। वहीं, वयस्कों में भी इसकी वजह से तनाव, नींद की कमी, अकेलापन और घबराहट तेजी से बढ़ रही है।
इंटरनेट के शुरुआती दिनों की विशेषज्ञ लिंडा स्टोन हमारी आज की मानसिक स्थिति को "लगातार आधा-अधूरा ध्यान" कहती हैं। यानी हम हर वक्त डिजिटल दुनिया से जुड़े तो रहते हैं, लेकिन असल जिंदगी में कभी पूरी तरह मौजूद नहीं होते। हमारा दिमाग हर पल बस अगले नोटिफिकेशन के इंतजार में अलर्ट मोड पर रहता है और कभी आराम नहीं कर पाता।
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प्रकृति के बीच बिताए 20 मिनट करेंगे कमाल
राहत की बात यह है कि इस गंभीर समस्या का इलाज बहुत ही सरल है और इसके लिए किसी महंगी थेरेपी की जरूरत नहीं है। 'स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी' द्वारा 449 अलग-अलग स्टडीज के एक मेगा-एनालिसिस से यह साबित हुआ है कि प्रकृति के बीच महज 10 से 20 मिनट बिताने से मानसिक सेहत में जादुई सुधार होता है।
घर से बाहर निकलने पर तनाव बढ़ाने वाला कॉर्टिसोल हार्मोन कम होता है, हार्ट रेट में सुधार होता है और इंसान का मूड तुरंत बेहतर हो जाता है- और इन बदलावों को बाकायदा खून और लार की जांच में मापा जा सकता है।
'मिशिगन यूनिवर्सिटी' की एक रिसर्च तो यहां तक कहती है कि प्रकृति के बीच थोड़ी देर टहलने से हमारी याददाश्त और फोकस में 20% तक का इजाफा होता है, जो कोई भी महंगा 'प्रोडक्टिविटी ऐप' आपको नहीं दे सकता।
हफ्ते में 2 घंटे की 'ग्रीन थेरेपी' से खुद को रखें फिट
आंकड़े बताते हैं कि जो लोग हफ्ते भर में कम से कम दो घंटे प्रकृति के बीच बिताते हैं, उनकी मेंटल और फिजिकल हेल्थ ऐसा न करने वालों की तुलना में बहुत बेहतर होती है। इसके लिए आपको किसी घने जंगल या पहाड़ों पर जाने की बिल्कुल जरूरत नहीं है। आपके शहर का कोई भी आम पार्क, हरियाली वाली कोई सड़क भी आपके लिए उतनी ही असरदार काम कर सकती है।

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'वॉक' के लिए बहाने नहीं समय निकालें
सच तो यह है कि हमने अपनी प्राथमिकताओं को बिल्कुल उल्टा कर दिया है। हम फोन पर सोशल मीडिया स्क्रॉल करने के लिए घंटों निकाल लेते हैं, लेकिन बाहर टहलने के लिए हम कहते हैं कि हमारे पास समय ही नहीं है। यह सच में एक बड़ी विडंबना है कि आज इंसान अपना मानसिक तनाव कम करने के लिए अरबों रुपये खर्च करके नए-नए मोबाइल ऐप्स बना रहा है, जबकि इसका सबसे अचूक इलाज बिल्कुल मुफ्त है।
प्रकृति की इस दवा के लिए आपको किसी ऐप, सब्सक्रिप्शन या पासवर्ड की जरूरत नहीं है। बस खुद से यह वादा कीजिए कि आप घर से बाहर बिताए जाने वाले समय को भी उतनी ही अहमियत देंगे जितनी आप अपनी ई-मेल्स को देते हैं। हिम्मत करके कुछ देर के लिए अपनी स्क्रीन बंद कीजिए, बाहर निकलिए और मोबाइल पर 'स्क्रॉल' करने की बजाय खुली हवा में टहलना शुरू कीजिए। आप खुद महसूस करेंगे कि आपका तनाव कैसे छूमंतर हो जाता है।