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    किडनी के मरीज हैं, तो हो जाएं सावधान! इस एक लापरवाही से बढ़ सकता है शिंगल्स का खतरा

    By Dr Dinesh KhullarEdited By: Harshita Saxena
    Updated: Thu, 30 Jul 2026 06:55 PM (IST)

    क्रोनिक किडनी डिजीज (CKD) के मरीजों में कमजोर इम्युनिटी के कारण शिंगल्स का खतरा बढ़ जाता है, जो चिकनपॉक्स वाले वायरस के फिर से सक्रिय होने से होता है। ...और पढ़ें

    किडनी के मरीजों को शिंगल्स का खतरा क्यों अधिक है (Picture Credit- AI Generated)

    किडनी के मरीजों को शिंगल्स का खतरा क्यों अधिक है (Picture Credit- AI Generated)

    HighLights

    1. CKD मरीजों में कमजोर इम्युनिटी से शिंगल्स का खतरा

    2. शिंगल्स चिकनपॉक्स वायरस के पुनः सक्रिय होने से होता है

    3. बचाव के लिए टीकाकरण किडनी मरीजों हेतु आवश्यक

    लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। हमारे शरीर में किडनी एक बेहद जरूरी अंग है, जिसकी मुख्य जिम्मेदारी शरीर की अंदरूनी सफाई करना है। यह खून से हानिकारक तत्वों को छानकर शरीर के बाहर निकालने का काम करती है। हालांकि, आजकल की बिगड़ती जीवनशैली के कारण किडनी से जुड़ी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं।

    वर्तमान में 'क्रोनिक किडनी डिजीज' (CKD) बड़ी संख्या में लोगों को अपनी चपेट में ले रहा है। इस स्वास्थ्य समस्या के साथ जीने वालों के लिए उचित देखभाल और काफी सावधानी जरूरी है। खुद को स्वस्थ रखने के लिए सही खानपान, समय पर दवाइयां और किडनी की नियमित टेस्टिंग बहुत जरूरी है। आंकड़ों की बात करें, तो भारत की करीब 13.24 फीसदी आबादी CKD की शिकार है, जिसका मतलब है कि हर आठवां भारतीय इस बीमारी का सामना कर रहा है।

    शरीर को कमजोर कर देती है किडनी की बीमारी

    किडनी हमारे खून से गंदगी को दूर करके इम्यून सिस्टम को ताकतवर बनाने में मदद करती है। क्रोनिक किडनी डिजीज (CKD) एक ऐसी मेडिकल कंडीशन है, जिसमें वक्त के साथ किडनी डैमेज होने लगती है और उसकी काम करने की क्षमता कम होने लगती है। इस गंभीर बीमारी के पीछे सबसे बड़ी वजह हाई ब्लड प्रेशर और डायबिटीज मानी जाती है। CKD होने पर किडनी सही तरीके से काम नहीं कर पाती, जिससे शरीर की इम्युनिटी कमजोर हो जाती है और मरीज को अन्य इन्फेक्शन आसानी से अपना शिकार बना लेते हैं।

    किडनी मरीजों को रहता है 'शिंगल्स' का डर

    कमजोर इम्युनिटी के कारण होने वाले इन्फेक्शन में 'शिंगल्स' प्रमुख है, जिसे हर्पीज जोस्टर वायरस (HZV) के नाम से भी जाना जाता है। असल में यह वैरीसेला-जोस्टर वायरस (VZV) के फिर से एक्टिव होने के कारण फैलता है। यह वही वायरस है, जिससे चिकनपॉक्स होता है। एक बार चिकनपॉक्स होने के बाद यह वायरस शरीर के अंदर चुपचाप मौजूद रहता है। जब CKD के मरीजों में किडनी का फंक्शन डाउन होता है, तो यूरिमिया के चलते T-सेल वाली इम्युनिटी वीक हो जाती है। ऐसे में शरीर इस छिपे हुए वायरस को रोक नहीं पाता, जिससे शिंगल्स होने का रिस्क काफी ज्यादा बढ़ जाता है।

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    शिंगल्स के प्रमुख लक्षण

    शिंगल्स होने पर शरीर पर लाल चकत्ते (रैश) और काफी दर्द देने वाले छाले निकल आते हैं। कई मरीजों में ये रैश ठीक हो जाने के बाद भी लंबे समय तक दर्द महसूस होता रहता है। इस कंडीशन को मेडिकल भाषा में 'पोस्ट-हर्पेटिक न्यूराल्जिया' (PHN) कहते हैं, जो हफ्तों या महीनों तक परेशान कर सकता है।

    'शिंगल्स एक्शन वीक 2026' से जुड़े एक ग्लोबल सर्वे के अनुसार, शिंगल्स का सामना करने वाले लगभग 43% भारतीयों ने असहनीय दर्द की बात कही, जिसने उनके रोजमर्रा के कामों को बुरी तरह प्रभावित किया। इसके अलावा, हर तीन में से एक मरीज ने माना कि इस भयानक दर्द के कारण वे न तो अपना काम कर सके और न ही किसी सामाजिक कार्यक्रम का हिस्सा बन पाए।

    CKD और शिंगल्स के बीच का कनेक्शन

    अगर किसी क्रोनिक किडनी डिजीज के मरीज को शिंगल्स अपनी चपेट में ले ले, तो उसकी फिजिकल एक्टिविटी और सामान्य दिनचर्या लगभग बंद हो सकती है। शिंगल्स के कारण होने वाली बेचैनी और दर्दनाक दाने नींद खराब करने के साथ-साथ स्वास्थ्य को और ज्यादा बिगाड़ देते हैं। ऐसी हालत में डॉक्टर के पास जाना, नियमित दवाइयां खाना और डाइट प्लान फॉलो करना भी एक चुनौती बन जाता है।

    एक ही समय पर इन दो गंभीर बीमारियों को झेलना मरीज और उसके परिजनों दोनों को भारी मानसिक तनाव देता है। अगर CKD अपनी आखिरी स्टेज यानी 'एंड-स्टेज रीनल डिजीज' (ESRD) पर पहुंच जाए, तो शरीर का इम्यून सिस्टम एकदम टूट जाता है। यही कारण है कि इलाज के साथ-साथ वैक्सीनेशन जैसे कदम उठाना बेहद अहम है।

    क्यों आवश्यक है सही बचाव?

    किडनी (CKD) के मरीजों को ऐसे इन्फेक्शन्स से सुरक्षित रखना भी उनकी ट्रीटमेंट प्रक्रिया का एक जरूरी हिस्सा है, जिनसे आसानी से बचा जा सकता है। शिंगल्स जैसी बीमारियों से बचने के लिए वैक्सीनेशन एक बेहतरीन उपाय है। यह टीका संक्रमण और इससे पैदा होने वाली अन्य जटिलताओं के खतरे को काफी हद तक कम कर देता है, जिससे मरीज को लंबे समय तक एक स्वस्थ और सुरक्षित जीवन जीने में मदद मिलती है।

    (डॉ. दिनेश खुल्लर, मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, साकेत, नई दिल्ली में नेफ्रोलॉजी और रीनल ट्रांसप्लांट मेडिसिन के ग्रुप चेयरमैन हैं।)

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