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‘सिंहोरा’ के बिना अधूरी हैं बिहारी शादियां, खरीदते वक्त दूल्हा भी इसे नहीं छू सकता! बनाने का तरीका भी है खास

Published: Fri, 04 Sep 2026 11:00 AM (IST)

सिंघोरा बिहार की शादियों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसके बिना विवाह अधूरा माना जाता है।

बिहार की शादियों में सिंहोरा का महत्व (Picture Courtesy: Instagram/AI Generated Image)

बिहार की शादियों में सिंहोरा का महत्व (Picture Courtesy: Instagram/AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। बिहार की शादियों की बात करें, तो सिंहोरा का जिक्र करना बहुत जरूरी है। ये इतना जरूरी है कि इसके बिना बिहार की शादियां अधूरी हैं। अब आप सोच रहे होंगे कि सिंहोरा होता क्या है, तो बता दें कि ये सिंदूरदान होता है, जिसमें दूल्हा सिंदूर लाता है। 

सिंहोरा सिर्फ सिंदूर रखने का डिब्बा नहीं होता। बिहार की महिलाओं के लिए इसका खास महत्व होता है, जिसे सौभाग्य से जोड़कर देखा जाता है। इसलिए सिंहोरा बनाने का तरीका भी बहुत खास होता है और इससे नियम भी। आइए जानें सिंहोरा कैसे बनाया जाता है और इसका महत्व क्या है।

शादी में सिंहोरा का महत्व

बिहार में शादी के दौरान सिंदूरदान के समय दूल्हा दुल्हन की मांग में जिस डिब्बे से सिंदूर भरता है, उसे सिंहोरा कहा जाता है। सिंहोरा को सुहाग का प्रतीक माना जाता है। शादी के बाद इस पर सिर्फ दुल्हन का हक होता है और उसके सौभाग्य का प्रतीक बनकर उसके साथ रहता है। 

शादी के बाद तीज या छठ पूजा जैसे खास अवसरों और त्योहारों पर सिंदूर लगाने के लिए सिंहोरा का इस्तेमाल किया जाता है। आम दिनों में महिलाएं इससे सिंदूर नहीं लगातीं और इसे बहुत संभालकर रखा जाता है। 

सिंहोरा कैसे बनाया जाता है?

सिंहोरा बनाने की कला काफी पुरानी है और इसे लकड़ी से बनाया जाता है। पारंपरिक रूप से सिंहोरा बनाने के लिए आम की लकड़ी का इस्तेमाल किया जाता है। आम की लकड़ी को बहुत पवित्र माना जाता है। इसलिए सिंहोरा बनाने के लिए इस लकड़ी का इस्तेमाल होता है। 

पारंपरिक औजारों की मदद से कारीगर लकड़ी को गोल आकार देते हैं और इसे अंदर से खोखला किया जाता है, जिसमें सिंदूर भरा जाता है। इसका ढक्कन ऊपर से कोन के आकार होता है, जो इसकी पहचान है। इसके बाद सिंहोरा को रंगा जाता है, लेकिन इसके लिए आम रंगों का इस्तेमाल नहीं होता। 

सिंहोरा का रंग हमेशा लाल होता है और इसके लिए लाह का इस्तेमाल किया जाता है। केवड़े के पत्ते से लाह को सिंहोरा पर लगाकर इसका लाल रंग दिया जाता है। इसी लाह के कारण सिंहोरे पर चमक भी आती है। पहले के समय में सिंहोरा सिर्फ लाल रंग का होता था, इस पर कोई डिजाइन नहीं बनाया जाता था, लेकिन वक्त के साथ इसके लाल रंग पर अलग-अलग रंगों से डिजाइन भी बनाया जाने लगा। 

सिंहोरा खरीदने का तरीका

सिंहोरा कोई मामूली चीज नहीं होती। इसलिए इसे खरीदने के नियम भी काफी खास होते हैं। यह हमेशा वर पक्ष की तरफ से आता है। दुकान पर सभी सिंहोरे को सामने रख दिया जाता है। होने वाला दूल्हा इन्हें देखता है और एक सिंहोरा पसंद करता है। इस दौरान ध्यान रखना होता है कि वह किसी भी सिंहोरे को हाथ न लगाए। जिस सिंहोरे पर हाथ रख दिया जाएगा, आपको वहीं खरीदना पड़ेगा और इसी से शादी में सिंदूरदान किया जाता है। 

सिंहोरा से जुड़े नियम

सिंहोरा सुहाग और वैवाहिक जीवन से जुड़ा है। इसलिए सिंहोरा कभी भी प्लास्टिक या किसी धातु का नहीं बनाया जाता। इसे हमेशा सिर्फ आम की लकड़ी से ही बनाया जाता है। शादी के बाद एक महिला का सिंहोरा सिर्फ उसका होता है, जिसमें से किसी और को सिंदूर नहीं दिया जाता। 

साथ ही, सिंहोरा का गिरना या टूटना बहुत अशुभ माना जाता है। इसलिए इसे बहुत संभालकर रखा जाता है और हमेशा साफ-सुथरी जगह पर रखते हैं। जब तक पति जीवित रहता है, तब तक हर तीज-त्योहार पर महिला इसी सिंहोरा से सिंदूर लगती है और पति की मृत्यु के बाद सिंहोरा भी पति के साथ चला जाता है।