फ्लैशबैक 90s: वीसीआर से लेकर पेजर तक, 90 के दशक की वो चीजें जो अब यादों का हिस्सा बन चुकी हैं
वक्त के साथ तकनीक में विकास हुआ और पुराने जमाने की चीजें धीरे-धीरे गायब होती गईं। पहले के टेलीफोन को ...और पढ़ें

90 के दशक की याद दिला देंगी ये चीजें (Picture Courtesy: AI Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। अगर आप 90 के दशक में बनी कोई फिल्म देखेंगे, तो हो सकता है आपको लगे आप किसी दूसरी दुनिया में पहुंच गए हैं। लेकिन पिछले कुछ दशकों में हुए तकनीकी विकास और बदलावों ने सचमुच ही हमारी दुनिया को बदलकर रख दिया है।
आज के स्मार्टफोन और हाई-स्पीड इंटरनेट वाले दौर में, 90 के दशक की कई चीजें अब एंटीक हो चुकी हैं, जो या तो इतिहास के पन्नों में खो चुकी हैं या बहुत मुश्किल से कहीं देखने को मिलती हैं। आइए आज ऐसी ही कुछ चीजों के बारे में जानते हैं, जो 90 के दशक में आम हुआ करती थीं, लेकिन अब गायब हो चुकी हैं।
कैसेट प्लेयर और टेप रिकॉर्डर
आज स्पॉटिफाई और यूट्यूब का जमाना है, लेकिन 90 के दशक में संगीत सुनने का मतलब था ऑडियो कैसेट। इन्हें रिवर्स करने के लिए पेन या पेंसिल की मदद से फिर से घुमाकर ठीक करना एक अलग ही हुनर था। लेकिन अब ये गायब हो चुकी हैं।
वीसीआर और वीडियो लाइब्रेरी
सिनेमा घरों के अलावा फिल्में देखने का इकलौता जरिया वीसीआर था। शनिवार या रविवार को मोहल्ले की वीडियो लाइब्रेरी से किराए पर फिल्में लाना और पूरे परिवार के साथ बैठकर टीवी के सामने फिल्मी दुनिया' में खो जाना, आज के ओटीटी से कहीं ज्यादा रोमांचक था।
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(Picture Courtesy: AI Generated)
लैंडलाइन फोन और डायरेक्टरी
आज मोबाइल हमारी जेब में है, लेकिन तब घर के एक कोने में रखे लैंडलाइन फोन का अपना रूतबा था। एसटीडी और आईएसडी कॉल करने के लिए पीसीओ के बाहर लाइन लगाना और फोन कॉल आने पर पूरे घर का भागकर फोन उठाना अब बीते दौर की बात है।
कैमरा और रील
आज हम एक क्लिक में हजारों फोटो खींचते हैं, लेकिन 90 के दशक में एक रील में सिर्फ कुछ ही फोटो आते थे। फोटो खींचने के बाद उसे डिवेलप कराने का हफ्तों इंतजार करना और फोटो खराब न हो जाए, इस डर से हर क्लिक को बेहद कीमती समझना अब मुमकिन नहीं।
कॉमिक्स और चंपक
नागराज, सुपर कमांडो ध्रुव, चाचा चौधरी और चंपक, ये 90 के दशक के बच्चों के असली सुपरहीरो थे। गर्मियों की छुट्टियों में दोपहर के वक्त छत पर या कूलर के सामने बैठकर कॉमिक्स पढ़ना आज के किंडल और ई-बुक्स से कहीं ज्यादा सुकूनदायक था।
पेजर
मोबाइल आने से ठीक पहले पेजर का दौर आया था। यह एक छोटा सा डिवाइस था जिस पर केवल छोटे मैसेज मिल सकते थे। यह उस समय के टेक-सैवी लोगों की पहली पसंद हुआ करता था। मशहूर टीवी शो फ्रेंड्स में आपको पेजर देखने को मिल जाएगा।
कागज के बोर्ड गेम्स और कंचे
आज के बच्चे पबजी और प्लेस्टेशन में व्यस्त हैं, लेकिन 90 के दशक की शामें गलियों में कंचे, लट्टू, गिल्ली-डंडा या घर के अंदर बिजनेस और लूडो जैसे खेलों से गुलजार रहती थीं।
एंटीना वाला टीवी
छत पर जाकर टीवी का एंटीना घुमाना और नीचे से चिल्लाना "आया? आया?", यह हर भारतीय घर की कहानी थी। संडे की सुबह शक्तिमान या रामायण देखने के लिए सड़कों पर सन्नाटा छा जाना उस दौर की सादगी को बयां करता है।
फाउंटेन पेन और दवात
स्कूल के दिनों में निब वाले पेन से लिखना और गलती से स्याही फैल जाने पर पूरे हाथ और कॉपी का नीला हो जाना हर 90s किड को याद होगा। अब बॉल पेन और जेल पेन ने स्याही और दवात की जगह ले ली है।
पोस्टकार्ड
नीले और पीले रंग के ये कागज अपनों से जुड़ने का एकमात्र जरिया थे। डाकिया का इंतजार और चिट्ठी में छुपी अपनों की लिखावट का वो अहसास आज के इमोजी और व्हाट्सएप मैसेज में कहीं खो गया है।
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