कमर में घुंघरू और डंडों की ताल पर शुरू होता है छत्तीसगढ़ का डंडारिया नृत्य, अन्नलक्ष्मी से है खास नाता
गुजरात के डांडिया से मिलता-जुलता है डंडारिया पर परंपरा में है अलग।

छत्तीसगढ़ के डंडारिया लोकनृत्य की कहानी (Image Source: AI Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आदिवासी संस्कृति में नृत्य की अहम भूमिका है क्योंकि यही उनके जीवन का मनोरंजन भी है और त्योहारों की विशेष परंपरा भी। यही वजह है कि भारत में जिस भी आदिवासी संस्कृति पर नजर डालें तो उसमें एक खास लोकनृत्य जरूर देखने को मिल जाता है। इसी कड़ी में आज हम बात करेंगे छत्तीसगढ़ के डंडारिया की।
छत्तीसगढ़ के डंडारिया लोकनृत्य की कहानी
डंडारिया लोकनृत्य का संबंध छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाके में रहने वाली धुरवा और भतरा जनजाति से है। इसमें भी केवल मैदानी इलाकों में इसे डंडारिया या डंडा नृत्य कहा जाता है, जबकि पहाड़ी इलाकों में इस नृत्य का सैला है। कहीं-कहीं जांजगीर-चांपा और ग्रामीण इलाकों में इसे कुई नाच या फागुन नृत्य भी कहते हैं।
बसंत पंचमी और माघ महीने में शुरू होता है डंडारिया
डंडारिया की शुरुआत बसंत पंचमी से होती है और इसका समापन होलिका दहन के दिन किया जाता है। इस नृत्य को करने के पीछे कोई खास मान्यता होने के बजाय प्रकृति से इसका जुड़ाव है। यह वो मौसम होता है जब किसानों की धान की फसल तैयार हो जाती है और सबके घर अन्न से भर जाते हैं।
इसके बाद लोगों की सालभर की पेट भरने की चिंता खत्म हो जाती है और इसी खुशी में वो नृत्य करते हुए झूमते हैं। इस तरह डंडारिया नृत्य अन्न लक्ष्मी के आगमन का प्रतीक है। जिस दिन इस नृत्य की शुरुआत की जाती है, उस दिन सबसे पहले बस्तर की आराध्य देवी माई दंतेश्वरी और बूढ़ादेवी को पूजा जाता है। इतना ही नहीं डंडे की भी खास पूजा किए जाने की परंपरा है।
ढोलक और तिरली की जुगलबंदी खास पहचान
डंडारिया लोक नृत्य को करते समय 6-7 लोग ढोलक बजाते हैं, वहीं कुछ लोग तिरली यानी बांसुरी वादन करते हैं। इसके अलावा, कमर में बांधने वाला छोटा ड्रम यानी तुरबुड़ी के साथ कांसे या लोहे की छोटी कटोरी यानी टिमटिमी का भी वाद्य यंत्रों के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
कैसे किया जाता है यह नृत्य?
इस नृत्य में 20 से 50 नर्तक तक शामिल हो सकते हैं जो अपनी पारंपरिक वेशभूषा में होते हैं। सभी पैरों और कमर पर घुंघरू बांधकर पारंपरिक लोकगीत गाना शुरू करते हैं। सभी नर्तक गोल घेरा बनाकर बांस की खपचियों से एक दूसरे से टकराते हैं, फिर जुगलबंदी करते हुए नृत्य करते हैं। बताते चलें कि यह नृत्य गोल के अलावा लंबाकर तरीके से भी किया जाता है।
