फिल्मी भोजपुरी गानों से बिल्कुल अलग है ‘बिरहा’ लोकगीत, देहाती बोली में बयां होता है पति-पत्नी की जुदाई का दर्द
बिहार के लोकगीतों में बिरहा भी शामिल है, जो पति-पत्नी के विरह की तकलीफ को बयां करता है।

बिहार की लोक संस्कृति का हिस्सा है बिरहा (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। बिहार की असली संस्कृति भोजपुरी गानों में नहीं, बल्कि वहां के लोकगीतों में झलकती है। इन्हीं लोकगीतों में बिरहा भी शामिल है। ये बहुत ही खूबसूरत लोकगीत हैं, जिनमें विरह की तड़प और दर्द को बयां किया जाता है।
काम के लिए शहर गए पति और पीछे रह गई पत्नी के बिछोह के दर्द को जाहिर करने के लिए बिरहा गाया जाता है। इन गीतों को बोल प्यार और दर्द से भरे होते हैं, जिसे सुनकर किसी का भी दिल पिघल जाएगा। आइए जानें कैसे हुई बिरहा गाने की शुरुआत और इसकी खासियत क्या है।
क्या है बिरहा का इतिहास?
बिरहा शब्द संस्कृत के शब्द विरह से बना है, जिसका मतलब होता है किसी अपने से दूर होना। आमतौर पर यह बिहार और पूर्वांचल में गाया जाता है और वहां की संस्कृति का अहम हिस्सा है। बिरहा की शुरुआत 19वीं सदी में मानी जाती है। उस समय गांव के पुरुषों ने कमाने के लिए शहर जाना शुरू कर दिया था।
रोजगार की तलाश में परदेस गए पुरुषों की पत्नियां घर पर रह जाती थीं, जिन्हें इस वियोग को सहना पड़ता। पति भी परदेस में अपनी पत्नी और घरवालों से दूरी की तकलीफ सहता।
विरह की इसी पीड़ा को बयां करने के लिए गीत गाना शुरू किया गया और बिरहा लोकगीतों का जन्म हुआ। इन गीतों में पति या पत्नी अपनी विरह की पीड़ा को बयां करते हैं। तब से बिरहा गाने का चलन शुरू हुआ, जो आज भी गांवों में देखने को मिलता है।
कैसे गाया जाता है बिरहा?
बिरहा आमतौर पर पुरुष गाते हैं, जिसे बहुत ऊंचे स्वर में गाया जाता है। इसलिए बिरहा गायन हमेशा खुली जगहों पर, जैसे गांव के चौपाल आदि पर किया जाता है। मुख्य गायक ऊंची आवाज में बिरहा गीत की शुरुआत करता है और दूसरे गायक उसका साथ देते हैं। ढोलक और करताल जैसे वाद्य यंत्रों की धुन पर ये गीत गाए जाते हैं।
क्यों गाया जाता है बिरहा?
रोजगार की तलाश में गांव के कई पुरुष परदेस जाते थे और उनकी नई नवेली दुल्हन पीछे घर पर रह जाती। ऐसे में पति-पत्नी के बीच जन्मे विरह के दर्द को बिरहा लोकगीत जाहिर करते हैं। इन गीतों में पति-पत्नी के अकेलेपन को दिखाया जाता है कि अपने साथी के बिना वो कितने अकेले हैं।
समय के साथ बिरहा सिर्फ वियोग तक सीमित नहीं रहा। मनोरंजन के लिए और राधा-कृष्ण की पौराणिक कथाएं सुनाने के लिए भी बिरहा गाया जाने लगा। गांवों में बिरहा दंगल का भी आयोजन किया जाता है, जिसमें दो गुट आमने-सामने बैठते हैं और बिरहा गाने की प्रतियोगिता होती है।
क्या है बिरहा गीतों की खासियत?
बिरहा की सबसे बड़ी खासियत इसका अलाप और तेज स्वर है। गायक गीत की शुरुआत एक लंबे अलाप के साथ करता है, जो मन पर गहरा असर छोड़ता है। पारंपरिक बिरहा भले ही विरह और प्रेम पर आधारित है, लेकिन आधुनिक बिरहा में पौराणिक कथाएं, वीर रस की कहानियां और समाज के मुद्दों को भी शामिल किया जाता है।
बिरहा के बोल भी इसे बहुत खास बनाते हैं। इनमें भोजपुरी के आम बोलचाल के शब्दों का इस्तेमाल होता है, जिसे देहाती लहजे में ही गाया जाता है। इसलिए हर किसी को बिरहा काफी पसंद आता है।
